कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 449, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ तृतीय अध्याय प्रथम खण्ड आदित्यकी मधुरूपमें कल्पना ॐ यह आदित्य निश्चय ही देवताओंका मधु है । द्युलोक अमृत ही जल हे । उन इन ऋक् [ -रूप मधुकरो ] ने ही ही उसका तिरछा बाँस है [ जिसपर कि वह लटका हुआ इस ऋग्वेदका अभिताप किया । उस अभितप्त ऋग्वेदसे यश, है ], अन्तरिक्ष छत्ता है और किरणें [ उसमे रहनेवाले ] तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । वह मक्खियोंके बच्चे हैं । उस आदित्यकी जो पूर्वदिशाकी किरणे ( यश आदि रस ) विशेषरूपमे गया । उसने [ जाकर ] हैं, वे ही इस ( अन्तरिक्षरूप छत्ते ) के पूर्वदिशावर्ती छिद्र आदित्यके [ पूर्व ] भागमें आश्रय लिया । यह जो आदित्यका हैं । ऋक् ही मधुकर हे, ऋग्वेद ही पुष्प है, वे मोम आदि लाल रूप है, वही यह ( रस ) है ॥ १-४ ॥ द्वितीय खण्ड आदित्यकी दक्षिणस्थित किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि तथा इसकी जो दक्षिण दिशाकी किरणे ह, वे ही इसकी अभितप्त यजुर्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप दक्षिणदिशावर्तिनी मधुनाडियाँ हैं, यजु श्रुतियाँ ही मधुकर ह, रस उत्पन्न हुआ । उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और यजुर्वेद ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही जल है। आदित्यके [दक्षिण] भागमे आश्रय लिया। यह जो आदित्यका उन इन यजुःश्रुतियोंने इस यजुर्वेदका अभिताप किया । उस शुक्ल रूप है, यह वही है ॥ १-३ ॥ तृतीय खण्ड पश्चिम ओरकी किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि तथा ये जो इसकी पश्चिम ओरकी रश्मियाँ हैं, वे ही इसकी अभिताप किया । उस अभितप्त सामवेदसे ही यश, तेज, पश्चिमीय मधुनाडियाँ हैं। सामश्रुतियाँ ही मधुकर ह, सामवेद- इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । उस रसने विहित कर्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके [ पश्चिम ] भागमे जल है । उन इन सामश्रुतियोंने ही इस सामवेदविहित कर्मका आश्रय लिया। यह जो आदित्यका कृष्ण तेज है, यह वही है ॥१-३॥ चतुर्थ खण्ड उत्तर दिशाकी किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि तथा इसकी जो उत्तर दिशाकी किरणें हैं, वे ही इसकी पुराणरूप पुष्प ] से ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और उत्तर दिशाकी मधुनाडियाँ है। अथर्वाङ्गिरस श्रुतियाँ ही मधुकर अन्नाद्यरूप रसकी उत्पत्ति हुई । उस रसने विशेषरूपसे हैं, इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं तथा वह [ सोमादिरूप ] गमन किया और आदित्यके [ उत्तर ] भागमे आश्रय अमृत ही जल है। उन इन अथर्वाङ्गिरस श्रुतियोंने ही इस लिया । यह जो आदित्यका अत्यन्त कृष्ण रूप है, यह इतिहास-पुराणको अभितप्त किया। उस अभितप्त हुए [इतिहास- वही है ॥ १-३ ॥ पञ्चम खण्ड ऊर्ध्वरश्मियोंमें मधुनाडी-दृष्टि तथा इसकी जो ऊर्ध्वरश्मियाँ हैं, वे ही इसकी ऊपरकी उन इन गुह्य आदेशोंने ही इस [ प्रणवसंज्ञक ] ब्रह्मको ओरकी मधुनाडियाँ है। गुह्य आदेश ही मधुकर हैं, [ प्रणवरूप ] अभितप्त किया । उस अभितत्त ब्रह्मसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, ब्रह्म ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही जल है। वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ। उस रसने विशेषरूपसे