भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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विवेकसागर

(१२१)

यह सुनि क्रोध शीतलगत अति कुंठित भयो॥

हारयो कर अतिदाप सबै जडता गयौ ॥

टीका-क्षमाकी अमृत समान अधीनताकी वाणीको सुनकर क्रोधका सब तेज जाता रहा, अब वह शांत और कुंठित होकर आगे युद्ध करनेसे रुक गया और अपने हथियार डाल दिये।

दोहा-कियो अनादर क्षमाको, शीतल भयो न रोष ॥

तबै क्षमा पायन परी, सबै हमारो दोष ॥

तुम विन दूजो को अहै, परम सीखकी बात ॥

सबै चूक मोसे परी, क्षमा कीजिये तात ॥

गये क्रोधके प्राण तब, शीतल भयो शरीर ॥

जीति क्षमा प्रिय ढिगगयी, मिटी सुतनकी पीर ॥

जैसे चण्डी मारेड, महिषासुर विकाल ॥

तैसे क्षमा विनाशेऊ, क्रोधहि हियेको शाल ॥

क्रोधके मरतेही दूतोंने मोहराजाको जाकर अपने पराजयका समाचार सुनाया।

काम क्रोध सुभटै युग पराजय पायऊ ॥

महा मोह अति संकेंऊ दास बुलायऊ ॥

टीका-काम और क्रोध दोनों महावीरकी जब पराजय होगयी तब मोह राजा अति भयभीत होकर अपने सर्व सेनाको बुलाकर एकदमसेही विवेककी सेनासे युद्ध करनेको रणमें आया। तब-

तब विवेक निजदल कहँ आयसु दीन्हेंऊ ॥

निज निज जोरी जान निपातन कीन्हेंऊ ॥