भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 832 में से

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पृष्ठ 535

ॐ पञ्चम अध्याय प्रथम ब्राह्मण आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना वह परब्रह्म पूर्ण है और यह (जगत् भी) पूर्ण [परमात्मा] है। 'जिसमें वायु रहता है, वह आकाश ही है। उस पूर्णब्रह्मसे ही यह पूर्ण उत्पन्न होता है। इस पूर्णके ख है'—ऐसा कौरव्यायणीपुत्रने कहा है। यह ओङ्कार पूर्णको निकाल लेनेपर भी पूर्ण ही बच रहता है। आकाश- वेद है—ऐसा ब्राह्मण जानते हैं, क्योंकि जो ज्ञातव्य है, ब्रह्म ॐकार है। आकाश [यहाँ जड नहीं,] सनातन उसका इसीसे ज्ञान होता है ॥ १ ॥ द्वितीय ब्राह्मण 'द-द-द' से दम-दान और दयाका उपदेश देव, मनुष्य और असुर-प्रजापतिके इन तीन पुत्रोंने पिता फिर प्रजापतिसे असुरोंने कहा—'आप हमें उपदेश प्रजापतिके यहाँ ब्रह्मचर्यवास किया। ब्रह्मचर्यवास कर चुकनेपर कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और देवोंने कहा—'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे प्रजापतिने पूछा, 'समझ गये क्या ?' असुरोंने कहा, "समझ गये, आपने 'द' यह अक्षर कहा और पूछा, 'समझ गये क्या ?' इसपर हमसे 'दया करो' ऐसा कहा है।" तब प्रजापतिने 'हाँ, समझ 'उन्होंने कहा, "समझ गये, आपने हमसे 'दमन करो' ऐसा गये' ऐसा कहा। इस प्रजापतिके अनुशासनकी मेघगर्जनारूपी कहा है।" तब प्रजापतिने कहा, 'ठीक है, तुम समझ गये' ॥१॥ दैवी वाणी आज भी द द-द—इस प्रकार अनुवाद करती है, फिर प्रजापतिसे मनुष्योंने कहा—'आप हमें उपदेश अर्थात् भोगप्रधान देवो ! इन्द्रियोंका दमन करो, सङ्ग्रहप्रधान कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और मनुष्यो ! भोगसामग्रीका दान करो, क्रोध-हिंसाप्रधान असुरो ! पूछा, 'समझ गये क्या ?' मनुष्योंने कहा, "समझ गये, आपने जीवोंपर दया करो—यों कहती है। अतः दम, दान और हमसे 'दान करो' ऐसा कहा है।" तब प्रजापतिने 'हाँ, समझ दया—इन तीनोंको सीखे ॥ ३ ॥ गये' ऐसा कहा ॥ २ ॥ तृतीय ब्राह्मण हृदयकी ब्रह्मरूपसे उपासना जो हृदय है, वह प्रजापति है। यह ब्रह्म है, यह सर्व है, बलि समर्पण करते हैं। 'द' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता यह हृदय तीन अक्षरवाला नाम है। 'हृ' यह एक अक्षर है, उसे स्वजन और अन्यजन देते हैं। 'यम्' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, उसके प्रति स्वजन और अन्यजन है। जो ऐसा जानता है, वह स्वर्गलोकको जाता है ॥ १ ॥ चतुर्थ ब्राह्मण सत्यकी ब्रह्मरूपसे उपासना वही-वह हृदय-ब्रह्म ही वह था—जो कि सत्य ही है। जो भी हो जाता है,। जो इस प्रकार इस महत्, यक्ष (पूजनीय), इस महत्, यक्ष (पूज्य), सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवालेको यह प्रथम उत्पन्न होनेवालेको 'सत्य ब्रह्म'—इस प्रकार जानता 'सत्य ब्रह्म है' ऐसा जानता है, वह इन लोकोंको जीत लेता है। है [उसे उपर्युक्त फल मिलता है], क्योंकि ब्रह्म सत्य [उसका शत्रु] उसके अधीन हो जाता है—असत् (अभावरूप) ही है ॥ १ ॥ उ० अ० ६३—

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