भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 540, कुल 832 में से

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पृष्ठ 540

ॐ षष्ठ अध्याय प्रथम ब्राह्मण प्राणकी सर्वश्रेष्ठता

जो कोई ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है, वह अपने ज्ञातजनोंमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है । प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो ऐसी उपासना करता है, वह अपने ज्ञातजनोंमे तथा और जिनमें होना चाहता है, उनमें भी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। जो वसिष्ठको जानता है, वह स्वजनोमे वसिष्ठ होता है। वाक् ही वसिष्ठा है। जो ऐसी उपासना करता है, वह स्वजनों- में तथा और जिनमें चाहता है, उनमे वसिष्ठ होता है। जो प्रतिष्ठाको जानता है, वह समान देश कालमें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गममे भी प्रतिष्ठित होता है । चक्षु ही प्रतिष्ठा है। चक्षुसे ही समान और दुर्गम देश कालमे प्रतिष्ठित होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह समान और दुर्गममें प्रतिष्ठित होता है। जो सम्पद्‌को जानता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है। श्रोत्र ही सम्पद् है। श्रोत्रमें ही ये सब वेद सब प्रकार निष्पन्न हैं। जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है। जो आयतनको जानता है, वह स्वजनोंका आयतन (आश्रय) होता है तथा अन्य जनोका भी आयतन होता है। मन ही आयतन है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह स्वजनोका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है। जो भी प्रजातिको जानता है, वह प्रजा-सन्तान और पशुओंद्वारा प्रजात (वृद्धिको प्राप्त) होता है। रेतस् ही प्रजाति है। जो ऐसा जानता है, वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात होता है ॥ १-६ ॥ ये पूर्वोक्त प्राण (इन्द्रिय, मन आदि) 'मैं श्रेष्ठ हूँ' 'मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार विवाद करते हुए ब्रह्माके पास गये। उससे बोले, 'हममें कौन वसिष्ठ है?' उसने कहा, 'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर (शरीरसे पृथक् हो जानेपर) यह शरीर अपनेको अधिक पापी मानता है, वही तुममें वसिष्ठ है' ॥ ७ ॥ [पहले] वाक्‌ने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके थे?' यह सुनकर उन्होंने कहा, 'जैसे गूंगे मनुष्य वाणीसे न बोलते हुए भी प्राणसे प्राणक्रिया करते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतससे प्रजा (सन्तान) की उत्पत्ति करते हुए [जीवित रहते हैं,] वैसे ही हम जीवित रहे।' यह सुनकर वाक्ने शरीरमें प्रवेश किया। चक्षुने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले—'जिस प्रकार अन्धे लोग नेत्रसे न देखते हुए प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं,] उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर चक्षुने प्रवेश किया। श्रोत्रने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले—'जिस प्रकार बहरे आदमी कानोंसे न सुनते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, मनसे जानते और रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं,] उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर श्रोत्रने प्रवेश किया। मनने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार मुग्ध पुरुष मनसे न समझते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं,] उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर मनने शरीरमे प्रवेश किया। रेतसने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर फिर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार नपुंसकलोग रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न न करते हुए प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते और मनसे जानते हुए [जीवित रहते हैं,] उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर वीर्यने शरीरमें प्रवेश किया। फिर प्राण उत्क्रमण करने लगा तो जिस प्रकार सिन्धुदेशीय महान् अश्व पैर बाँधनेके खूँटोंको उखाड़ डालता है, उसी प्रकार वह इन सब प्राणों (इन्द्रियों) को स्थानच्युत करने लगा। उन्होंने कहा, 'भगवन् ! आप उत्क्रमण न करें, आपके बिना हम जीवित नहीं रह सकते।' प्राणने कहा, 'अच्छा, तो

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