कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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हनुमानबोध
कहो शिताबँ विलम्ब नहि करना । निश्चय हम आयो शरना ॥ लै पहुँचाओ ठौर दिखाओ । ऐसी वस्तु गहर जनि लाओ ॥ सारवी-गहर न लाउ सुनीन्द्र तुम, हौ समरथ मतिधीर । मैं सेवक निज दास हौं, अरपूँ सकल शरीर ॥
सुनीन्द्र वचन
धन हनुमन्त तुम्हारी वानी । तुम मोरी गति नीके जानी ॥ समरथ मिलत है दोय प्रकारा । भक्ति ज्ञानसे होइ उबारा ॥ तीसरि योग युक्ति है भाई । सुक्ति होय संदेह मिटाई ॥ तीन प्रकार है समरथ करो । सो गर्भवास नहि लेइ बसेरो ॥ जासों भक्ति जो होय सबेरा । पावे अगम ज्ञान सो टेरा ॥ सतगुरु केवल है निज ज्ञाना । सो बिरले कोई साधुन जाना ॥ तीन गुप्त तीनों तोहि भाखा । परदा अन्तर कछू न राखा ॥ सो अपने मन करो विचाग । समरथ नाम सो पइयो सारा ॥ प्रथम भक्ति करो समरथकी । योग युक्ति ज्ञान सुनु नीकी ॥ निष्कपटी होयके साधुमनाओ । साधुनके चरणों चित लाओ ॥ जो साधू अपने धर्म रहाओ । सेवो ताहि परदा नहि लाओ ॥ ऐसी भक्ति जेही मन भावे । भवसागर को भर्म मिटावे ॥ साधु कहै सो राह गहि लीजे । साधु कहै सोई पुनि कीजे ॥ सुनु हनुमंत कहों जो बानी । कूर्म वायु सो अनुभव ज्ञानी ॥ नाग वायु धरि वास समानी । तामैं अमी अंक जल पानी ॥ अमीमाहि यक बेलि उपजायी । तासों नागबेलि चलि आयी ॥ पान सोई सन्धि राखे भाई । समरथ मुख ऐसी फरमायी ॥ पुनि समरथ ऐसी अर्थायी । पान जाहि तुम देहौ जायी ॥ सो इंसा हमारे घर अइहैं । अभय अशंक सदा मुख पइहैं ॥
१ जस्वी शोध ।