कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानसागर
(३५)
चौपाई
कन्या हाथ लीन जयमाला । नावहु गले गहि चरण गुपाला ॥ शिव विवाह पार्वती सों कीन्हा । सती हेत तिन भल कै चीन्हा ॥ तबही रूप प्रथम कर दीन्हा । दीन्ह शाप विष्णु सुन लीन्हा ॥ अहो विष्णु तुम वैर विचारा । तुमहु वैर देव व्यवहारा ॥ वसुधा भारहि व्याकुल आही । सुत पुलस्त महा बल ताही ॥ ले अवतार मारहुगे मोई । सो पुन हर तुम्हारा जोई ॥ नारदका जस कीन्हौ अंगा । तईसन जाय करो परसंगा ॥ बरबस वैर लेव सब पाहीं । विधिना रूप बनावै ताहीं ॥ विष्णु अपन मन कीन्ह तिवाना । काके गिरह लेहुँ अवधाना ॥ पूर्व जन्म जो दशरथ राऊ । सेवा कीन्ह यहा परभाऊ ॥ माँगिन तिन फल अंतक बारा । पुत्र होहु गोपाल हमारा ॥ आये नृपति संग त्रेनारी । सेवा कीन्ही यही प्रकारी ॥
साखी-लेव अवतार अयोध्या, दैत्य बधन जो होय ॥
आज्ञा भयी आकाश तैं, करु उपाय अब सोय ॥
चौपाई
हिरनाकुश हिरण्याक्षहि मारा । ताकौ दियो सुनिगृह अवतारा ॥ सुनि पुलस्त गृह जन्मौ बारा । रावन कुंभकर्ण बरियारा ॥ जा कहैं विष्णु स्वर्ग कर राऊ । भक्ति हेतु ता कहैं जन्माऊ ॥ नाम विभीषण भक्त हरि केरा । जपै विष्णु नहि लावै बेरा ॥ नृप कश्यप दुतिया अवतारा । सो तो भयऊ अवध भुवारा ॥ तिनके गृह अवतारहि लीन्हा । अपने अंश चार तिन कीन्हा ॥ राजा के गृह जन्मौ बारा । ज्योतिष राम वर्ग उच्चारा ॥ जेष्ठ पुत्र कौशलया सुतही । राम नाम थापो पुन तबही ॥ सुमित्रा के दोई बालक आही । लषन शत्रुहन भाषौ ताँही ॥