कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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मुहम्मद बोध
दोनोंही ईश्वरबिमुख मूर्तिपूजक थे उन्हींसे उनकी उत्पत्ति हुई थी । इसका आशय यह है कि, प्रकृतिपुरुष जब संसारमुख होते हैं तब ही अन्तःकरण विशिष्ट होकर चैतन्य जीव नाम धारी होता है । अर्थात् मुहम्मदसे आशय है अन्तःकरण विशिष्ट चैतन्य अर्थात् जीवसे ॥
फिर मुहम्मद साहबके उत्पन्न होते ही उनकी माताकी मृत्यु होगयी थी और पिता तो प्रथमही मर चुका था इस कारण उनके जन्म लेनेके पश्चात् उनकी फूफूने उनका पोषण पालन किया था उसीने अपने गोद में उन्हे लिया था इसका आशय यह है कि, जब जीव अन्तःकरण विशिष्ट होता है तब पुरुष प्रकृतिका तो अभाव होजाता है अर्थात् स्वरूप विस्मृति होती है और देहकी प्राप्ति होती है और देहही द्वारा अन्तःकरण बड़ा होता है ।
आगे चल कर मुहम्मदसाहबने चौदह विवाह किये हैं सो जीवका चौदह इन्द्रियों के साथ अहंभाव करना है ।
आगे चल कर चालीस वर्षकी अवस्थामें मुहम्मद साहबको पैगम्बरी मिली है सो जब यह जीव पाँच ज्ञानेन्द्री, पाँच कर्मेन्द्री पच्चीस प्रकृति और पंचप्राणका विचार करके उससे आपको अलग जानने लगता है तब यह मोक्षअधिकारी होता है यही पैगम्बरी मिलना है ।
पैगम्बरी मिलने पर मुहम्मद साहबने जिहाद करके काफिरों को मारना आरम्भ किया था । और काफिरोंके उत्पन्न करने पर मक्का छोड़कर मदीनाको गये थे । सो जब यह जीव अधिकारी होकर विषयमुख इन्द्रियों को साहिव मुख होनेके लिये उनका निरोध करता है तब इन्द्रियाँ बहुत उत्पात मचाती हैं तब जीव प्रवृत्तिरूप मक्कानगरको छोड़कर निवृत्तिरूप मदीनामें जाता है ।