भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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विवेकसागर

निवृत्ति निज सखियन तुरत सिखायऊ ॥

पति समीप तुम गौनो बात बुझायऊ ॥

टीका-मन राजाको विराग संयुक्त देखकर निवृत्तिने अपनी सखियोंको बुलाकर और उन्हें कुछ गुप्त शिक्षा देकर मन राजाके पास भेजा । तब-

विद्या विनय अधीन सखी तुरते गयी ॥

करिप्रणाम कर जोरि मानु बोलत भयी ॥

टीका-निवृत्तिकी आज्ञा पाकर विद्या और अधीनता तीनों सखी मन राजाके पास जाकर प्रणाम करके विनयपूर्वक बोलने लगीं । क्या बोलने लगीं कि हे प्रभु-

कितहिं उदास समुझि जिय देखिये ॥

एक वनितासंगभोग अब द्वितीय लेखिये ॥

टीका-निवृत्तिकी सखियोंने राजा मनसे कहा हे महाराज अब आप किस बातकी चिंता कर रहें हैं । अबतक एक स्त्रीके साथ समागम करके आनन्द विलास प्राप्त किया और उसका परिणाम भी देख लिया अब दूसरीकी और दृष्टि कीजिये और उसके आनन्द विलास और उसके परिणामको देखिये ॥

निवृत्तिकी सखियोंके वचनको सुनकर प्रवृत्तिकी सखी आशा (जो प्रथमसेही वहाँ बैठी हुई थी) को अच्छा न लगा ।

मुनत वचन रिसवश भयी आशा यों कही ॥

विद्या द्रोह दुराचारिणी कितहु न चूकही ॥

सुहावति सौत समाजहि सबहि मरावसी ॥

कहि कहि पाठ कुपाठ विवेक पठावसी ॥

टीका-विद्याकी बातको सुनकर कोधित हुई आशा कहने