कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जगजीवनबोध
धोनेसे शुद्ध भी हो जाता है, किन्तु इसे नित्य प्रति धोने पर भी न इसकी दुर्गन्धि जाती है न इसमें पवित्रता आती है ।
हड्डियोंकी ठठरी बनाकर उसमें नस और नाडियोंका बन्धन लगाया है और मेद और मांससे इसे जोडा है, जिस लोहूका नाम ही अशुद्ध है उसी रक्तसे इस शरीरकी जब बनावट है तब इसकी पवित्रताका क्या ठिकाना है ? शरीर दुर्गन्धिसे भरा है क्योंकि अन्दर बाहर मलिन वस्तुओंसे ही इसकी बनावट हुई है । समस्त शरीरमें शिर सबसे श्रेष्ठ कहा जाता है, किन्तु उसमें भी नाकमें से सदा दुर्गन्धि बहा करती है और कान पकनेपर ऐसी दुर्गन्धि निकलती है कि, निकट भी खड़ा नहीं रहा जाता । आंखमेंसे कीचड़ और मुँहमेंसे थूक, लार और दुर्गन्धि निकला करती है । इस प्रकारसे समस्त शरीर अपवित्र और मलिन वस्तुओंसे बना हुआ है ।
उत्तमसे उत्तम पदार्थ भी भोजन कर लेनेपर वह कई घण्टोंही में घृणित मल बन जाता है । निर्मल शुद्ध जल पीनेसे शरीरके संयोग द्वारा वह सूत्र हो जाता है और इन्हीं पदार्थोंसे शरीरका पोषण भी होता है, राजासे प्रजातक महान भक्त, राजासे महान पापी अघकर्मोत्क सबके पेटमें ये अपवित्र पदार्थ भरे हुए हैं और इन अपवित्र पदार्थोंका शरीरसे ऐसा सम्बन्ध है कि यदि कोई इन मलोंको शरीरसे निकाल कर शरीरको शुद्ध करना चाहे तो तुरत ही प्राणी मृत्युको प्राप्त होवे । जिस समयमें यह जीव अपनी वासनाके अनुसार शरीर धारण कर माताके गर्भमें प्रवेश करता है और नव महीनेतक यह शरीर माताके उदरमें रहता है, उसमें नाक मुँह आदि नवों दर्वाजे बन्द होते हैं और जिस समय वायुका तो प्रवेश भी नहीं होता,