भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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ग्रस्तावना ।

(१३)

कामको करता तो ये रुपये उसीके घर तो जाते । किन्तु काल भगवानके जाल, संसारी मान पान राग भोगसे उन्हें फुरसत ही कब है कि, इस ओर ध्यान देने । काल निरञ्जनने कबीर साहबसे कहाही था कि, ।

बिनतौ एक करौं तुहि ताता । दिठ करि मानो हमरी बाता ॥ कहा तुम्हार जीव नहिं भनि हैं । हमरी ओर होय बादबखनिहैं ॥ दिठ बन्धन में रचा बनाई । जामें जीव रहै उरझाई ॥ जो ज्ञानी जैहो संसार । जीव न माने बचन तुम्हारा ॥ पंथ एक तुम आप चलाऊ । जीवन लै सतलोक पठाऊ ॥ द्वादश पंथ करौं मैं साजा । नाम तुम्हारा ले करौं अवाजा ॥ द्वादश जन्म संसार पठैहों । नाम तुम्हार ले पंथ चलैहों ॥ यहि बिधि जीवनको भरमाऊँ । पुरुष नाम जीवन समझाऊँ ॥ द्वादश पंथ जीव जो ऐहैं । सो हमरे मुख आन समैहैं ॥

मुझे तो, ऐसे नाममात्रके कबीरपंथी, जो काल और मायामें फँस कर, केवल सांसारिक स्वार्थके लिये मर रहे हैं, उनसे वे लोग अच्छे जान पड़ते हैं जो कबीर पंथी न कहलाने पर भी चाहे व्यापारिक लाभ की ही कामना से क्यों न हो कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन करके, कबीर धर्मका प्रचार कर रहे हैं। मैं तो विशेष रूपसे श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके मालिकोंको हृदयसे धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने दर्जनों ग्रन्थ प्रकाशित कर, तीस वर्षोंसे लाखों प्रति कबीरपन्थियों तक पहुँचाया है ।

इस ग्रन्थके छापनेके लिये यद्यपि मुझे तीन वर्षतक प्रतीक्षापूर्वक बम्बई सेवन करना पड़ा है, तथापि ज्यों त्यों करके इतना भी छप गया है । आशा तो थी कि, कबीरमन्शूर, कबीरभानुप्रकाश, कबीरकौमुदी, तालीम कबीर कलियुग आदि सहित, संग्रहित चालीसहजार शब्दोंको छपवा देता और श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके स्वामी खुशीसे छापते जिससे उनको व्यापारिक लाभ था किन्तु वर्तमान काल और वस्तु स्थितिको देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता ।

कुछ भी हो मैंने आरम्भसेही अपना जीवन इसी कार्यके लिये अर्पण कर दिया है तब “जब तक जीना तबतक सीना” वाली कहावतके अनुसार, प्रयत्नसे न रुकूँगा और एक जगह नहीं दूसरी नहीं तीसरी जहाँ होगा जमीन आस्मान एक करके ग्रन्थोंको, जहांतक हो सकेगा, छपवा करही छोड़ूँगा क्योंकि इस समय