कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 522, कुल 832 में से
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ॐ चतुर्थ अध्याय प्रथम ब्राह्मण जनक-याज्ञवल्क्य संवाद
[बायाँ स्तम्भ]
विदेह जनक आसनपर स्थित था। तभी उसके पास याज्ञवल्क्यजी आये। उनसे [जनकने] कहा, 'याज्ञवल्क्यजी ! कैसे पधारे ? पशुओंकी इच्छासे, अथवा सूक्ष्मान्त [प्रश्न श्रवण करने] के लिये ?' 'राजन् ! मैं दोनोंके लिये आया हूँ' ऐसा [ याज्ञवल्क्यने ] कहा ॥ १ ॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो कहा है, वह हम सुनें।' [जनक-] 'मुझसे शिलिनके पुत्र जित्वाने कहा है कि वाक् ही ब्रह्म है।' [याज्ञवल्क्य-] "जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शिलिनके पुत्रने 'वाक् ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?" [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'राजन् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! वह मुझे आप बतलाइये।' [याज्ञवल्क्य-] "वाक् ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है; उसकी 'प्रज्ञा' इस प्रकार उपासना करे।" [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रज्ञता क्या है ?' 'राजन् ! वाक् ही प्रज्ञता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे सम्राट् ! वाक्से ही बन्धुका ज्ञान होता है और राजन् ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, इष्ट, हुत, आशित (भूखेको अन्न खिलानेसे होनेवाले धर्म), पायित (प्यासेको पानी पिलानेसे होनेवाले धर्म), यह लोक, परलोक और समस्त भूत वाक्से ही जाने जाते हैं। हे सम्राट् ! वाक् ही परब्रह्म है। इस प्रकार उपासना करनेवालेको वाक् नहीं त्यागती, सम्पूर्ण भूत उसको उपहार देते हैं। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' विदेहराज जनकने कहा—'मैं आपको—जिनसे हाथीके समान बैल उत्पन्न हों ऐसी—सहस्र गौएं देता हूँ।' उस याज्ञवल्क्यने कहा—'मेरे पिताजीका सिद्धान्त था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ २ ॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी [आचार्य] ने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [जनक-] "मुझसे शुल्वके पुत्र उदङ्कने
[दायाँ स्तम्भ]
'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है।" [याज्ञवल्क्य-] "जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शुल्वके पुत्रने 'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि प्राणक्रिया न करनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?" [जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'राजन् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] "प्राण ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, उसकी 'प्रिय' इस रूपसे उपासना करे ।" [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रियता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! प्राण ही प्रियता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'राजन् ! प्राणके लिये ही लोग अयाज्यसे यजन कराते हैं, प्रतिग्रह न लेनेयोग्यसे प्रतिग्रह लेते हैं तथा जिस दिशामें जाते हैं, उसमें ही वधकी आशङ्का करते हैं। हे सम्राट् ! यह सब प्राणके लिये ही होता है। हे राजन् ! प्राण ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे प्राण नहीं त्यागता, उसको सब भूत उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ३ ॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [जनक-] "मुझसे वृष्णके पुत्र बर्बुने कहा है कि 'चक्षु ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] "जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस वार्ष्णेने 'चक्षु ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न देखनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?" [जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] "चक्षु ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी 'सत्य' इस रूपसे उपासना करे।" [जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! सत्यता क्या है?' 'हे राजन् ! चक्षु ही सत्यता