BharatKosha
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

Page 454 of 2136

Read in context
Page 454

(१०)

ज्ञान प्रकाश

धर्मराय सिर अञ्जन 'सोई । आपुहि तात मातु नहिं कोई ॥ नहीं तीनि पाँच तनुधारै । रहै अमान नरकसों न्यारे ॥ ताके निशि दिन शिर नाऊँ । गुप्त प्रकट वाको गुण गाऊँ ॥ उनके ढिगसो हम चलि आये । जिव निस्तारन हमहिं पठाये ॥ सत्यपुरुष सत्यगुरु सो आहीं । गुरुगम सत्यगुरु नाम समाहीं ॥ सत्यगुरु ध्यान जाहि पहुँ होई । सो हँसा नहिं जाहिं विगोई ॥ सत्यगुरु शब्द गहे सो हँसा । मेटै जन्म मरण भौ संसा ॥

छंद-सत्यनाम सतगुरु ध्यान सतपद वासी हंस हो ॥

सत्यलोक अशोक निर्मोह पहुँचे गहे अविचल कंत हो ॥

जीव लहै सुमिरण सत्यबीरा अङ्क अविचल जोग है ॥

सत्यनाम सुमिरण काल डरपै मुछित यम न्यारा रहै ॥

सारखी-कहाँ सँदेश सत्य पुरुषको, समझत रङ्ग नरेश ॥

कहैं कबीर सो अमर हो, जो गह मम उपदेश ॥

सोरठा-चीन्हहु किर्तिम आदि, सत्य असत्य विचारहु ॥

छाँडि देहु बकवादि, खोजहु अविचल पुरुष कह ॥

चौपाई

यहि जग देखों अनकठ रीती । तजहीं साँच झूठ सो प्रीती ॥

जो धोखा तेहि साँचके मानैं । सत्य सार तेहि नहिं पहिचानैं ॥

आदि ब्रह्मकहैं खोजहि नाहीं । कृतिम कला जो सेवहि ताहीं ॥

निज स्वामीके मत ना गहहीं । जरा मरण घर संकट सहहीं ॥

जो रक्षक तेहि गहे न कोई । जो भक्षक तेहि धावहि लोई ॥

कर्म भर्म वसि तीर्थ नहाहीं । पुण्य पाप वसि आवहिं जाहीं ॥

दयाहीन नर पढ़हि पुराना । पढ़िगुणिके अरथावहि ज्ञाना ॥

अन्धा अगुवा तिहुँपुर माहीं । बहु अन्धा तेहि पाछे जाहीं ॥

अगुवा सहित कूप महाँहीं । कासो कहूँ कोई बूझै नाहीं ॥