कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 700, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२० )
हनुमानबोध
पहिले सुनो हमारी बाता । तुम सुनीन्द्र है बडा ज्ञाता ॥ मोरे पौरुष है बड जोरा । जन्म लेत कीन्हे घनघोरा ॥ जांदिन जन्म भयो महि मोरा । उदय भानु देखि मैं दौरा ॥ सूरज बाहर आवन नहिं दीना । निकसन तुरत लीलि मैं लीन्हा ॥ एक फलांग उर्ध्वचल गयऊँ । सो पौरुष मैं तुमसे कहेऊँ ॥ माता कीन जब बोल अधीना । उनके कहे छाडि हम दीना ॥ सूरज छाडि दीना हम जबहीं । जग प्रकाश भयो पुनि तबहीं ॥ जन्मत की यह कथा सुनाई । कहो तो और सुनाऊँ भाई ॥ राम प्रताप का हम कीन्हा । सो सुनीन्द्र नाहीं तुम चीन्हा ॥ एक समें जो राम बतायी । लंका खबर लाऔ तुम जायी ॥ लंका छोडि पलंका गयऊँ । जाय नगरमें ठाढो भयऊँ ॥ तब तिन कही यह नहिं लंका । पीछे तजि आयेऊ पलंका ॥ कहाँलौ कथा कहौ जो भाई । अपने सुख कहा करौ बडाई ॥ लक्ष्मण मूर्छित गिरे भुई भाई । तब द्रोणागिरि आनि जिवाई ॥ जेहि पै वही सजीवन होती । दैत्यन छली कीन्ही बहु जोती ॥ रातहिं को द्रोणगिरि लाये । रामवीर को तुरत जगाये ॥ यही द्रोणगिरि लेके दौरा । फिरि के धरो जाइ तेहि ठौरा ॥ ऐसे कारज अनेक सर्वाँरे । उनहि प्रताप कार्य उजियारे ॥
साखी-सुनो सुनीन्द्र मोर गति, पौरुष औ बल जोर । अपना गुण मैं जानिके, कासों कहां निहोर ॥
१ जब शमदमादिका अन्त्यास करके मुमुक्षु ज्ञान प्राप्त करनेके निकट पहुंचाता है तब यदि प्रारब्ध उसी शरीर तक होती है तब तो आत्मज्ञानको प्राप्त हो जाता है और जीवनमुक्त पद को भोगता है किन्तु यदि वर्तमान शरीरका प्रारब्ध अनेक शरीरका कारण होता है तब वह ज्ञान कुछ समय के लिये छिप जाता है।
२ बीर-भाई । रामवीर अर्थात् लक्ष्मण ।