भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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ज्ञानसागर

( ५३ )

कृष्णहि कहै काल की फांसी । कीन्हही आय भक्त की हांसी ॥ मारचो नहि पर तुव भय माना । यह सुनकर विहिसे भगवाना ॥

सारखी-जाव युधिष्ठिर वेग दै, तुम आनो गहि पांय ॥

आज्ञा मानि चले तब, आये युधिष्ठिर राय ॥

चोपाई

अहो संत तजिये अपराधा । अधम उधारन सुनियत साधा ॥

चलो स्वामी मेरे गृह आजू । कृपा करौ मम होवै कालू ॥

कहैं सुपच सुन पांडव राज । तोर का काज होय वहि ठाऊ ॥

तुम्हरे गये होय मम काजा । परमारथ तुम को बड़ साजा ॥

चल परमारथ कारण संता । सभा माहिं बैठे हरषंता ॥

आवत स्वपच कृष्ण जब जाना । होय काज पूरण सनमाना ॥

राय युधिष्ठिर पखारे पांऊ । भोजन सादर आन जिवाऊं ॥

भोजन करके सुपच भयो ठाढा । बाज्यो घंट शब्द भयो गाढा ॥

बाज्यो घंट यज्ञ भयो पूरा । कौतुक देखि ऋषीगण भूला ॥

पूरण यज्ञ विष्णु जब जाना । तबही कीन्ह द्वारिका पयाना ॥

सारखी-बूझो रे नर परानी, क्या सुपचे अधिकार ॥

गण गन्धर्व सुनि देव ऋषि, सब मिलि कीन्ह अहार ॥

चोपाई

सब के खाये घंट नहि बाजा । धर्म की देह युधिष्ठिर राजा ॥

सो सब रहे पूर्ण यज्ञ नाहीं । नामहि महिमा जानत नाहीं ॥

सुपच जान भल नाम प्रभाऊ । ताते पूरण यज्ञ कराऊ ॥

कृष्ण शक्ति में सुनि ऋषि झूला । जान बूझिकै पंडित भूला ॥

बूझौ सन्तो नाम हमारा । नाम विना किमि उत्तरौ पारा ॥

कृष्ण पारथ ही वेग बुलावा । तेहि पुनि निज मतौ सुनावा ॥

गोपी लैकै जाऊं मैं जहँवा । पुर वैकुंठ सुमेर है तहँवा ॥

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