भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ३० )

जगजीवनबोध

ज्ञान ध्यान जिव कैसे पावैं । इतने पिशुन ताहि भरमावैं ॥ देखो दिलै करि ज्ञान विचारा । किहिविधि उतरो भवजल पारा ॥ रे कुबुद्धि दुख में मत झूले । पिछला काल बोल मति भूलै ॥ इक दिन फेरि परैगा गाढा । सुशुक बांधि यम करिहैं ठाढा ॥ तुम मति जानो अमर है काया । यह दीसै सुपनेकी माया ॥ यहि चकचौंध भुलो मति कोई । संवल फूल जैसा तन होई ॥ जैसे नींद में सुपना आवै । जागि परै तब कछू न पावै ॥ यह तन ऐसे देखो भाई । झूठे झूठ मिलैं सब आई ॥ दिनाचार चटक दिखलावै । अन्तकाल ग्रासन कूँ धावै ॥ काल जंजाल सो छूटा जाई । गुरुसे प्रीति करो रे भाई ॥ सतगुरु ऐसी युक्ति लखावै । जासे जीव परम पद पावै ॥ सुनो जीव अबूझ की बाता । जनम गवाँवै करम कमाता ॥ हर्ष मोह मैं सबहि सुनाऊँ । जेते घर में सबहि दिखाऊँ ॥ एक वर्ष लगि डोल डोलावै । पशू रूपमें जनम गँवावै ॥ उखली जीभ तोतला बोलै । मातु पिता सब हर्षित डोलै ॥ आज जंजाल बोले बहकावे । त्यों त्यों हरष हिये नहिं मावे ॥ परी करै औ ऊभा धावै । बाहर भीतर दौड़ा आवै ॥ कंचन घँघुर बेगि गढ़ाई । रेशम केरी डोर पोवाई ॥ सोना रूपा बहु पहिराया । हीरा मोती भूल भुलाया ॥ बालन सँग में खेलन जावै । नाच कूद के घरही आवै ॥ मनमें आनंद करै चँचलाई । सोच फिकर कछु व्यापे नाई ॥ करै कुतूहल मनमें सोई । दिन दिन तेज सवाया होई ॥ आकुल बोलै सोच न आने । कूर कपट कर बहु सुख गाने ॥ संकटका दिन चित्त न आवै । करै अनीति जोई मन भावै ॥ चित्तमें दुर्मति रहै अति घनी । महा दुष्ट बुद्धि पापी सनी ॥ द्वादश वर्षकी भयी है देही । अनन्त उपाय करै नर केही ॥

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