भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बाधसागर

( १२७ )

हनुमान वचन-चौपाई

सुनो सुनीन्द्र मोर यक बाता । कहां रहत हैं समरथ दाता ॥ ताको नाम कहो निय जागा । अब मेरा मन तुमसों लागा ॥ सकल भेद कहि दीजे मोही । मोरी सुगति लगी है सोही ॥ तुमतो संत सकल सुखदायी । तुम्हरे है नहिं कछु मान बढायी ॥ सत्य साधु सत्य मैं जाना । सत्य सत्य है तुमरो ज्ञाना ॥ पूरण पद है ध्यान तुम्हारा । मैं अपने दिल कीन्ह विचारा ॥ साखी-पूरण पद निज ध्यान है, सो मोहि देहु बताय । धर्म निरञ्जन तहाँ नहिं, काल दगा नहिं खाय ॥

मुनीन्द्र वचन-चौपाई

सुनो वीर हनुमान विचारा । कठिन विवेक खांडेकी धारा ॥ ताका तुम कीजै इतवारा । निश्चय कारज होय तुम्हारा ॥ अब सन्देह रहै कछु नाहीं । साधु भये साधो मन काहीं ॥ समरथ का तोहि नाम सुनाऊँ । सो युक्ती तोको दिखलाऊँ ॥ सुनो हनुमंत खुशी मन आज । ऐसा अगम तोहि ठौर दिखाऊँ ॥ साखी-अगम ठौर जेहि गम्य नहिं, तहाँ नहीं कोइ जाय । सुरति निरति यक घर धरो, हनुमत गहो तुम आय ॥

हनुमान वचन-चौपाई

हे स्वामी यक संशय आयो । कौन भाति तहैं सुरति लगायो ॥ कौन भाति मैं लागूँ धायी । सो तुम मोहि कहो समझायी ॥ पौरुष बलसों लागो जाई । क्षण इक जाओं तेहि ठाई ॥ राह बाट तेहि मोहि बताओ । काया को सब भेद लखाओ ॥ तुम समरथ समरथ को जाना । सो मोहि कहिये ठौर ठिकाना ॥ जेतिक युक्ति तुम्हारे पास । सो मोहि दिखलाओ अगम तमासा ॥