कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 452, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४२४ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३
त्रयोदश खण्ड पञ्चप्राणोंकी उपासना
उस इस प्रसिद्ध हृदयके पाँच देवसुषि ह । इसका जो पूर्वदिग्नावर्ती सुषि (छिद्र) है वह प्राण है, वह चक्षु है, वह आदित्य है, वही यह तेज और अन्नाद्य है—इस प्रकार उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है [अर्थात् इस प्रकार इनकी उपासना करता है] वह तेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है । तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है वह व्यान है, वह श्रोत्र है, वह चन्द्रमा है और वही यह श्री एव यश है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । जो ऐसा जानता है वह श्रीमान् और यशस्वी होता है। तथा इसका जो पश्चिम छिद्र है वह अपान है, वह वाक् है, वह अग्नि है और वही यह ब्रह्मतेज एव अन्नाद्य है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो ऐसा जानता है वह ब्रह्मतेजस्वी और अन्नका भोक्ता होता है। तथा इसका जो उत्तरी छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मेघ है, और वही यह कीर्ति और व्युष्टि (देहका लावण्य) है— इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह कीर्तिमान् और कान्तिमान् होता है। तथा इसका जो ऊर्ध्व छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है और वही यह ओज और तेज है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी और तेजस्वी होता है । वे ये पाँच ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोकके द्वारपाल ह । यह जो कोई भी स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच ब्रह्मपुरुषोंको जानता है उसके कुलमे वीर उत्पन्न होता है। जो इस प्रकार स्वर्गलोकके द्वारपाल इन पाँच पुरुषोंको जानता है वह स्वर्गलोकको प्राप्त होता है। तथा इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर यानी सबके ऊपर, जिनमे उत्तम कोई दूसग लोक नहीं है ऐसे उत्तम लोकोमे प्रकाशित हो रही है वह निश्चय यही है जो कि इस पुरुषके भीतर ज्योति है। उस इस (हृदयस्थित पुरुष) का यही दर्शनोपाय हे जब कि [मनुष्य] इस शरीरमे स्पर्शद्वारा उष्णताको जानता है तथा यही उसका श्रवणोपाय है जब कि यह कानोंको मूँदकर निनद (रथके घोष), नदथु (बैलके डकराने) और जलते हुए अग्निके शब्दके समान श्रवण करता है, वह यह ज्योति दृष्ट और श्रुत है—इस प्रकार इसकी उपासना करे । जो उपासक ऐसा जानता है [इस प्रकार उपासना करता ह] वह दर्शनीय और विश्रुत (विख्यात) होता है ॥ १-८॥
चतुर्दश खण्ड जगत्की एवं आत्माकी ब्रह्मरूपमें उपासना
यह सारा जगत् निश्चय ब्रह्म ही है, यह उसीमे उत्पन्न होनेवाला, उसीमे लीन होनेवाला और उसीमें चेष्टा करनेवाला है—इस प्रकार शान्त [राग द्वेषरहित] होकर उपासना करे, क्योंकि पुरुष निश्चय ही क्रतुमय—निश्चयात्मक है; इस लोकमें पुरुष जैसे निश्चयवाला होता है वैसा ही यहाँसे मरकर जानेपर होता है। अतः उसे [पुरुषको] निश्चय करना चाहिये [वह ब्रह्म] मनोमय, प्राणशरीर, प्रकाशस्वरूप, सत्यसङ्कल्प, आकाश- शरीर, सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरम, इस सम्पूर्ण जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाक्रहित और सम्भ्रम- शून्य है, हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे, सरसोंसे, श्यामाकसे अथवा श्यामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा हृदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक अथवा इन सब लोकोंकी अपेक्षा भी बड़ा है जो सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सबको सब ओरसे व्याप्त करने- वाला, वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है वह मेरा आत्मा हृदय- कमलके मध्यमें स्थित है। यही ब्रह्म है, इस शरीरसे मरकर जानेपर में इसीको प्राप्त होऊँगा । जिसका ऐसा निश्चय है, और जिसे इस विषयमे कोई सन्देह भी नहीं है [उसे इसी ब्रह्म- भावकी ही प्राप्ति होती है] ऐसा शाण्डिल्यने कहा है ॥ १-४॥
पञ्चदश खण्ड विराड्रूप कोशकी उपासना
अन्तरिक्ष जिसका उदर है, वह कोश पृथिवीरूप मूलवाला है। वह जीर्ण नहीं होता । दिशाएँ इसके कोण हैं, आकाश ऊपरका छिद्र है। वह यह कोश वसुधान है। उसीमे यह सारा विश्व स्थित है। उस कोशकी पूर्व दिशा 'जुहू' नामवाली है, दक्षिण दिशा 'सहमाना' नामकी है, पश्चिम दिशा 'राज्ञी' नामवाली है तथा उत्तर दिशा 'सुभूता' नामकी है। उन दिशाओंका वायु वत्स है। वह, जो इस प्रकार इस वायुको दिशाओके वत्सरूपसे जानता है, पुत्रके निमित्तसे रोदन नहीं