कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 661, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( ८१ )
ब्रह्मा कहै सुनो विष्णु विचारी । हमही रचा पुरुष औ नारी ॥ हमते और कौन है भाई । सो मोहि भेद कहौ समझाई ॥ हम तो सर्गुण सकल पसारा । हमतो अगम निगम विस्तारा ॥ हमतो रचा पवन औ पानी । हम कहैं वेदव्यास बखानी ॥ हम चौरासी नाव जो कीन्हा । हम निर्गुण सरगुण चीन्हा ॥ इतनी कथा कहि ब्रह्मा सुनाई । तबहूँ गुरुड न मानैं भाई ॥
गुरुड वचन
कहै गुरुड सुनो ब्रह्म कुमारा । तुम कहैं रची सृष्टि करतारा ॥ सबको रची सबै जिन कीन्हा । वह तो पुरुष सबन ते भीना ॥ वह तो पृथ्वी पाँव न दीन्हा । शब्दहि ते सकलो जग कीन्हा ॥ जो आप रचना करि जाना । तो हमसे हठि भाषहु ज्ञाना ॥ जो तुम रचा पवन औ पानी । पृथ्वी अकाश तुमहिं जो ठानी ॥ रचा तुम्हार तब जानहिं भाई । अब रचहु तुम फिरि विनशाई ॥ जो तुम्हार है सकल बनाई । फिरिके परलय करहु तुम भाई ॥ तब हम जानहिं कीन तोहारा । यह मेटहु सकलो विस्तारा ॥ अपने हाथ रचै जो कोई । फिरिकै मेटि सके पुनि सोई ॥ तब ब्रह्मा सुनि रहे लजाई । सम्मुख उत्तर कह्यो न जाई ॥
महादेव वचन
कहे महादेव सुनो रे भाई । अचरज बात कही नहिं जाई ॥ सुनु ब्रह्मा गुरुड जो कहई । ताकर भेद कोई विरला लहई ॥ दश औतार विष्णु जो लियऊ । काया काल ब्रास जो कियऊ ॥ तबही कृष्ण भेद यक कीन्हा । ताको ब्रह्मा तुम नहिं चीन्हा ॥ गोपी ग्वाल सबै हरि लाये । तब जो कृष्ण सब दीन मेराये ॥ इतनी बात ब्रह्मा तुम नहिं जानो । अविगतिकी गति कैसे पहिचानो ॥