भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 832 में से

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पृष्ठ 453

खण्ड १७ ] $\qquad$ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * $\qquad$ ४२५ करता । वह मैं इस प्रकार इस वायुको दिशाओंके वत्सरूपसे $\quad$ कहा कि 'मैं भूःकी शरण हूँ' इससे मैंने यही कहा है कि 'मैं जानता हूँ, अतः मैं पुत्रके कारण न रोऊँ । मैं अमुक अमुक $\quad$ पृथिवीकी शरण हूँ, अन्तरिक्षकी शरण हूँ और द्युलोककी शरण अमुकके सहित अविनाशी कोशकी शरण हूँ, अमुक अमुक $\quad$ हूँ' फिर मैने जो कहा कि 'मैं भुवःकी शरण हूँ' इससे यह अमुकके सहित प्राणकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित $\quad$ कहा गया है कि 'मैं अग्निकी शरण हूँ, वायुकी शरण हूँ और भूःकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित भुवःकी शरण $\quad$ आदित्यकी शरण हूँ' तथा मैंने जो कहा कि 'मैं स्वःकी शरण हूँ, अमुक अमुक अमुकके सहित स्वःकी शरण हूँ।* वह मैंने $\quad$ हूँ' इससे 'मैं ऋग्वेदकी शरण हूँ, यजुर्वेदकी शरण हूँ और जो कहा कि 'मैं प्राणकी शरण हूँ' सो यह जो कुछ सम्पूर्ण $\quad$ सामवेदकी शरण हूँ' यही मैंने कहा है ॥ १-७ ॥ भूतसमुदाय है प्राण ही है, उसीकी मैं शरण हूँ तथा मैंने जो $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ षोडश खण्ड $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ पुरुषकी यज्ञरूपमें उपासना निश्चय पुरुष ही यज्ञ है । उसके (उसकी आयुके) जो $\quad$ मध्यमें कभी विच्छिन्न (नष्ट) न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातःसवन हैं । गायत्री चौबीस अक्षरोंवाली $\quad$ उस कष्टसे छूट जाता है और नीरोग हो जाता है ॥ ३-४ ॥ है; और प्रातःसवन गायत्री-छन्दसे संबद्ध है। उस इस प्रातः- $\quad$ इसके पश्चात् जो अड़तालीस वर्ष हैं, वे तृतीय सवन हैं । सवनके वसुगण अनुगत हैं । प्राण ही वसु हैं, क्योंकि ये ही इस $\quad$ जगती-छन्द अड़तालीस अक्षरोंवाला है तथा तृतीय सवन सबको बसाये हुए हैं। यदि इस प्रातःसवनसम्पन्न आयुमें उसे $\quad$ जगती-छन्दसे सम्बन्ध रखता है। इस सवनके आदित्यगण कोई कष्ट पहुँचावे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, 'हे प्राण- $\quad$ अनुगत हैं। प्राण ही आदित्य हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण रूप वसुगण ! मेरे इस प्रातःसवनको माध्यन्दिनसवनके साथ एक- $\quad$ विषयजातको ग्रहण करते हैं। उस उपासकको यदि इस आयु- रूप कर दो; यज्ञस्वरूप मैं आप प्राणरूप वसुओके मध्यमें $\quad$ में कोई [रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, विछिन्न (नष्ट) न होऊँ।' तब उस कष्टसे मुक्त होकर वह नीरोग $\quad$ 'हे प्राणरूप आदित्यगण ! मेरे इस तृतीय सवनको आयुके हो जाता है ॥ १-२ ॥ $\quad$ साथ एकीभूत कर दो । यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप आदित्योंके मध्यमें इसके पश्चात् जो चौवालीस वर्ष हैं, वे माध्यन्दिनसवन हैं। $\quad$ विनष्ट न होऊँ।' ऐसा कहनेसे वह उस कष्टसे मुक्त होकर त्रिष्टुप् छन्द चौवालीस अक्षरोंवाला है और माध्यन्दिनसवन $\quad$ नीरोग हो जाता है ॥ ५-६ ॥ त्रिष्टुप्-छन्दसे सम्बद्ध है । उस माध्यन्दिनसवनके रुद्रगण $\quad$ इस प्रसिद्ध विद्याको जाननेवाले ऐतरेय महिदासने कहा अनुगत हैं। प्राण ही रुद्र हैं, क्योंकि ये ही इस सम्पूर्ण प्राणि- $\quad$ था—'[अरे रोग !] तू मुझे क्यों कष्ट देता है, जो मैं कि इस रोग- समुदायको रुलाते हैं। यदि उस यज्ञकर्ताको इस आयुमे कोई $\quad$ द्वारा मृत्युको प्राप्त नहीं हो सकता।' वह एक सौ सोलह वर्ष [रोगादि] सन्तप्त करे तो उसे इस प्रकार कहना चाहिये, $\quad$ जीवित रहा था, जो इस प्रकार इस सवन-विद्याको जानता है वह 'हे प्राणरूप रुद्रगण ! मेरे इस मध्याह्नकालिक सवनको तृतीय $\quad$ (नीरोग होकर) एक सौ सोलह वर्ष जीवित रहता है ॥ ७ ॥ सवनके साथ एकीभूत कर दो। यज्ञस्वरूप मैं प्राणरूप रुद्रोंके $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ सप्तदश खण्ड $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ आत्मयज्ञके अन्य अङ्ग वह [पुरुष] जो भोजन करनेकी इच्छा करता है, जो $\quad$ समानताको प्राप्त होते हैं। तथा जो तप, दान, आर्जव पीनेकी इच्छा करता है और जो रममाण (प्रसन्न) नहीं $\quad$ (सरलता), अहिंसा और सत्यवचन हैं, वे ही इसकी दक्षिणा होता—वही इसकी दीक्षा है। फिर वह जो खाता है, जो $\quad$ हैं। इसीसे कहते हैं कि 'प्रसूता होगी' अथवा 'प्रसूता हुई' पीता है और जो रतिका अनुभव करता है—वह उपसदोंकी $\quad$ वह इसका पुनर्जन्म ही है, तथा मरण ही अवभृथस्नान है। सदृशताको प्राप्त होता है। तथा वह जो हँसता है, जो भक्षण $\quad$ घोर आङ्गिरस ऋषिने देवकीपुत्र कृष्णको यह यज्ञदर्शन करता है और जो मैथुन करता है—वे सब स्तुतशस्त्रकी ही $\quad$ सुनाकर, जिससे कि वह अन्य विद्याओंके विषयमें तृष्णाहीन

  • इसमें जहाँ-जहाँ 'अमुक' शब्द आया है, वहाँ अपने पुत्रके नामको उच्चारण करना चाहिये । उ० सं० ५४-५५-
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