कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 524, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४८८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ४
हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ।' उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ७ ॥ याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको
द्वितीय ब्राह्मण
याज्ञवल्क्यका जनकको उपदेश
विदेहराज जनकने कूर्च [ नामक एक विशेष प्रकारके आसन ] से उठकर [ याज्ञवल्क्यके ] समीप जाकर कहा, 'याज्ञवल्क्यजी! आपको नमस्कार है, मुझे उपदेश कीजिये।' उस ( याज्ञवल्क्य ) ने कहा, 'राजन् ! जिस प्रकार लंबे मार्गको जानेवाला पुरुष सम्यक् प्रकारसे रथ या नौकाका आश्रय ले, उसी प्रकार तुम इन उपनिषदों ( उपासनाओं ) से युक्त प्राणादि ब्रह्मोंकी उपासना कर समाहितचित्त हो गये हो। इस प्रकार तुम पूज्य, श्रीमान्, अधीतवेद और उक्तोपनिषदक (जिसे आचार्यने उपनिषद्का उपदेश कर दिया है-ऐसे ) हो गये हो। इतना होनेपर भी बताओ तुम इस शरीरसे छूटकर कहाँ जाओगे ?' [ जनक-] 'भगवन् ! मैं कहाँ जाऊँगा, सो मुझे मालूम नहीं है।' [याज्ञवल्क्य-] 'अब मैं तुम्हें वही बतलाऊँगा जहाँ तुम जाओगे।' [ जनक-] 'भगवान् मुझे बतलावें' ॥ १ ॥
'यह जो दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, इन्ध नामवाला है, उसी इस पुरुषको इन्ध होते हुए भी परोक्षरूपसे इन्द्र कहते हैं, क्योंकि देवगण मानो परोक्षप्रिय हैं, प्रत्यक्षसे द्वेष करनेवाले हैं। और यह जो बायें नेत्रमें पुरुषरूप है, वह इस (इन्द्र) की पत्नी विराट् (अन्न) है, उन दोनोंका यह सस्ताव (मिलनका स्थान) है जो कि यह हृदयान्तर्गत आकाश है। उन दोनोंका यह अन्न है जो कि यह हृदयान्तर्गत लाल पिण्ड है। उन दोनोंका यह प्रावरण है जो कि यह हृदयान्तर्गत जाल सा है। उन दोनोंका यह मार्ग—सञ्चार करनेका द्वार है जो कि यह हृदयसे ऊपरकी ओर नाड़ी जाती है। जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त हुआ केश होता है, वैसी ही ये हिता नामकी नाड़ियां हृदयके भीतर स्थित हैं। इन्हींके द्वारा जाता हुआ यह अन्न [ शरीर ] में जाता है; इसीसे इस (स्थूल-शरीराभिमानी वैश्वानर ) से यह (सूक्ष्मदेहाभिमानी तैजस ) सूक्ष्मतर आहार ग्रहण करनेवाला ही होता है ॥ २-३ ॥
उस विद्वान्के पूर्वदिशा पूर्व प्राण है, दक्षिणदिशा दक्षिण प्राण है, पश्चिमदिशा पश्चिम प्राण है, उत्तरदिशा उत्तर प्राण है, ऊपरकी दिशा ऊपरके प्राण है, नीचेकी दिशा नीचेके प्राण हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ सम्पूर्ण प्राण हैं। वह यह 'नेति नेति' रूपसे वर्णन किया हुआ आत्मा अग्राह्य है—वह ग्रहण नहीं किया जाता, वह अशीर्य है—जीर्ण ( नष्ट ) नहीं होता, असङ्ग है—उसका सङ्ग नहीं होता, वह अबद्ध है—व्यथित नहीं होता और क्षीण नहीं होता। हे जनक ! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। उस विदेहराज जनकने कहा, 'भगवन् याज्ञवल्क्य! जिन आपने मुझे अभय ब्रह्मका ज्ञान कराया है, उन आपको अभय प्राप्त हो, आपको नमस्कार है, ये विदेह देश और यह मैं आपके अधीन हैं' ॥ ४ ॥
तृतीय ब्राह्मण
याज्ञवल्क्यके द्वारा आत्माके स्वरूपका कथन
विदेहराज जनकके पास याज्ञवल्क्य गये। उनका विचार था मैं कुछ उपदेश नहीं करूँगा। किंतु पहले कभी विदेहराज जनक और याज्ञवल्क्यने अग्निहोत्रके विषयमें परस्पर सवाद किया था, उस समय याज्ञवल्क्यने उसे वर दिया था और उसने इच्छानुसार प्रश्न करना ही माँगा था। यह वर याज्ञवल्क्यने उसे दे दिया था, अतः उनसे पहले राजाने ही प्रश्न किया—॥ १ ॥
'याज्ञवल्क्यजी ! यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ?' 'हे सम्राट् ! यह आदित्यरूप ज्योतिवाला है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'यह आदित्यरूप ज्योतिसे ही बैठता, सब ओर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है'। [ जनक— ] 'याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'उस समय चन्द्रमा ही इसकी ज्योति होता है; चन्द्रमारूप ज्योतिके द्वारा ही यह बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' [ जनक— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है। याज्ञवल्क्यजी ! आदित्यके अस्त हो जानेपर तथा चन्द्रमाके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' 'अग्नि ही इसकी ज्योति होता है। यह अग्निरूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।'