भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 832 में से

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पृष्ठ 553

ॐ द्वितीय अध्याय प्राणोपासना 'प्राण ब्रह्म है' यह सुप्रसिद्ध ऋषि कौषीतकि* कहते हैं । उन प्रसिद्ध प्राणमय ब्रह्मकी यहाँ राजाके रूपमें कल्पना की गयी है । उनका मन ही दूत है, वाणी परोसनेवाली स्त्री (रानी) है, चक्षु संरक्षक (मन्त्री) है, श्रोत्रेन्द्रियसंदेश सुनाने- वाला द्वारपाल है । उन सुप्रसिद्ध प्राणमय ब्रह्मको बिना माँगे ही ये सम्पूर्ण इन्द्रियाभिमानी देवतागण भेंट समर्पित करते हैं—उनके अधीन होकर रहते हैं । इसी प्रकार जो इस प्रकार जानता है, उसको भी सम्पूर्ण चराचर प्राणी बिना माँगे ही भेंट देते हैं । उस प्राणोपासकके लिये यह गूढ व्रत है कि 'वह किसीसे कुछ भी न माँगे'—ठीक उसी तरह, जैसे कोई भिक्षु गाँवमें भीख माँगनेपर भी जब कुछ नहीं पाता तो हताश होकर बैठ रहता और कुपित होकर यह प्रतिज्ञा कर लेता है कि 'अबसे इस गाँववाले लोगोंके देनेपर भी यहाँका अन्न नहीं खाऊँगा।' तात्पर्य यह कि वह भिक्षु जिस दृढतासे अपनी बात- पर डटा रहता है, उसी प्रकार उसको भी अपने व्रतपर अटल रहना चाहिये। जो लोग पहले इस पुरुषको कुछ देनेसे अस्वीकार कर चुके होते हैं, वे ही कुछ न माँगनेका निश्चय कर लेनेपर इसे देनेके लिये निमन्त्रित करते हैं और कहते हैं, 'आओ, हम तुम्हें देते हैं।' दीनतापूर्वक दूसरोंके सामने प्रार्थना करना— यह याचकका धर्म होता है । अर्थात् याचना करनेवालेको ही दैन्य-प्रदर्शन करना पड़ता है । याचना और दैन्य-प्रदर्शनसे दूर रहनेपर ही उसे लोग यों निमन्त्रण देते हैं कि 'आओ, हम तुम्हें देंगे' ॥ १ ॥ 'प्राण ब्रह्म है'—प्रसिद्ध महात्मा पैङ्ग्य भी यही कहते हैं। उन प्रसिद्ध प्राणमय ब्रह्मके लिये वाणीसे परे चक्षु-इन्द्रिय है, जो वागिन्द्रियको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है । ( अतः चक्षु वागिन्द्रियकी अपेक्षा आन्तरिक है, क्योंकि जैसा कहा गया हो, वैसा ही नेत्रसे भी देख लिया जाय तो विवादकी सम्भावना नहीं रहती—वह वस्तु यथार्थ समझ ली जाती है । ) चक्षुसे परे श्रवणेन्द्रिय है, जो चक्षुको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है, (क्योंकि चक्षुसे कहीं-कहीं भ्रान्त-दर्शन भी होता है, जैसे सीपमें चाँदीका दर्शन । परंतु कानसे विद्यमान अथवा प्रस्तुत वचनका ही श्रवण होता है । ) श्रवणेन्द्रियसे परे मन है, जो श्रवणेन्द्रियको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है, क्योंकि मनके सावधान रहनेपर ही श्रवणेन्द्रिय सुन पाती है । मनसे परे प्राण है, जो मनको सब ओरसे व्याप्त करके स्थित है । ( प्राण ही मनको बाँध रखनेवाला है—यह बात प्रसिद्ध है । प्राण न रहे तो मन भी नहीं रह सकता, अतः सबकी अपेक्षा पर एवं आन्तरिक आत्मा होनेके कारण प्राणका ब्रह्म होना उचित ही है । ) उस प्राणमय ब्रह्मको ये सम्पूर्ण देवता उसके न माँगनेपर भी उपहार समर्पित करते हैं । इसी प्रकार जो यों जानता है, उस उपासकको भी सम्पूर्ण प्राणी बिना माँगे ही भाँति-भाँतिके उपहार भेंट करते हैं । उसका यह गूढ व्रत है कि वह किसीसे याचना न करे । इस विषयमें यह दृष्टान्त भी है—कोई भिक्षु गाँवमें भीख माँगनेपर भी जब कुछ नहीं पाता तो हताश होकर बैठ रहता और यह प्रतिज्ञा कर लेता है कि 'अब यहाँ किसीके देनेपर भी अन्न ग्रहण नहीं करूँगा ।' ऐसी प्रतिज्ञा कर लेनेपर जो लोग पहले उसे कुछ देनेसे अस्वीकार कर चुके होते हैं, वे ही उसे यों कहकर निमन्त्रित करते हैं कि 'आओ, हम तुम्हें देते हैं' ॥ २ ॥ ( प्राणोपासकको धन प्राप्तिकी इच्छा होनेपर उसके लिये कर्तव्यका उपदेश करते हैं—) अब एकमात्र धन ( प्राण ) के निरोधकी बात बतायी जाती है। यदि एकमात्र धनका ( अथवा प्राणका ) चिन्तन करे तो पूर्णिमाको या अमावास्याको अथवा शुक्ल या कृष्णपक्षकी किसी भी पुण्य-तिथिको पवित्र नक्षत्रमें अग्निकी स्थापना, (वेदीका) परिसमूहन (संस्कार), कुशोंका आस्तरण (बिछाना ), मन्त्रपूत जलसे अग्नि-वेदी आदिका अभिषेक तथा अग्निपर रक्खे हुए पात्रस्थ घृतका उत्पवन (शोधन) करके दाहिना घुटना पृथ्वीपर टेककर स्रुवासे, चमससे अथवा काँसेकी करछुल आदिसे निम्नाङ्कित मन्त्रोंद्वारा घृतकी ये आहुतियाँ दे— वाङ् नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मात् ( ) इदम् अवरुन्धा तस्यै स्वाहा । अर्थात् 'वाक्' नामसे प्रसिद्ध देवी अवरोधिनी— उपासककी अभीष्टसिद्धि करनेवाली है, वह मुझ प्राणोपासकके लिये अमुक व्यक्तिसे इस अभीष्ट अर्थकी सिद्धि कराये, उसके लिये यह घृतकी आहुति सादर समर्पित है । ( उपर्युक्त

  • जिसकी दृष्टिमें सांसारिक सुख अत्यन्त हेय हो, उसे 'कुपीतक' (कुत्सित सीत यस्य स ) कहते हैं और कुपीतकके पुत्रको 'कौषीतकि' कहते हैं ।