भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( ४५ )

सारखी-मारौ दैत्य महा बली, दैत्य राज भयमान ॥

भगनी तासु जो पूतना, ता कईं दीन्हों पान ॥

चौपाई

चली पूतना कर छल भेषा । गरल लगाइ पयोधर रेखा ॥

लेके पयोधर कृष्ण लगाई । तारी तवै सबै विष खाई ॥

एक बार ग्वालन संग गएऊ । जान बकासुर छैकै लएऊ ॥

मारचो कृष्ण ताहि पल माहीं । नहीं दैत्य जीते कोइ जाहीं ॥

इन्द्र पूजा नहिं दीन्ह गुवारा । वर्षे इन्द्र अखंडित धारा ॥

डारचो इन्द्र वर्षा दिन साता । हरि गिर लीन्हो ऊपरहाथा ॥

सारखी-सात दिवस जब वर्षेऊ, जान्यो इन्द्र भुवार ॥

क्षमा अपराध अब कीजिये, देव विनय अनुसार ॥

चौपाई

एक बार कालिन्दी तीरा । बछड़े लै गए जादौ बीरा ॥

लागी प्यास पियावहिं पानी । पीवत ही भइ सब की हानी ॥

देखत कृष्ण अचंभौ भयऊ । उरग गरल साँवल तन भयऊ ॥

पुन धँस गये तहं यदुराई । नाथ्यो नाग वारि मई जाई ॥

सारखी-यह चरित्र माधव कियो, जानत नाहिन कोय ॥

बूझेगे कोइ बिरले, सतगुरु मिलिया सोय ॥

चौपाई

केसी नाम बंधु बड़ बीरा । तिन पुनकीन्हा असुर शरीरा ॥

तब निकंद कीन्है जो ठाना । छलके मारचो तेहि भगवाना ॥

सुकल केश कईं बेग पठावहु । राम कृष्ण कौं बेग लै आवहु ॥

चल अकूर आये हरि पाहीं । कृष्ण चरित्र बूझे पल माहीं ॥

सोरा सहस्र अबला सों नेहा । बूझ न परै जीव दोइ देहा ॥

सारखी-बहु क्रीडा हरि कीन्हौ, जानत नाहिं न कोय ॥

अजिया पुत्रहि पालिये, आप स्वारथी होय ॥