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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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बोध सागर

(१७)

अर्थात् प्रवृत्तिसे उदासीन होकर निवृत्ति को धारण करता है। और आसुरी सम्पत्ति रूप काफिरों को दैवी सम्पत्ति रूप फौज की सहायतासे मारता है।

इससे भी आगे बढ़कर मुहम्मद साहब मेआराज को जाते हैं। इस मेआराजके विषयमें अनेक मत भेद हैं। जिनका वर्णन स्वामी प्रमानन्दजीने कबीरमन्शूरमें बहुत उत्तम रीतिसे किया है पाठकोंके जाननेके लिये उर्दू कबीर मन्शूरसे अनुवाद करके यहाँ लिखताहूँ। स्वामी प्रमानन्दजीने प्रमाणके लिये मुसलमानी किताबोंके अरबी प्रमाण दिये हैं किन्तु उन प्रमाणोंका हिन्दी पाठकों को कुछ उपयोग न होनेसे केवल उनका आशय दिखा दिया है।

मुहम्मद साहबके हमेआराजका वर्णन

मुहम्मद साहबके मेआराजके विषयमें मुसलमानोंका भिन्न २ मत है। जो उनके हदीस और किताबोंसे प्रगट है।

तारीख मुहम्मदी में लिखा है कि, जब मुहम्मद साहबको पैगम्बरी करते बारह वर्ष बीत गये अर्थात् उनकी बावन वर्षकी अवस्था हुई तब एक रातको-जिबराईल और मेकाईल जो फिरिस्तों के मुखियों में से हैं मुहम्मद साहब के पास आये और उनका साना (कलेजा) चीर कर उसमें से सब पाप और बुरे संकल्पों को धोकर शुद्ध कर दिया और जब उनका हृदय (अंतःकरण) शुद्ध होगया तब उन्हें एक ऐसे जानवर पर जिसका शिर तो मनुष्योंका था और नीचेका धड विच्छी के समान था सवार कराकर खुदाके पास लेगये जिबराईल ने तो रिकाब और मेकाईलने उसका बाग पकड़ा। इस प्रकारसे वह रवाना हुए। चलते २ वे सबसे पहले बैतअकसा अर्थात् बड़े हैकल अर्थात् एक बड़े भारी वृत्तके निकट पहुँचे। वहाँ बहुतसे फिरिश्ते