BharatKosha
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

Page 760 of 2136

Read in context
Page 760

( २० )

मुहम्मदबोध

होता है । और तमोगुण की शुद्धता से उत्पन्न हुए शौर्य ( धीरता ) रूप बुराकपर सवार होकर गुरुकी शिक्षा द्वारा यह ज्ञान की भूमिकाओंको पूर्ण करता हुआ यथार्थ पद को प्राप्त होता है । और यथार्थ पदको प्राप्त होकर जीवन मुक्त अवस्था से अन्य जीवों को उपदेश देकर काल जालसे छुडाता है ।

इस मुहम्मद बोध ग्रन्थ के यथार्थ आशय को पारखी आत्मविद गुरु अधिकार प्रति अनेक रूपकों में समझाते हैं और इसको आध्यात्मिकही अर्थ से ग्रहण करने के लिये दश मुकामी रेखताका भी प्रमाण है । सो यहाँ दशमुकामी रेखता लिख देता हूँ ।

दशमुकामी रेखता

चला जब लोकको शाक सब त्यागिया हंसको रूप सतगुरु बनायी । भृगु ज्यों कीटको पलटि भृङ्गै किया आप समरङ्ग दै ले उड़ायी । छोडि नासूत मलकूतको पहुंचिया विष्णुकी ठाकुरी दीख जायी । इन्द्र कुबेर जहाँ रंभको नृत्य है देव तेतीस कोटि रहायी ॥ १ ॥ छोडि वैकुंठको हंस आगे चला शून्यमें ज्योति जगमग गायी । ज्योति परकाशमें निरखि निस्तत्त्वको आप निर्भय हुआ भय मिटायी । अलख निर्गुण जेहि वेद स्तुति करै तिनहूँ देव को हैं पिताई । भगवान तिनके परे श्वेत मूरति धरे भागको आन तिनको रहायी ॥ २ ॥ चार मुकाम पर खंड सोरह कहै अंडको छोर ह्यां ते रहायी । अंडके परे स्थान अचित को निरखिया हंस जब उहाँ जायी । सहस औ द्वादशै रुह है सङ्गमें करत कछोल अनहद बजायी तासुके बदनकी कौन महिमा कहौं भासती देह अति नूर छायी ॥ ३ ॥ महल कंचन बने मणिक तामें जडे बैठ तहै कलश अखंड छोजै । अचितके