पृष्ठ 513ब्राह्मण २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४७७
शब्द करनेवाला है । जो होम की जानेपर पृथ्वीपर लीन हो
जाती हैं, उनसे मनुष्यलोकको ही जीतता है क्योंकि मनुष्यलोक
अधोवर्ती-सा है' ॥ ८ ॥
'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज यह ब्रह्मा यज्ञमें
दक्षिणकी ओर बैठकर कितने देवताओंद्वारा यज्ञकी रक्षा करता
है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'एकके द्वारा ।' [ अश्वल— ] 'वह
एक देवता कौन है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'वह मन ही है।
मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त हैं, अत उस मनसे
यजमान अनन्त लोकको जीत लेता है' ॥ ९ ॥
'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमे
उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा ?'
[ याज्ञवल्क्य— ] 'तीनका ।' [ अश्वल— ] 'वे तीन कौन-सी
हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी
शस्या ।' [ अश्वल—] 'इनमें जो शरीरान्तर्वर्ती है, वे कौन-सी
हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'प्राण ही पुरोनुवाक्या है, अपान
याज्या है और व्यान शस्या है।' [अश्वल—] 'इनसे यजमान
किनपर जय प्राप्त करता है?' [याज्ञवल्क्य—] 'पुरोनुवाक्यासे
पृथिवीलोकपर ही जय प्राप्त करता है, तथा याज्यासे अन्तरिक्ष-
लोकपर और शस्यासे द्युलोकपर विजय प्राप्त करता है।' इसके
पश्चात् होता अश्वल चुप हो गया ॥ १० ॥
द्वितीय ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य और आर्तभागका संवाद
फिर उस (याज्ञवल्क्य) से जारत्कारव आर्तभागने पूछा,
वह बोला, 'याज्ञवल्क्य ! ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने
हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह
हैं।' [ आर्तभाग—] 'वे जो आठ ग्रह और आठ अतिग्रह
हैं, वे कौन-से हैं ?' ॥ १ ॥
प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप अतिग्रहसे गृहीत है,
क्योंकि प्राणी अपानसे ही गन्धोंको सूँघता है। वाक् ही ग्रह है,
वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी वाक्से ही
नामोका उच्चारण करता है। जिह्वा ही ग्रह है, वह रसरूप
अतिग्रहमे गृहीत है, क्योंकि प्राणी जिह्वासे ही रसोंको विशेष-
रूपसे जानता है। चक्षु ही ग्रह है, वह रूप-रूप अतिग्रहसे गृहीत
है, क्योंकि प्राणी चक्षुसे ही रूपोंको देखता है। श्रोत्र ही ग्रह
है, वह शब्दरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योकि प्राणी श्रोत्रसे ही
शब्दोंको सुनता है। मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे
गृहीत है, क्योंकि प्राणी मनसे ही कामोंकी कामना करता है।
हस्त ही ग्रह है, वे कर्मरूप अतिग्रहसे गृहीत हैं क्योंकि
प्राणी हस्तसे ही कर्म करता है। त्वचा ही ग्रह है, वह स्पर्शरूप
अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी त्वचासे ही स्पर्शोको जानता
है। इस प्रकार ये आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं ॥ २-९ ॥'
'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'यह जो कुछ है
सब मृत्युका खाद्य है, सो वह देवता कौन है, जिसका खाद्य
मृत्यु है ?' [इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'अग्नि ही मृत्यु है,
वह जलका खाद्य है। [ इस प्रकारके जानसे ] पुनर्मृत्युका
पराजय होता है' ॥ १० ॥
'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह
मनुष्य मरता है, उस समय इसके प्राणोंका उत्क्रमण होता है
या नहीं ?' 'नहीं, नहीं' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'वे यहाँ ही
लीन हो जाते हैं। वह फूल जाता है अर्थात् वायुको भीतर
खींचता है और वायुसे पूर्ण हुआ ही मृत होकर पड़ा
रहता है' ॥ ११ ॥
'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह
पुरुष मरता है, उस समय इसे क्या नहीं छोड़ता ?'
[ याज्ञवल्क्य— ] 'नाम नहीं छोड़ता, नाम अनन्त ही हैं,
विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं, इस आनन्त्यदर्शनके द्वारा वह
अनन्त लोकको ही जीत लेता है' ॥ १२ ॥
'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय इस
मृतपुरुषकी वाणी अग्निमें लीन हो जाती है तथा प्राण वायुमें,
चक्षु आदित्यमे, मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामे, शरीर पृथिवीमे,
हृदयाकाश भूताकाशमें, रोम ओषधियोंमें और केश वनस्पतियोंमें
लीन हो जाते हैं तथा रक्त और वीर्य जलमें स्थापित हो
जाते हैं, उस समय यह पुरुष कहाँ रहता है ?' [याज्ञवल्क्य—]
'प्रियदर्शन आर्तभाग ! तू मुझे अपना हाथ पकड़ा, हम
दोनों ही इस प्रश्नका उत्तर जानेंगे, यह प्रश्न जनसमुदायमे
होने योग्य नहीं है।' तब उन दोनोंने उठकर [ एकान्तमें ]
विचार किया । उन्होंने जो कुछ कहा, वह कर्म ही कहा, तथा
जिसकी प्रशंसा की, वह कर्मकी ही प्रशंसा की। वह यह
कि पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी
होता है। इसके पीछे जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥