कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 627, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ४७ )
यही ज्ञान मैं भेद समझायी । तुम हंसन से कहो बुझायी ॥ हमरो प्रतिहार पान है भाई । पलपल खबर हंसकी लाई ॥ सोई वस्तु लै लोक पहुँचावे । सोई पान संग हंसन आवे ॥ जाका तुमसे कहूँ विचारा । पान लहे सो हंस हमारा ॥ जैसुनि लगन पान जो पावे । निर्भय लोक हमारे आवे ॥ पान परख विन झूठ कडिहारा । धोखे लेइ जिवन कर भारा ॥ धर्मराय माँगि है पाना । जब ही हंसा करे निर्वाना ॥ साखी-सब ही पहुँचे लोकमें, चढै पानपर अंक । कटे कर्म सब जन्मके, हंस होय निःशंक ॥
हंस ( राजा ) वचन-बोपाई
हंस कहे सुनो गुरुदेवा । जीवकि अवधि बताओ भेवा ॥ जादिन अंत अवस्था आवे । ताकर भेद हंस किमि पावे ॥ सोम शुक्र दिन औ बुधवारा । ताका कहिये चन्द्र सरदारा ॥ आपनि आपनि चौकी आवै । तौ यह जीव बहुत सुख पावै ॥ चले चूक चौकी कर फेरा । तौ कायानगरमें होय बखेरा ॥ गुरुबारका भेद बताऊँ । दो भावै गुरु दरस दिखाऊँ ॥ एकै आवै एक न आवै । ता दिन जीव बहुत दुःख पावै ॥ बार तिथि चौकी चूक करही । तो निश्चय ना बाचै देही ॥ सरब भेद मैं तोहि बताया । विरले हंस भेद यह पाया ॥ तुम सों हंस कहूँ समझायी । गुप्त भेद ना बाहिर जायी ॥ अब हम पृथ्वी परिक्रमा जावै । भूले हसन करें चितावै ॥ तुम राजा बैठि राज कराओ । सार शब्द जपन चित लाओ ॥
राजा वचन
जब सतगुरु तहाँ ऐसो कहिया । तब राजा मन चिता भइया ॥ राजा चरण धरयो तब आई । तुम विनु कैसे रहूँ गुसाई ॥ हमको राखो चरण लगायी । नहि देहु सत्यलोक पठायी ॥