भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 832 में से

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पृष्ठ 536

४९८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ५ पञ्चम ब्राह्मण सत्यकी आदित्यरूपमें उपासना यह [व्यक्त जगत्] पहले आप (जल) ही था ! उस लगता है, उस समय यह इस मण्डलको शुद्ध ही देखता है। आपने सत्यकी रचना की । अतः सत्य ब्रह्म है । ब्रह्मने प्रजापति फिर ये रश्मियाँ इसके पास नहीं आतीं ॥ १-२ ॥ (विराट्) को और प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया। इस मण्डलमे जो यह पुरुष है, उसका 'भूः' यह सिर है; वे देवगण सत्यकी ही उपासना करते हैं । वह यह 'सत्य' तीन सिर एक है और यह अक्षर भी एक है । 'भुवः' यह भुजा अक्षरवाला नाम है । 'स' यह एक अक्षर है, 'ति' यह एक है, भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । 'स्वः' यह प्रतिष्ठा अक्षर है और 'यम्' यह एक अक्षर है । इनमें प्रथम और (चरण) है, प्रतिष्ठा (चरण) दो हैं और ये अक्षर भी दो अन्तिम अक्षर सत्य है और मध्यका अनृत है । वह यह अनृत हैं । 'अहर्' यह उसका उपनिषद् (गूढ नाम) है; जो ऐसा दोनों ओरसे सत्यसे परिगृहीत है । इसलिये यह सत्य-बहुल ही जानता है, वह पापको मारता है और उसे त्याग देता है। जो है । इस प्रकार जाननेवालेको अनृत नहीं मारता । वह जो सत्य यह दक्षिण नेत्रमे पुरुष है, उसका 'भूः' यह सिर है, सिर है, सो यह आदित्य है । जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है एक है और यह अक्षर भी एक है। 'भुवः' यह भुजा है; और जो भी यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वे ये दोनों पुरुष भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । 'स्वः' यह प्रतिष्ठा है, एक दूसरेमें प्रतिष्ठित हैं । आदित्य रश्मियोंके द्वारा चाक्षुष प्रतिष्ठा (चरण) दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं। 'अहम्' पुरुषमें प्रतिष्ठित है और चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा उसमें यह उसका उपनिषद् (गूढ नाम) है, जो ऐसा जानता है, प्रतिष्ठित है । जिस समय यह (चाक्षुष पुरुष) उत्क्रमण करने वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ३-४ ॥ षष्ठ ब्राह्मण मनोमय पुरुषकी उपासना प्रकाश ही जिसका सत्य (स्वरूप) है, ऐसा यह है । वह यह सबका स्वामी और सबका अधिपति है; पुरुष मनोमय है । वह उस अन्तर्हृदयमें जैसा व्रीहि तथा यह जो कुछ है, सभीका प्रकर्षतया शासन करता (धान) या यव (जौ) होता है, उतने ही परिमाणवाला है ॥ १ ॥ सप्तम ब्राह्मण विद्युत्की ब्रह्मरूपमें उपासना विद्युत् ब्रह्म है-ऐसा कहते हैं । विदान (खण्डन या जानता है, वह इस आत्माके प्रतिकूलभूत पापोंका नाश कर विनाश) करनेके कारण विद्युत् है । जो 'विद्युत् ब्रह्म है' ऐसा देता है, क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है ॥ १ ॥ अष्टम ब्राह्मण वाक्की धेनुरूपमें उपासना वाक्रूप धेनुकी उपासना करे । उसके चार स्तन देवगण हैं, हन्तकारके भोक्ता मनुष्य हैं और स्वधाकारके / हैं-स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार । पितृगण । उस धेनुका प्राण वृषभ है और मन उसके दो स्तन स्वाहाकार और वषट्कारके भोक्ता बछड़ा है ॥ १ ॥ नवम ब्राह्मण अन्तरस्थ वैश्वानर अग्नि जो यह पुरुषके भीतर है, यह अग्नि वैश्वानर जिसे पुरुष कानोंको मूँदकर सुनता \ है । जिस समय है, जिससे कि यह अन्न; जो कि भक्षण किया जाता पुरुष उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको है, पकाया जाता है । उसीका यह घोष होता है, नहीं सुनता ॥ १ ॥