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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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बोधसागर

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पृष्ठ ( ६८२ ) की टिप्पणीमें सूचित किये हुए बड़ा मुकामोंका वर्णन

प्रथम नासूत का वर्णन

नासूत मुकाम सुमेह पर्वतके उत्तर ओर पृथ्वीसे छतीस सहल योजन ऊँचा है और यहाँपर दयाअंश रहता है और यह मायाका स्थान है—महामाया इस जगह अपने तेज सहित निवास करती है। और जब कबीर साहब और मुहम्मद साहब उस स्थानपर पहुँचे तब वहाँ हजरत दाऊदको बैठे तथा ज़बूर नामक पुस्तकको पढ़ते पाया। वहाँ पहुँचकर कबीर साहबने अस्तलामअलैक कहा—तब हजरत दाऊद अलैकमस्तलाम कहकर उठ खड़े हुए—और उनके हाथोंको चूमकर बड़ी आबमगत किया—तब कबीर साहब मुहम्मद साहबको उस स्थानकी विशेषता और गुणोंको बतलाकर आगे चले।

दूसरे मलकूत का वृत्तान्त

दूसरा स्थान मलकूत है—और यह स्थान नासूत से चौबीस सहल योजन ऊँचाई पर है—और पृथ्वीसे साठ सहल योजन की ऊँचाईपर है। और इस स्थानको दूसरे शब्दोंमें बँकुण्ड कहते हैं, और यह बँकुण्ड विष्णुका स्थान है—और इसी स्थानपर पाप पुण्यका लेखा लगता है—और इस विष्णुकी सभामें ब्रह्मा विष्णु शिव इन्द्रादिक समस्त देवतागण उपस्थित रहते हैं—इस विष्णुहीका नाम धर्मराय है—और आपको आज्ञासे नरक तथा बँकुण्ड और योनिका फिरना आदि सब कुछ होता है—और इसी स्थानसे विष्णु महाराजका परि-क्षण समस्त पृथ्वी और आकाशादिमें हुआ करता है। चित्रगुप्तजी विष्णु के मंत्री सबके पाप पुण्यका लेखा तथा हिसाब रखते हैं। जब कबीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस मलकूत पर पहुँचे—तो वहाँ मूसाको बैठे तीरते पढ़ता पाया—कबीर साहबने वहाँ पहुँचकरभी सलाम अलैक किया—मूसा सलाम का उत्तर देकर उठे, और उनका हाथ चूमकर बड़ी आबमगतकी तब कबीर साहबने मुहम्मद साहबको इस स्थान के समस्त गुण बतला तथा वहाँके वृत्तान्तसे विन करारकर आगे चले।

तीसरे जबरुतका वृत्तान्त

तीसरा जबरुत है—इस जबरुत स्थानको कबीर साहबने साँसरी दीप कहा है—और यह निर्गुण ब्रह्म अलख निरंजनका स्थान है जो तीनों लोकका कर्ता धर्ता है और यह स्थान बँकुण्डसे अठारह करोड़ योजन ऊपर को ऊँचा है—यह बड़ा सुन्दर स्थान है—यहाँपर चार करोड़ ज्योतिका प्रकाश है—और इस सभामें चारों फिरिस्ते उपस्थित रहते हैं—अर्थात् जिबरा ईल-इस-रापिल इज़राईल—और मेकाईल। इन्हीं चारोंको ब्रह्मा विष्णु शिव गौर यम इत्यादिके नामसे पुकारते हैं। समस्त आज्ञाएँ इसी स्थानसे प्रचलित हुआ करती हैं—और चारों फिरिस्ते इन्हींके आज्ञाकारी हैं। वेब तथा पुस्तकें सबके प्रचार कर्ता यहाँ हैं और आपही के आज्ञाकारी तथा अधीन सब हैं। आद्या तथा निरञ्जन इसी राजधानीमें बैठकर तीनों लोकका राज्य करते हैं जब कबीर साहब रसूल अल्लाहको साथ लेकर पहुँचे तो देखा कि हजरत ईसा वहाँ बैठे हुए इञ्जील पढ़ रहे हैं। वहाँ पहुँचकर कबीर साहबने आसलामअलैक कहा और हजरत ईसा सलामका उत्तर देकर उठ खड़े हुए और उनके हाथको चूम लिया—तब कबीर साहब मुहम्मद साहबको उन स्थानोंके गुणका विवरण बतलाकर आगे चले।