भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 447

खण्ड २२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१९ एकोनविंश खण्ड यज्ञायज्ञीय-सामोपासना लोम हिंकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मास उद्गीथ है, अस्थि टेढा-मेढ़ा नहीं होता, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल प्रतिहार है और मज्जा निधन है । यह यज्ञायज्ञीय साम अङ्गोंमें जीवन व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है। वर्ष भरतक अनुस्यूत है । वह पुरुष, जो इस प्रकार इस यज्ञायज्ञीय सामको मासभक्षण न करे—यह व्रत है, अथवा कभी भी मासभक्षण अङ्गोंमें अनुस्यूत जानता है, अङ्गवान् होता है। वह अङ्गोंसे न करे—ऐसा व्रत है ॥ १-२ ॥ विंश खण्ड राजन-सामोपासना अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, सालोक्य, साष्टित्व (तुल्य ऐश्वर्य) और सायुज्यको प्राप्त हो जाता है। वह पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन नक्षत्र प्रतिहार हैं, चन्द्रमा निधन है—यह राजन साम व्यतीत करता है, प्रजा और पशुओंके द्वारा महान् होता है देवताओंमे अनुस्यूत है। वह पुरुष, जो इस प्रकार इस तथा कीर्तिके द्वारा भी महान् होता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा न राजनसामको देवताओंमें अनुस्यूत जानता है, उन्हीं देवताओके करे—यह व्रत है ॥ १-२ ॥ एकविंश खण्ड सबमें अनुस्यूत सामकी उपासना त्रयीविद्या हिंकार है, ये तीन लोक प्रस्ताव हैं, अग्नि, विषयमें यह मन्त्र भी है—जो पाँच प्रकारके तीन-तीन बतलाये वायु और आदित्य ये उद्गीथ हैं। नक्षत्र, पक्षी और किरणें गये हैं, उनसे श्रेष्ठ तथा उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है। ये प्रतिहार हैं। सर्प, गन्धर्व और पितृगण—ये निधन हैं। यह जो उसे जानता है वह सब कुछ जानता है । उसे सभी दिशाएँ सामोपासना सर्वमें अनुस्यूत है। वह, जो इस प्रकार सबमें बलि समर्पित करती हैं। 'मै सब कुछ हूँ' इस प्रकार उपासना अनुस्यूत इस सामको जानता है, सर्वरूप हो जाता है। इस करे—यह व्रत है, यह व्रत है ॥ १-४ ॥ द्वाविंश खण्ड अग्नि-सम्बन्धी उद्गीथ सामके 'विनर्दि' नामक गानका वरण करता हूँ, वह कोई पुरुष स्वरोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे तो वह उससे पशुओंके लिये हितकर है और अग्निदेवतासम्बन्धी उद्गीथ कहे कि 'मैं इन्द्रके शरणागत हूँ वही तुझे इसका उत्तर देगा।' है । प्रजापतिका उद्गीथ अनिरुक्त है, सोम निरुक्त है, वायुका और यदि कोई इसे ऊष्मवर्णोंके उच्चारणमें दोष प्रदर्शित करे मृदुल और श्लक्ष्ण (सरलतासे उच्चारण किये जाने योग्य) तो उससे कहे कि 'मैं प्रजापतिके शरणागत था वही तेरा मर्दन है, इन्द्रका श्लक्ष्ण और बलवान् है, बृहस्पतिका क्रौञ्च करेगा।' और यदि कोई इसे स्पर्शोंके उच्चारणमे उलाहना दे (क्रौञ्चपक्षीके शब्दके समान) है और वरुणका अपध्वान्त तो उससे कहे कि 'मैं मृत्युकी शरणको प्राप्त था, वही तुझे (भ्रष्ट) है। इन सभी उद्गीथोंका सेवन करे, केवल वरुण- दग्ध करेगा।' सम्पूर्ण स्वर घोषयुक्त और बलयुक्त उच्चारण सम्बन्धी उद्गीथका ही परित्याग कर दे। मै देवताओंके लिये किये जाने चाहिये, अत. [उनका उच्चारण करते समय] अमृतत्वका आगान (साधन) करूँ—इस प्रकार चिन्तन 'मैं इन्द्रमें बलका आधान करूँ' ऐसा [चिन्तन करना करते हुए आगान करे । पितृगणके लिये स्वधा, मनुष्योंके चाहिये]। सारे ऊष्मवर्ण अग्रस्त, अनिरस्त एव विवृतरूपसे लिये आशा (उनकी इष्ट वस्तुओं), पशुओंके लिये तृण और उच्चारण किये जाते हैं [अतः उन्हें बोलते समय ऐसा चिन्तन जल, यजमानके लिये स्वर्गलोक और अपने लिये अन्नका करना चाहिये कि] 'मै प्रजापतिको आत्मदान करूँ।' समस्त आगान करूँ—इस प्रकार इनका मनसे ध्यान करते हुए स्पर्शवर्णोंको एक-दूसरेसे तनिक भी मिलाये विना ही बोलना प्रमादरहित होकर स्तुति करे। सम्पूर्ण स्वर इन्द्रके आत्मा हैं, चाहिये और उस समय 'मै मृत्युसे अपना परिहार करूँ' समस्त ऊष्मवर्ण प्रजापतिके आत्मा हैं, समस्त स्पर्शवर्ण मृत्युके [ऐसा चिन्तन करना चाहिये] ॥ १-५ ॥ -आत्मा हैं। [इस प्रकार जाननेवाले] उस उद्गाताको यदि