कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना ।
(९)
इन सब उपकार तथा दयाको न विचार, आज कल बहुतसे महाशयोंने, विना तहकीक किये विना शोचे अनेक कपोल कल्पित बातें गढ़ंत कर, उन ग्रन्थों तथा वचनोंका निरादर तथा निन्दा करना आरम्भ कर दिया है ।
परन्तु ये लोग ऐसा क्यों करते हैं ? इसका कारण क्या है ? क्या वे जान कर निन्दा करते हैं ? इन प्रश्नोंके उत्तरको यदि हम विचार कर देखें तो केवल यही उत्तर देंगे कि, नहीं वे जानकर निन्दा नहीं करते, परन्तु सुनी सुनाई बातों के ऊपर आक्षेप करते हैं, जिनमें प्रायः बही बातें होती हैं । कि, जो कोई २ बुद्धिहीन असारप्राही पक्षपाती अपने स्वभावानुसार एक दूसरेकी निन्दामें कहा करते हैं । और इसी तरह से सब धर्मों के विषय में कहा जा सकता है । और उन्होंने सुनी सुनाई बातोंके ऊपर न जाकरके सच्चे दिल से पक्ष छोड़ विचार किया है, वे कभी निन्दा का नाम नहीं लेते जैसा नाभा जी अपने भक्तमाल में लिखते हैं ॥
छप्पय ।
भक्ति बिमुख धर्म सब अधर्म करि गायो ।
योग यज्ञ व्रत दान भजन बिनु तुच्छ बतायो ॥
हिन्दू तुरुक परमाण रमैनी शब्दे साखी ।
पक्षपात नहीं करी सबनके हितकी भाखी ॥
आरुढ दशा होय जगतमें मुख देखी नाहि न भनी ।
कबीर कानि राखी नहीं बर्ण आश्रम षट दशनी ॥
अब इसका विचार करना कि, क्या कारण है कि, आज कलके लोग कबीर साहेब के आशयको न समझ कर, निन्दा पर कमर बांधके खड़े होते हैं ? इसका कारण सिवाय इसके कि, उन्होंने ग्रन्थ तथा सद्गुरु कबीर साहेबकी वाणी का विचार नहीं किया है, दूसरा कुछ नहीं हो सकता ॥
परन्तु मैं उनका भी इसमें दोष नहीं देता क्योंकि, आज कल प्रेस होजानेसे लोगोंको छपा पुस्तकें कि, जो थोड़ेही परिश्रममें प्राप्त होती हैं देखनेको स्वभाव पड गया है, किन्तु आजतक कबीर साहेबके ग्रन्थ छपे नहीं हैं जिससे सर्व साधारण उन्हें देख, उनके आशयको समझ मिथ्या पक्षको छोड़ निन्दा विरक्त होंवें ॥
इस हेतु, ग्रन्थके मिलनेके अभावको दूर करनेके लिये, मैंने अत्यंत परिश्रम से ग्रन्थोंको इकट्ठा किया है और छपवानेको भी आरम्भ कर दिया है, जिनमेंसे कई एक पुस्तकें छपकर तैयार हो गई हैं और सब छापी जाएही हैं और क्रमशः छपती रहेंगी ॥
अब सर्व महशयोंसे केवल इतना कहना चाहता हूं कि, यदि आप सच्चे