भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

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उस समय में माताके शरीर से जो अपवित्र रक्त निकलता है उसकी गर्मी द्वारा हड्डी और मांस जलता है। ऊपरसे चमड़ेकी थैली न होने के कारण बालकका मांससमय शरीर माताके तीखे चरपरे आदि पदार्थोंके सेवनसे महान कष्टित होता है। गर्भके ऊपर एक सपेद २ चमड़ा लपेटा होता है और गर्भ मलमूत्र के नरक कुण्डके निकटही होता है तथा उसकी नाभिमें एक नली लगी होती है जिसके द्वारा गर्भका पोषण होता है। वात पित्त तथा विषा आदि अनेक अपवित्र पदार्थोंसे और नाना प्रकारके पेट के कीड़ोंके नाक तथा मुहँके पास फिरनेपर बालकका मन चबराता है। इस प्रकारसे अनेक असंख्य कष्टमें नव महीना तक कैद हुये जीवको अत्यन्त कष्ट और दुःखके कारण इसे प्रभु सदगुरुका स्मरण आता है तब उस समय अत्यन्त विनीत भावसे प्रार्थना करता है कि, 'हे सदगुरु! हे परमात्मन्! यदि इस बार कृपा करके मुझे इस कष्टमें से छुटकारा दे तो मैं अपने आत्माके कल्याणके मार्गको धारण कर फिरसे ऐसे कष्टमें आने से छुटकारा कर लूँगा।' इसही प्रकार से अनेक समयतक प्रार्थना करते करते प्रभुकी कृपासे समय पूरा होनेपर माताके पेट में पीड़ा आरम्भ होती है। उस समयमें मुँह नाक और मस्तिष्क जो श्वासके मार्ग हैं। मांसके टुकड़ोंसे एकदम बन्द होजाते हैं, श्वासोच्छासका द्वार बन्द होते ही बालकको मूर्च्छा आती है और जीव अचेतनावस्थामें तड़फड़ाने लगता है। तड़फड़ानेमें यदि शरीर आड़ा टेढ़ा हुआ तब बाहरवाले लोग गर्भको काटकर निकालनेकी सम्मति देते हैं। यदि किसी युक्तिसे ठीक हुआ तो हुआ नहीं तो हाथ डालकर बालकका जोई अंग हाथआया उसीको काटना आरम्भ करते हैं और क्रमशः काटकर उसे बाहर निकालते हैं। बहुत बार ऐसा होता है कि, स्वयम् बालक तो मरता ही है उसके