भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ११५ )

हनुमान वचन-चौपाई

सुनो सुनीन्द्र दृढकरिके बानी । तुम जग महाँ हो बड सुझानी॥ मेरी कला न जगदि छिपानी । तुम मेरी गति नाही जानी ॥ पौरुष पराक्रम बल है मोरा । मोसम और नहीं कोइ जोरा ॥ बावन बीर वसौं जग माहीं । मो सम प्राक्रम कोइ को नाही॥ सब बीरन में मैं सरदारा । मेरी कला सब में अधिकारा ॥ सब जग जाने सब मोहि पूजे । मो सम इष्ट और नहि दूजे ॥ जो चाहो सों कारज सारों । इष्ट करे तो तुरत उबारों ॥ ऐसो प्रसिद्ध जग हम आहीं । सब कोइ जाने तुम जानत नाहीं॥ साखी-सुनो सुनीन्द्र मोरी गति, मोसम और न देव । चाहै सो कारज करूँ, दृढ कै साथै सेव ॥

सुनीन्द्र वचन

सुनु हनुमान वीर ते बंका । आपै थापै बजावै डंका ॥ आपा थापे भला न होयी । आपा थापी सब गये विलोयी ॥ समरथ की गति तुम ना पाये । आपा थापि तुम रहे झुलाये ॥ समरथ पुरुष और है कोई । ताकी गति जानै नहि लोई ॥ हनुमान तुम छोड़ों अभिमाना । तो समरथ को भाषों ज्ञाना ॥ समरथ हुकुम चले जग माहीं । तुम उनकी गति जानत नाहीं ॥ बावन वीर कहै हम जानी । कालपुरुष की सब अगुवानी ॥ सब बैरिन को काल धरि खावे । जो सत्यपुरुष को गम नहि पावे ॥ चौसठ योगिन बावन बीरा । काल पुरुष के बसे शरीरा ॥ काल पुरुष सब रचना कीना । बीरन को सरदारी दीना ॥ मारहि मार सबन को करई । यह अपराध कौन शिर परई ॥ काल पुरुष को करम अपारा । कैसे धौं करिहौ निरवारा ॥ सो अब मोहि बताओ भाई । बल पौरुष कछु काम न आई ॥