कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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विवेकसागर
यहाँ भाग, भाग दोबार कहनेसे आशय यह है कि निवृत्ति परायण पुरुषोंको लौकिक पारलौकिक दोनों प्रकारकी आशा त्यागनी चाहिये और यही वेराग्यका स्वरूप है । आशाको इस प्रकार से दुत्कार विद्या फिर मन राजासे कहने लगी ॥
छन्द-गहि निवृत्ति स्नेह कीजे सुनहु स्वामी नागरा ॥
विषय शोचहि कहा कीजे करहु राज उजागरा ॥
टीका-विद्याने कहा हे बुद्धिमान स्वामिनअब आप निवृत्ति को ग्रहण करके उसके साथ प्रेमपूर्व राज्य कीजिये ॥
मन राजा सुनि हर्षेऊ निवृत्ति संगम आयउ ॥
पति परी आन्दन्द भारी मुफल जीवन पायउ ॥
टीका-विद्याके शिक्षाप्रद वचनोंको सुनकर मनराजा मनमे बहुत प्रसन्न हुआ और विद्याके साथही निवृत्तिके समीप गया हे धर्मदास ! उस समय निवृत्तिके आनन्दका क्या पार हो ? निवृत्ति अपने पतिको अपने ऊपर कृपा करनेके लिये निकट प्राप्त हुआ देखकर अपनी जीवनकी साफल्यताको प्राप्त जानकर पतिके चरणपर पड़ गयी ॥
अब दोनों आनन्दपूर्वक आनन्द विलासमें मग्न हुए ॥
इस प्रकारसे हे धर्मदास ! जब यह मन प्रवृत्तिसे अलग होकर निवृत्तिको प्राप्त होकर गुरुमुखद्वारा सच्चे पारख पदको प्राप्त होता है तब मन स्थिर होकर सुखकी प्राप्ति होती है ॥
इति श्रीहंसमुक्तावली अर्न्तगत मोह और विवेकका युद्ध कवीरपंथी भारत-पथिककृतटीका सहित समाप्त
इति विवेकसागर समाप्त