भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 832 में से

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पृष्ठ 510

ॐ तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण जनकके यज्ञमें याज्ञवल्क्य और अश्वलका संवाद

विदेहदेशमें रहनेवाले राजा जनकने एक बड़ी दक्षिणावाले यज्ञद्वारा यजन किया। उसमें कुरु और पाञ्चाल देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए । उस राजा जनकको यह जाननेकी इच्छा हुई कि 'इन ब्राह्मणोंमें अनुवचन (प्रवचन) करनेमें सबसे बढ़कर कौन है ?' इसलिये उसने एक सहस्र गौएँ गोशालामें रोक लीं। उनमेंसे प्रत्येकके सींगोंमें दस दस पाद सुवर्ण बँधे हुए थे ॥ १ ॥ उसने उनसे कहा—'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपमें जो ब्रह्मनिष्ठ हो, वह इन गौओंको ले जाय।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ। तब याज्ञवल्क्यने अपने ही ब्रह्मचारीसे कहा, 'हे सौम्य सामश्रवा ! तू इन्हें ले जा।' तब वह उन्हें ले चला। इससे वे ब्राह्मण 'यह हम सबमें अपनेको ब्रह्मनिष्ठ कैसे कहता है' इस प्रकार कहते हुए क्रुद्ध हो गये। विदेहराज जनकका होता अश्वल था, उसने याज्ञवल्क्यसे पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! हम सबमें क्या तुम ही ब्रह्मनिष्ठ हो ?' उसने कहा, 'ब्रह्मनिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी ही इच्छावाले हैं।' इसीसे होता अश्वलने उससे प्रश्न करनेका निश्चय किया ॥ २ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह सब जो मृत्युसे व्याप्त है, मृत्युद्वारा स्वाधीन किया हुआ है, उस मृत्युकी व्याप्तिका यजमान किस साधनसे अतिक्रमण करता है?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'वह यजमान होता ऋत्विकूरूप अग्निसे और वाक्‌से उसका अतिक्रमण कर सकता है । वाक् ही यज्ञका होता है, यह जो वाक् है, वही यह अग्नि है, वह होता है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ३ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब दिन और रात्रिसे व्याप्त है, सब दिन और रात्रिके अधीन है। तब किस साधनके द्वारा यजमान दिन और रात्रिकी व्याप्तिका अतिक्रमण कर सकता है ?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'अध्वर्यु ऋत्विक् और चक्षुरूप आदित्य- के द्वारा । अध्वर्यु यज्ञका चक्षु ही है। अतः यह जो चक्षु है, वह यह आदित्य है और वह अध्वर्यु है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ४ ॥

'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षसे व्याप्त है, सब पूर्वपक्ष और अपर- पक्षद्वारा वशमे किया हुआ है। किस उपायसे यजमान पूर्वपक्ष और अपरपक्षकी व्याप्तिसे पार होकर मुक्त होता है ?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'उद्गाता ऋत्विकूसे और वायुरूप प्राणसे; क्योकि उद्गाता यज्ञका प्राण ही है। तथा यह जो प्राण है, वही वायु है, वही उद्गाता है, वही मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ५ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो अन्तरिक्ष है, वह निरालम्ब सा है। अतः यजमान किस आलम्बनसे स्वर्गलोकमें चढता है ?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'ब्रह्मा ऋत्विजके द्वारा और मनरूप चन्द्रमासे । ब्रह्मा यज्ञका मन ही है। और यह जो मन है; वही यह चन्द्रमा है, वह ब्रह्मा है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है।' इस प्रकार अतिमोक्षोंका वर्णन हुआ, अब सम्पदोंका निरूपण किया जाता है ॥ ६ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज कितनी ऋचाओके द्वारा होता इस यज्ञमें शस्त्र शसन करेगा ?' [ याज्ञवल्क्यने कहा—] 'तीनके द्वारा।' [ अश्वल—] 'वे तीन कौन-सी हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या।' [ अश्वल— ] 'इनसे यजमान किसको जीतता है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'यह जितना भी प्राणिसमुदाय है [ उस सबको जीत लेता है] ' ॥ ७ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमे यह अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ होम करेगा ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'तीन।' [ अश्वल—] 'वे तीन कौन कौन-सी है ?' [ याज्ञ- वल्क्य— ] 'जो होम की जानेपर प्रज्वल्लित होती हैं, जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं और जो होम की जानेपर पृथ्वीके ऊपर लीन हो जाती हैं।' [ अश्वल—] 'इनके द्वारा यजमान किसको जीतता है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं, उनसे यजमान देवलोकको ही जीत लेता है, क्योंकि देवलोक मानो देदीप्यमान हो रहा है। जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे वह पितृलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि पितृलोक मानो अत्यन्त