भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( ३७ )

जो कोइ आय जान यज्ञ शाला । सब कई पोषण कीन्ह भुवाला ॥ पहुँचे अवधि सुदिन आये । राजा नगर महाँ ढोल बजाये ॥

साखी-जाके बल बहु होवै, धनुष उठावै सोय ॥

सीता ब्याहों ताहिको, मिथ्या वचन न होय ॥

चौपाई

चल भइ सीता जहाँ फुलवाई । देवी पूजन मातु पठाई ॥

आवत राम मार्ग जब देखा । सुफल जन्म आपुनतब लेखा ॥

अहो अंबिका आदि भवानी । सुनिये मातु तुम अन्तर्जाभी ॥

मोर मनोरथ पुरबो माता । सो बर देव जो मनमें राता ॥

बिधि विन्ती सीताकी जानी । ततक्षण भई अकाश तें वाणी ॥

अहो सीता लक्ष्मी अवतारा । निश्चय तोर राम भरतारा ॥

सुनत संदेशा भयो अनन्दा । जिमि चकोर पाये निशि चंदा ॥

देवी पूजि गई निज सीता । मनमें हर्ष बहुत पुनि कीता ॥

आई सिय जहाँ सृष्टि भुवारा । उठै न धनुष सबै बल हारा ॥

रावन बालि महा बलधारी । उठै न धनुष सबै बल हारी ॥

जब नृप जनक भयो विसमादा । उठै न धनुष जन्म मम बादा ॥

तब रघुवर सुनिको शिर नावा । सभा मांझ तब धनुष उठावा ॥

रैवेंचो राम धनुष चढ़ो जबही । महा अघोर शब्द भयो तबही ॥

साखी-सुनि गण त्याग्यो ध्यान तब, महि मंडल भुई चाल ॥

हरष्यो राजा जनक तब, सिया दीन्ह जयमाल ॥

चौपाई

टूटचो धनुष धूम भइ भारी । परसराम तब लाग गुहारी ॥

आवत तासु जो नृपति सकाने । बहुत नाम जो सुनत प्रमाने ॥

सभा मांझ आये परसरामा । सब मिलि दंडवत कीन्ह प्रणामा ॥

भृगुकुल कह सुन मिथिला राज । तोरचौ धनु किन मोहि बताऊ ॥