भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 415, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 415

विवेकसागर

(११९)

बहुरि क्रोध बोल्यो तहाँ, धरे भार बहु भूमि ॥ मोर भार सहस्रके, जाय पताल झूमि ॥ को मोरी तेजै सहे, कहा बडो अस वीर ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश हू, सो उर धरत न धीर ॥ कहे क्षमा पुनि भक्ति सो, हम सब विधि लछु आहि ॥ कब सम्पति यह क्रोधकी, क्यों पटतरि हैं ताहि ॥ क्रोध सुभट बोल्यो तबै, कहत वचन यह क्रूर ॥ मेटो मार विलम्ब नहीं, दया धर्म बड शूर ॥ जैसे कोऊ यत्न करी संग्रहि कीन्हो वित्त ॥ तस्कर पलमें लैगयो, शोक अग्नि जर वित्त ॥ क्षुधा पिपासा नींद पुनि, सिन्धु तरहि ज्यों यार ॥ गोपद लै बोलो तिन्हैं, ऐसेही वरियार ॥ जबै क्षमा सब सहि रहि, गहि रहि भगवत आस ॥ हृदय समझ बोलत भयी, हम तो हैं तुव दास ॥

यों कहत तुरत क्षमा कहे पौरुष बोलेऊ ॥

कुशल कुशल कहि फिर उत्तर खोलेऊ ॥

टीका—हे धर्मदास ! जिस समय क्रोधने महा कटु और हृदयमें शूल उत्पन्न करनेवाले महानिन्द्य वचन कहकर क्षमाके समस्त परिवारको गाली दियो उस समय भी क्षमा शान्तिसे कहने लगी हे क्रोध ! आपने जो कुछ कहा बहुत अच्छा कहा वाह ! वाह ! ऐसेही चाहिये ! इस प्रकार बार बार उसकी स्तुति करती हुई क्षमाने कहा आपने जो कुछ अपना पुरुषार्थ और बल वर्णन किया सब ठीक है । इसमें क्या संदेह आप बहुत बडे हैं । इस प्रकारसे क्षमाके कहनेपर क्रोधने उसकी बातोंको कटाक्ष समझकर और भी अपनी शक्ति अधिक प्रकाशित की । और—