कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 437, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४०९ प्रकार जाननेवाला जो साधक 'उद्गीथ' शब्दके इन तीनों अक्षरोंकी उद्गीथ—ओंकारवाच्य परमात्माके रूपमें उपासना करता है, उसके लिये वाणी अपना सारा रहस्य प्रकट कर देती है, अर्थात् उसके सामने समस्त वेदोंका तात्पर्य अपने-आप प्रकट हो जाता है । तथा वह सब प्रकारकी भोग सामग्रीसे एव उसे भोगनेकी शक्तिसे भी सम्पन्न हो जाता है ॥ ६-७ ॥ अब कामनाओंकी उत्तम सिद्धिका निश्चित साधन बताया जाता है । इसके लिये उपासनाके जो सात अङ्ग आगे बताये जानेवाले हैं, उन्हें ध्यानमें रखना चाहिये । उनमेंसे पहला अङ्ग यह है कि जिस सामके द्वारा साधक अपने इष्टदेवकी स्तुति करना चाहता हो, उसे सदा याद रक्खे । दूसरी बात यह है कि वह साम—गाये जानेवाला मन्त्र जिस ऋचामे प्रतिष्ठित हो, उस ऋचाको भी ध्यानमें रक्खे । तीसरी बात यह है कि जिस ऋषिके द्वारा उस मन्त्रका साक्षात्कार किया गया हो, उस ऋषिको स्मरण रक्खे । चौथी बात यह है कि उस सामगानके द्वारा जिस देवताकी स्तुति करना उपासकको अभीष्ट हो, उस देवताका भलीभाँति स्मरण रक्खे । पाँचवीं बात यह है कि जिस छन्दवाले मन्त्रसे वह स्तुति करना चाहता हो, उस छन्दको स्मरण रक्खे और छठी बात यह है कि सामवेदके जिस स्तोत्र-समूहसे स्तुति की जानेवाली हो, उस स्तुति-समूहको भी ध्यानमें रक्खे । सातवीं बात यह है कि जिस ओर मुख करके स्तुति करनेका विचार हो, उस दिशाका भी ध्यान रक्खे। अन्तमें प्रमादरहित अर्थात् सावधान होकर अपनी अभिलाषाको याद रखते हुए परमात्माके समीप जाकर अर्थात् ध्यानके द्वारा उनमें स्थित होकर स्तुति करनी चाहिये। क्योंकि इस प्रकार स्तुति करनेवाला उपासक जिस कामनासे स्तुति करता है, उसकी वह कामना शीघ्र ही पूर्णतया सफल हो जाती है ॥ ८-१२ ॥ चतुर्थ खण्ड ओंकारके आश्रयसे अमृतत्वकी प्राप्ति 'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ है, यों समझकर उसकी उपासना करनी चाहिये, क्योंकि यज्ञमें उद्गाता नामक ऋत्विज् 'ॐ' इस अक्षरका ही उच्चस्वरसे गान करता है । उस ओंकारकी व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥ यह प्रसिद्ध है कि मृत्युसे डरते हुए देवताओंने ऋक्, यजुः और सामरूप तीनों वेदोंमें प्रवेश किया—उनका आश्रय लिया । उन्होंने गायत्री आदि भिन्न-भिन्न छन्दोंके मन्त्रोंसे अपनेको ढक लिया—उन्हें अपना कवच बनाया। उन्होंने जो भिन्न भिन्न छन्दोंसे युक्त मन्त्रोंद्वारा अपनेको आच्छादित कर लिया, इसीसे वे 'छन्द' कहलाये । जो आच्छादन करे, वही छन्द—यह 'छन्दस्' शब्दकी व्युत्पत्ति है ॥ २ ॥ जिस प्रकार मछली पकड़नेवाला धीवर जलके भीतर भी मछलीको देख लेता है, उसी प्रकार देवताओंको मृत्युने उन ऋक्, साम एव यजुर्वेदके मन्त्रोंकी ओटमें भी देख लिया— वहाँ भी उसने इनका पिण्ड नहीं छोड़ा । वे देवतालोग भी इस बातको जान गये, अतः ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रोंसे ऊपर उठकर वे स्वरमें अर्थात् ओंकारमें ही प्रविष्ट हो गये ॥ ३ ॥ जब कोई ऋक्का—ऋग्वेदके मन्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब वह निःसन्देह 'ॐ' इस प्रकार ही उच्चस्वरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार सामको और वैसे ही यजुर्वेदको जाननेवाला भी 'ॐ' का ही गान करता है । इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि जो यह ओंकाररूप अक्षर अर्थात् उसका वाच्यभूत परमात्मा है, वही ऊपर बताया हुआ स्वर है, वही अमृत—मृत्युसे छुड़ानेवाला एव भयरहित स्थान है । उसका आश्रय लेकर देवतालोग अमर और निर्भय हो गये । जो ओंकारको इस रूपमें जानकर उसके अर्थभूत अविनाशी परमेश्वरकी स्तुति एव उपासना करता है तथा एकमात्र इसी अमृतरूप, सर्वथा भयरहित एव अविनाशी परमात्माके स्वरूपभूत इस स्वरमें प्रविष्ट हो जाता है—उसकी शरणमें चला जाता है, वह उसमें प्रवेश करके उसी अमृतको प्राप्त कर लेता है, जिस अमृतको पूर्वोक्त प्रकारसे देवताओंने प्राप्त किया था ॥ ४-५ ॥ पञ्चम खण्ड सूर्य एवं प्राणके रूपमें ओंकारकी उपासना अब ओंकारकी उपासनाका अन्य प्रकार बताया जाता है। निश्चय ही जो उद्गीथ—गाने योग्य परमात्मा है, वही प्रणव— ओंकार है और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है—यों समझना चाहिये, क्योंकि नाम और नामीमें कोई भेद नहीं होता । उ० अ० ५२—५३—