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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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प्रस्तावना ।

(७)

क्रममें सैकड़ों ग्रन्थोंकी रचना हो गयी । आपकी आत्मिक शक्ति और गुरु भक्ति तथा गुरु वचनमें दृढ़ताका ही प्रताप है कि, आजतक भी प्रायः जो वाणी वचन बनते हैं सबमें कवीरके साथ धर्मदासजीका नाम किसी न किसी रूपमें अवश्य आता है ।

धर्मदासजीके लिखे भविष्य कथन भी, चाहे वह किसीके लिये क्यों न हो, ऐसा अटल है कि, तिल प्रमाण भी फरक नहीं पड़ता । और तो और आपने अपने बंशोंके विषयमें भी कवीर मुखसे जितनी भविष्य वाणी लिखी है, वह भी अक्षर अक्षर सत्य उत्तरा है और आगे भी सत्य उतरेगा । इसके प्रमाणके लिये ग्रन्थ “आगम संदेश” कवीराश्रम खरसिया से मंगाकर देखना चाहिये ।

एक तो मेरे पुरुषा स्वतः कवीर साहबके शिष्य हुए थे, दूसरे वह पंथ पंथा-इयोंके झगडेसे अलग रहकर सदा सत्यका आश्रय करके, आत्म तत्वके विचारमें मग्न रहा करते थे । इसका परिणाम यह हुआ कि, सहस्रोंग्रंथोंका संग्रह हो गया जो, मेरे पिता श्री १०८ गोस्वामी वख्शी गोपाललालजीके पुस्तकालयसे मुझे प्राप्त हुआ ।

इसके अतिरिक्त सम्बत् १९४६ में जब मेरी आयु केवल १६ वर्षकी थी तवहीं में वंशप्रतापी बेलवतियाके महंत श्री १०८ श्रीमान गोस्वामी श्याम बिहारी दासजी साहबकीशरणमें प्राप्त हुआ, तबसे और भी सहायता मिली और छीत्तीस-गढसे विशेष सम्बन्ध जुटा । फिर तो थोडेही दिनोंके पश्चात् श्री १०८ पंश्रीउग्रनाम साहबका दर्शन रेगनिया स्थानमें हुआ ।

उसके थोडे दिनोंके पश्चातही मुझे सदगुरुके आदेशसे, सदगुरुके समान पिताश्रीकी आज्ञा लेकर, देश भ्रमणको निकलना पड़ा । जिसका संक्षेप वृत्तांत “सत्य कवीर की साखी” की प्रस्तावना में दिया है, जिसको देखना हो श्री बैंकटेश्वर प्रेस बम्बई” से मंगाकर देख सकता है ।

देश भ्रमणसे लौटने पर सबसे प्रथम वाणियों के प्रकाशनका कार्य मैंने सम्बत् १९५३ में लेखनऊसे आरम्भ किया था—उस समय मूलरमैनीकवीरसंग्रह, (१०८ अंगकी साखी) आदि प्रकाशित करके जो निवेदन निकाला था सो यह है ।

निवेदन जो सबसे पहले ग्रन्थ प्रकाशनके पश्चात् निकाला ।

॥ सत्गुरु कवीरसाहबकी दया ॥

बारों तन मन धन सबै, पद परखावन हार ।

युग अनन्त जो पवित्र, बिनगुरु नहि निस्तार ॥

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