भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 427

सर्वज्ञसागर

(१३१)

चित्ररेखा रानी कर नाऊ । तिन सुनिशब्द श्रवण चितलाऊ ॥ तिन युगबन्ध चौका कीन्हा । युग बन्धी परवाना लीन्हा ॥ राजा रानी पूछत मोही । सो हकीकत कहौ मैं तोही ॥ अष्टचौकाको शब्द सुनावा । राजा रानी लोक पठावा ॥ दुसरे राय वटक्षेत्रके आवा । सतसुकृति तहँ नाभ धरावा ॥ तिन राजा पूछा चित लायी । तब तेहि भेद कह्यो समझायी ॥ पान परवाना राजहिं दीन्हा । राजा वास लोकमें कीन्हा ॥ तिसरे राय हरचन्द कहँ आये । बन्ध काटिके लोक पठाये ॥ चौथे पुरी मथुरामें आयी । विकसी ग्वालिनके समझायी ॥ चारिहंस सतयुग समझाये । ते चारों गुरुवंश कहाये ॥ चारिहंस नौ लाख बचाये । शब्द भरोसे घरहि पठाये ॥

त्रेता युगका वर्णन

पुनि त्रेता युग कहौ विचारी । सात हंस त्रेतायुग तारी ॥ प्रथम ऋषी शृंगी समझाये । दुसरे अयोध्या मधुकर आये ॥ तिनसे शब्द कह्यो टकसारा । चौथे बोधे लछन कुमार ॥ पचवें चलि रावण लगि गयऊ । तहाँ भेंट मन्दोदरिसे भयऊ ॥ गर्वी रावण शब्द न माना । मन्दोदरी शब्द पहचाना ॥ छठै चलि वसिष्ठ लगि आये । ब्रह्म निरूपन उर्नहि सुनाये ॥ सतये जंगलमें कियो वासा । जहाँ मिले ऋषी दुर्वासा ॥ सात हंस सातौ गुरु कीन्हा । परमतत्त्व उन्ही भल चीन्हा ॥ सातौ गुरु त्रेतामें भयऊ । देह उपदेश सो हंस पठयऊ ॥

द्रापरयुग वर्णन

त्रेता गत द्रापर युग आया । सत्रह जीव परवाना पाया ॥ प्रथमें रायचन्द विजय कहँ गयऊ । ताकी रानी इन्दुमति रहेऊ ॥