कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(८)
प्रस्तावना ।
महाशय !
जबसे कलियुग ने अपना राज्य पाया, तब से भारत वर्ष से सत्य धर्म और विचार विद्याका लोप होने लगा और अनेक प्रकारके हिंसा और दम्भ युक्त स्वार्थ साधक मत फैलने लगे, जिससे सत्यपुरुष, सच्चिदानन्द सदगुरुकी सेवाको छोड़, बहुतसे हिंसक देवताओंकी कल्पना कर, उनके बहानेसे नित्य प्रति करोड़ों जीवोंकी हिंसा होने लगी, जिससे लोगोंकी बुद्धि तमोगुणी हो, सत्य धर्मके समझनेमें असमर्थ हो गयीं ॥ वेद शास्त्रका पढ़ना विचारना जाता रहा, सत्यमार्गका लोप होने लगा और उसकी यहाँ तक बूढ़ी हुई कि, भारत वर्षके लाखों आदमी अपने पवित्र सनातनधर्मको छोड़ (अपने धर्मके प्रभावको न जाननेके कारण) परमधर्म को स्वीकार करने लगे ॥
परन्तु इस प्रवाहको रोकनेवाला, बादशाह सिकन्दर लोदीके पहिले तक, कोई खड़ा नहीं हुआ सिकन्दरके समयमें सदगुरु सत्यकवीर साहेब प्रकट हुए और इतने प्रसिद्ध हुये कि, भारत वर्षका एक बच्चा भी आज कल उनके नामको जानता और उनके पदोंको गाय गायकर आनन्द प्राप्त करता है बड़े बूढ़ोंका तो कहनाही क्या है । उन्होंने उस समय उन नानाप्रकारके, पाखण्ड हिंसा युक्त धर्मोंमें पड़े जीवोंको, सत्य विचार हीन हो दुःख भोगते देख, कर्णुणकर सर्वके हितका शोच किया ।
संसारी पारख बिना कैसे पावें ठौर ।
विविध युक्ति अनमिल सबे भोगर्वाहि और के और ॥
और सत्यका उपदेश देना आरम्भ कर दिया ।
और सरल देश भाषामें वेद शास्त्रोंके सिद्धांत तथा लोक परलोकमें सुख देनेवाले अनेक ग्रन्थ तथा सहस्रशः शब्द पर भजन आदिकी रचनाकर लोगोंको सत्य मार्ग सुझाया और पाखण्डको दूर किया ।
जिसका फल यह हुआ कि, सहस्रों मनुष्योंने फिर अपने पवित्र धर्मकी तरफ लौट कर पर धर्मको छोड़ अपने हिन्दू धर्मको ग्रहण किया ।
जिसका सबूत यद्यपि उपस्थित है कि, सहस्रशः मुसलमान कवीर पंथी, जिनका व्यवहार वर्तमान है, चाल-चलन, आचार-विचार सब हिन्दू के समान और अहिंसक, मद्यमांस त्यागी तो ऐसे हैं कि, मद्य मांसाहारियोंके साथ भोजन तक नहीं करते ।
और इसी प्रभावके ऊपरसे कवीरपंथकी भी स्थापना हुई और तबसे सन्तों ने बहुतसे ग्रंथ आदि रचना किया, जिससे हिन्दू धर्मका बहुत बड़ा उपकार हुआ ।