भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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(३८)

ज्ञानप्रकाश

सर्वानन्दकी कथा

हे धर्मनि परखहु चितलाऊ । विप्रगौष्ठि तोहि वरन सुनाऊ ॥

धर्मदास वचन

गहि पद धरमदास हरषाना । कहिये विप्र गोष्ठि सहिदाना ॥ जस कछु भयी विप्र सो चर्चा । सो स्वामी कहिये मोहिं परचा ॥ भिन्न २ के वर्णन कीजै । दास जानि दया प्रभु लीजै ॥

सतगुरु वचन

भलधर्मनि सुनहु अब सो कथा । गोष्ठिभयी सर्वानन्द से यथा ॥ सर्वानन्द विप्र एक रहई । कोइ न ज्ञाता तिनसम अहई ॥ सर्वानन्द द्विज जो रहेऊ । तासम ज्ञान अवर नहिं कहेऊ ॥ बहुपण्डितसोंगोष्ठितिन्हकीन्हा । ज्ञानजीति पोथी बहु लीन्हा ॥ काहु न जीते गये सब हारी । सर्वानन्द मन गर्व बहु भारी ॥ जिन्ह पण्डितसों चर्चा कीन्हा । ज्ञान जीति पोथी बहु लीन्हा ॥ गोष्ठि वाद के निजघर आया । बाहुअभिमानगुमान चितलाया

सर्वानन्द वचन माता प्रति

मातासों तिन वचन उचारा । हो जननी बड़ भाग्यतुम्हारा ॥ हम अस पण्डित हैं सुत तोरा । काहु न जीते गोष्ठि सो मोरा ॥ सर्वाजीत नाम मम धरहू । अजित तिलक सिर हमरे करहू ॥ काहे जननी धन्य पुत्र प्रवीना । सहि ज्ञाता तुम्ह हमहुँ चीन्हा ॥

माता वचन

हो सुतएक पूँछौ तोहिपाहीं । कवीरजोलहहिंजीतेहुकिनाहीं ॥

और श्रद्धाके अनुसार बाँजेगे । इसी प्रकारसे अनुरागसागरको अनेक प्रतिव्योमिं भी सुपुत्र सुवर्षानके पिताकाही अनेक जन्मके परचात् गुरु धर्मदास साहब बनना लिखा है किन्तु अभी जो इस पुस्तकके साबही छपे हुए अनुरागसागरमें सो बात नहीं है उसका कारण यह है कि वर्तमान आचार्य वं० श्री उग्रनाथ साहबकी सेवामें जो अनुरागसागरकी प्रति छपानेके लिये मुसको मिली थी उसके अनुसाष्टी यह अनुरागसागर छपा है ।