भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 523, कुल 832 में से

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पृष्ठ 523

ब्राह्मण १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५७

है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। “हे सम्राट् ! चक्षुसे देखनेवालेसे ही 'क्या तूने देखा' ऐसा जब कहा जाता है और वह कहता है कि 'मैने देखा' तो वह सत्य होता है। राजन् ! चक्षु ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका चक्षु त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते है और वह देव होकर देवोको प्राप्त होता है। 'मै आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा । उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नही ले जाना चाहिये' ॥ ४ ॥ [ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] “मुझसे भारद्वाज-गोत्रोत्पन्न गर्दभीविपीतने कहा है कि 'श्रोत्र ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] “जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस भारद्वाजने 'श्रोत्र ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न सुनने- वालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?” [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] “श्रोत्र ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, तथा इसकी 'अनन्त' इस रूपसे उपासना करे।” [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! अनन्तता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! दिशाएँ ही अनन्तता हैं' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इसीसे हे सम्राट् ! कोई भी जिस किसी दिशाको जाता है, वह उसका अन्त नहीं पाता; क्योंकि दिशाएँ अनन्त हैं और हे सम्राट् ! दिशाएँ ही श्रोत्र हैं। श्रोत्र ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, श्रोत्र उसका त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मै आपको हाथीके समान हृष्ट- पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ५ ॥ [ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] “मुझसे जबालाके पुत्र सत्यकामने कहा है कि 'मन ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] “जैसे मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस जबालके पुत्रने 'मन ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि मनोहीनको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा बतलाये हैं।” [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] “मन ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी 'आनन्द' इस रूपसे उपासना करे।” [ जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! आनन्दता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! मन ही आनन्दता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे राजन् ! मनसे ही स्त्रीकी इच्छा करता है; उसमें अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है, वह आनन्द है। हे सम्राट् ! मन ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे मन नहीं त्यागता, सब भूत उसका उपकार करते हैं तथा वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मै आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा । याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ६ ॥ [ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है वह हम सुनें।' [ जनक-] “मुझसे विदग्ध शाकल्यने कहा है कि 'हृदय ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] “जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् पुरुष उपदेश करे, उसी प्रकार उस शाकल्यने 'हृदय ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि हृदयहीनको क्या मिल सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?” [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये ।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक पादवाला ही ब्रह्म है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] “हृदय ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी 'स्थिति' इस रूपसे उपासना करे।” [जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! स्थितता क्या है?' 'हे सम्राट् ! हृदय ही स्थितता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'राजन् ! हृदय ही समस्त भूतोंका आयतन है, हृदय ही सब भूतोंकी प्रतिष्ठा है और हृदयमें ही समस्त भूत प्रतिष्ठित होते हैं। हे सम्राट् ! हृदय ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका हृदय त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार समर्पण करते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' वैदेह जनकने कहा, 'मैं आपको हाथीके समान