कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
by गीताप्रेस
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in contextअध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५१७ (बायाँ स्तम्भ) (स्वरूपसे और फलकी दृष्टिसे भी कृत्रिम हैं, वे पूर्वोक्त आहुतियोंकी भाँति अनन्त एवं अमृत नहीं हैं।) यह प्रसिद्ध है कि इस रहस्यको जाननेवाले पूर्ववर्ती विद्वान् केवल कर्ममय अग्निहोत्रका अनुष्ठान नहीं करते थे ॥ ५ ॥ 'उक्थ (प्राण) ब्रह्म है'—यह बात सुप्रसिद्ध महात्मा शुष्कमृङ्गार कहते हैं। वह उक्थ 'ऋक्' है, इस बुद्धिसे उपासना करे। जो प्राणरूप उक्थमें ऋग्बुद्धि कर लेता है, उसकी सम्पूर्ण प्राणी श्रेष्ठताके लिये—श्रेष्ठ बननेके लिये अर्चना करते हैं। वह उक्थ 'यजुर्वेद' है, इस बुद्धिसे उपासना करे। इससे सम्पूर्ण प्राणी श्रेष्ठताके लिये उसके साथ सहयोग करते हैं। वह उक्थ 'साम' है, इस बुद्धिसे उपासना करे। उस उपासकके समक्ष सम्पूर्ण प्राणी श्रेष्ठताके लिये मस्तक झुकाते हैं। वह उक्थ 'श्री' है, इस बुद्धिसे उपासना करे। वह 'यश' है, इस भावसे उपासना करे। वह 'तेज' है, इस भावसे उपासना करे। इस विषयमें यह दृष्टान्त है—जैसे यह दिव्य धनुष सम्पूर्ण आयुधोंमें अत्यन्त श्रीसम्पन्न, परम यशस्वी और परम तेजस्वी होता है, उसी प्रकार जो इस प्रकार जानता है वह विद्वान् सम्पूर्ण भूतोंमें सबसे अधिक श्रीसम्पन्न, परम यशस्वी तथा परम तेजस्वी होता है। (जो यहाँ ईंटोंकी बनी हुई वेदी अथवा कुण्डमें स्थापित किया गया है, वह यज्ञकर्मका साधनभूत अग्नि भी प्राणस्वरूप ही है, क्योंकि प्राण ही ऋग्वेदादिरूप है। यह प्राण ही ऋग्वेदादि- साध्य कर्मोंका निष्पादक तथा मुझ अध्वर्युका भी स्वरूप है। इसलिये ऋग्वेदादिस্বরূপ सर्वात्मा प्राण मैं हूँ, यह अग्नि भी मेरा ही स्वरूप है—इस बुद्धिसे अध्वर्यु अपना सत्कार करता है। इसी अभिप्रायसे कहते हैं—) इस प्राणको तथा ईंटोंकी वेदीपर संचित कर्ममय अग्निको भी अभिन्न एवं आत्मस्वरूप मानकर अध्वर्यु नामक ऋत्विक् अपना सत्कार करता है। उस प्राणमें ही वह यजुर्वेदसाध्य कर्मोंका विस्तार करता है। यजुर्वेदसाध्य कर्म-वितानमें होता ऋग्वेदसाध्य कर्मोंका विस्तार करता है। ऋग्वेदसाध्य कर्म-वितानमें उद्गाता सामवेदसाध्य कर्मोंका विस्तार करता है। वह अध्वर्युंरूप यह प्राण सम्पूर्ण त्रयी-विद्याका आत्मा- है। यह प्रत्यक्षगोचर प्राण ही इस त्रयी-विद्याका आत्मा बताया गया है। जो इस प्राणको इस रूपमें जानता है, वह भी प्राणरूप हो जाता है ॥ ६ ॥ विविध उपासनाओंका वर्णन अब सर्वविजयी कौषीतकिके द्वारा अनुभवमें लायी हुई तीन बार की जानेवाली उपासना बतायी जाती है। यज्ञोपवीतको (दायाँ स्तम्भ) सव्यभावसे—बायें कंधेपर रखकर, आचमन करके जलपात्रको तीन बार शुद्ध-स्वच्छ जलसे पूर्णतः भरकर उदयकालमें भगवान् सूर्यका उपस्थान करे, उनकी आराधनाके लिये खड़ा होकर अर्घ्य दे (अर्घ्य देते समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—) 'वर्गोऽसि पाप्मानं मे वृङ्ग्धि।' (आत्मज्ञान होनेके कारण सम्पूर्ण जगत्को आप तृणकी भाँति त्याग देते हैं, इसलिये 'वर्ग' कहलाते हैं; मेरे पापको मुझसे दूर कीजिये।) इसी प्रकार मध्याह्नकालमें भी भगवान् सूर्यका उपस्थान करे। (उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—) 'उद्वर्गोऽसि पाप्मानं मे उद्वृङ्ग्धि।' (इस मन्त्रका अर्थ भी पूर्ववत् ही है।) फिर इसी प्रकार सायंकालमें अस्त होते हुए भगवान् सूर्यका निम्नाङ्कित मन्त्रसे उपस्थान करे— 'संवर्गोऽसि पाप्मानं मे संवृङ्ग्धि।' इस उपासनाका फल यह है कि मनुष्य दिन और रातमें जो पाप करता है, उसका पूर्णतः परित्याग कर देता है ॥ ७ ॥ अब दूसरी उपासना बतायी जाती है। प्रत्येक मासकी अमावास्या तिथिको, जब सूर्यके पश्चिमभागमें उनकी सुषुम्णा नामक किरणमें चन्द्रमा स्थित दिखायी देते हैं (लौकिक नेत्रोंसे न दिखायी देनेपर भी शास्त्रतः देखे जाते हैं), उस समय उनका पूर्वोक्त प्रकारसे ही उपस्थान करे। विशेषता इतनी ही है कि अर्घ्यपात्रमें दो हरी दूबके अङ्कुर भी रख ले और उससे अर्घ्य देते हुए चन्द्रमाके प्रति 'यत्ते' इत्यादि मन्त्ररूपा वाणीका प्रयोग करे। (वह मन्त्र इस प्रकार है—) यत्ते सुसीमं हृदयमधि चन्द्रमसि श्रितं तेनामृतत्वस्येशानं माहं पौत्रमघ रुदम्। 'हे सोममण्डलकी अधिष्ठात्री देवि ! जिसकी सीमा बहुत ही सुन्दर है, ऐसा जो तुम्हारा हृदय—हृदयस्थित आनन्दमय स्वरूप चन्द्रमण्डलमें विराजित है, उसके द्वारा तुम अमृतत्व (परमानन्दमय मोक्ष) पर भी अधिकार रखती हो। ऐसी कृपा करो, जिससे मुझे पुत्रके शोकसे न रोना पड़े।' (पुत्रका पहलेसे ही अभाव होना, पुत्रका पैदा होकर मर जाना या रुग्ण रहना अथवा पुत्रका कुपुत्र हो जाना आदिके कारण जो घोर दुःख होता है, यही पुत्र शोक है, इन सबसे छूटनेके लिये इस मन्त्रमें प्रार्थना की गयी है।) यों करनेवाले उपासकको यदि पुत्र प्राप्त हो चुका हो तो उसके उस पुत्रकी उससे पहले मृत्यु नहीं होती। यदि उसके कोई पुत्र न हुआ हो, तो वह भी पहलेकी ही भाँति