भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २२ )

जगजीवनबोध

नौ अवतार विष्णु जो लीन्हा । उनहूँ गरभ वसेरा कीन्हा ॥ तेतिस कोटी देव कहाये । गरभ वास महाँ देह बनाये ॥ जोगी जंगम औ तप धारी । गर्भवास में देह सवारी ॥ गर्भ वास तब छूटे भाई । जब समरथ गुरु बाहँ गहाई ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

नारि पुरुष बांधे संयोगा । कामबाण लगि देहसुख भोगा ॥ सप्त धातुका अंग बनाया । जिह्वा दांत सुख कान उपाया ॥ हाथ पावैं रु शीस निर्माया । सुन्दर रूप बनी बहु काया ॥ नख शिख काहू नर बहु कीन्हा । दशही द्वार युक्ति करि लीन्हा ॥ दश द्वार नौ नाडि बनायी । ऐसे सबतर बन्ध लगायी ॥ दीन्हा ठेक बहतर भारी । नाडी बन्धन बहुत अपारी ॥ नाद विन्दुसों काथ निरमायी । तामैं प्रकृती आन समायी ॥ हृद कारिगर हुन्नर कीन्हा । जैसे दूधमें जामन दीन्हा ॥ तीनसों साठ चार बन्ध लायी । सोलह खाईं तहां बनायी ॥ सोलह खाईं चौदह दर्वाजा । अठहूँ हाथ गढ़ खूब विराजा ॥ छाजे महल अधिकही छाजा । तामैं जीव जो आनि विराजा ॥ अजब महल बहु खूब बनाया । छठे महल हंस चितवन लाया ॥ छठे मांस में सुरती आयी । दुख सुखकी तब पारख पायी ॥ छै मासको भयो जब प्रानी । दुख सुखकी मति सबै पहिचानी ॥ ओंघे सुख झूले लटकंता । मैल बहुत तहाँ कीच रहता ॥ जठर अग्नि तहाँ बहुत सतावै । संकट गर्भ तहाँ अन्त न आवै ॥ बहुत सांकीरी पिंजार पोई । तडफटै बहुत निकसे नहिं जोई ॥ सुखसों बोल निकसि नहिं आवै । करुना करि मन में पछितावै ॥ अरुझे श्वास रोवै मन माहीं । कौन करमगति लागी आहीं ॥ करुणा करि मन में पछितावै । ज्यों करीब कंठ करद बैठावै ॥