भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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प्रस्तावना ।

(११)

बम्बई ले आये और कबीरमन्शूरकी छपाई आगे चली । जो कुछ पीछे छप चुका था, वह एक ऐसे सज्जनद्वारा अनुवाद कराया गया था जिसको धर्मकी गन्धर्भी नहीं लगी थी । इसलिये आवश्यकता तो इस बात की थी कि, सब फिरसे शुद्ध करके दुबारा छपाया जाय, किन्तु, इसमें सेठजीको बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ती थी, इस कारण मकनजीको समझा बुझाकर विशेष २ फार्म जिनमें बहुतही अशुद्धियाँ थीं छपवाकर शेष वैसेही रखना पड़ा । जो आजतक वैसेही हैं इस भेदको न जाननेवाले कतिपय महात्माओंने, मेरे ऊपर कटाक्षकर पत्रोंमें लेख भी छपवाये हैं किन्तु, मैंने उन्हें अनजान जानकर उत्तर तक नहीं दिया है । अब मैंने फिरसे कबीरमन्शूरको हाथमें लिया है और मूलसे बराबर मिलाकर, टीका टिप्पणी और प्रमाणोंसहित तैय्यार किया है, सद्गुरुकी कृपा होगी तो थोड़े दिनोंमें प्रकाशित भी हो जायगा ।

कबीरमन्शूरके पश्चातही “कबीरोपासनापद्धति” मकनजी कुबेर पेन्टरके अनुरोधसे लिखना पड़ा था । उस समय श्री १०८ पंथी उग्रनाम साहबकी सेवामें कुदरमाल जानेकी जल्दी थी, क्योंकि इन्दौर कबीरमन्दिरके भूत पूर्व आचार्य सद्गुरु श्रीमहंत शम्भु दासजी साहबने वहां चलनेकी सूचना दीथी और भुसावलमें मिलनेकी बात निश्चित होगयी थी । इस लिये कबीरोपासनाके छापनेमें इतनी जल्दी की गयी कि, केवल आठ दिनोंमेंही ग्रन्थकी लिखाई छपाई सब होगयी और मैं कुदरमालको रवाना हो गया । पंथी उग्रनाम साहबका दर्शन तो दश बारह वर्ष पश्चात् रँगनिया मठपर हो चुका था किन्तु महंत श्री शम्भु दासजी साहबका दर्शन सबसे पहले कुदरमालमेंही हुआ । फिर तो पंथीकी आज्ञा और श्रीयुत महंत साहबकी सम्मतिसे, इस अनुचर द्वारा १५६० के कबीरपंथी संतसमागमका आयोजन हुआ । कबीरपंथमें यह समागम ऐसा था जो न भूतो न भविष्यति ।

कुदरमालकी महा संतसमागमसे लौटकर श्रीवेंकटेश्वर प्रेसमें कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन आरम्भ हुआ । जिसके परिणाम स्वरूप श्रीवेंकटेश्वर प्रेसकी सूचीमें, कबीरपंथी ग्रन्थोंका विभागही अलग हुआ । इतनेही नहीं कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन और उठाव देखकर बनारस, पटना, दर्भङ्गा, इलाहाबाद, कानपुर, नरसिंधपुर, लाहौर, स्यालकोट, अहमदाबाद, भावनगर, बडोदा, सूरत-आदि स्थानोंसेभी कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन आरम्भ होगया, जिसके परिणाम स्वरूप सैकड़ों कबीरपंथी ग्रन्थ आज बुकसेलरोंकी दूकानोंमें हाथोहाथ विकते देखे जाते हैं ।

उस समय पहले पहले जब ग्रन्थ प्रकाशित होने लगे, कबीरपंथी समाजमें