भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ७ )

सबै कँगूरा भुइ खसि परेऊ । ज्ञानी चली राय पहुँ गयऊ ॥

साखी-चकित सकल पौरिय, पाछे लगि सब धाय ॥

जहाँ राय भोपाल हैं, तहाँ पोरिया जाय ॥

चौपाई

करत गोहार पौरिया जाई । मार मार बहुत हकराई ॥

राय भोपाल बैठि जहाँ राजे । गये पौरिया तहाँ सब भाजे ॥

कीन्ह सलाम दोई कर जोरी । यह जिन्दा बटपार बडचोरी ॥

कहैं पौरिया पौर उचारो । तुरत बुलाओ राय यहि बारो ॥

जिन्दा वचन नहीं हम माना । बीत रैन भये भोर सुजाना ॥

मंत्र एक जिन्दा तब करिया । फूट कपाट कँगूरा गिरिया ॥

तब जिन्दा आयो महाराजा । हम आये तेहि पीछे भाजा ॥

ना जानौ कौन यह आही । होय बटपार धसा घर माही ॥

साखी-हो राजा महाराज मम, कहचो सत्य हम बात ॥

तत्क्षण जिन्दा मारहु, नातौ सब पर घात ॥

चौपाई

सुनो पौरिया कहे अस राजा । सुनिये वेद करौ तव काजा ॥

विप्र बुलाय सुनो मतिमाना । करिये तबै विवेक सुजाना ॥

आज्ञा वेद होय तब मारा । नहिं तो जिन्दा कहा बिगारा ॥

एतिक वचन राय सुख बोला । साहब आसन तवहीं डोला ॥

तत्क्षण हम अस लीला कीन्हा । रायमहल सोने करि दीन्हा ॥

कंचन कपाट रतनकी पांती । विपरीत बने खम्भ बहु भांती ॥

बने कँगूरा रतन रसाला । चकित राजा भये भोपाला ॥

साखी-भयो विवेक मन रायके, देखत मन पतियाय ॥

कौन पुरुष तुम समरथ, मोहैं कहैं दरश दिखाय ॥