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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

by गीताप्रेस

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished832 pages

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

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कल्याण ओमित्येतदक्षरमिदँ सर्वम् २३ ] उपनिषद्-अङ्क

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दुर्गति-नाशिनि दुर्गा जय जय, काल-विनाशिनि काली जय जय । उमा रमा ब्रह्माणी जय जय, राधा सीता रुक्मिणि जय जय ॥ साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव, जय शंकर । हर हर शंकर दुखहर सुखकर अघ-तम-हर हर हर शंकर ॥ हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ जय-जय दुर्गा, जय मा तारा । जय गणेश, जय शुभ-आगारा ॥ जयति शिवा-शिव जानकि-राम । गौरी-शंकर सीता-राम ॥ जय रघुनन्दन जय सिया-राम । व्रज-गोपी-प्रिय राधेश्याम ॥ रघुपति राघव राजा राम । पतितपावन सीता-राम ॥

कोई सज्जन विज्ञापन भेजनेका कष्ट न उठावें । कल्याणमें बाहरके विज्ञापन नहीं छपते ।

समालोचनार्थ पुस्तकें कृपया न भेजें । कल्याणमें समालोचनाका स्तम्भ नहीं है ।

\left. {l} वार्षिक मूल्य भारतमें ६॥) विदेशमें ८॥=) (१३ शिलिङ्ग) \right} जय पावक रवि चन्द्र जयति जय । सत्-चित्-आनंद भूमा जय जय ॥ {l} इस अङ्कका मूल्य ६=) विदेशमें ८॥=) (१३ शिलिङ्ग) \phantom{\left. {l} वार्षिक मूल्य \right}} जय जय विश्वरूप हरि जय । जय हर अखिलात्मन् जय जय ॥ \phantom{\left. {l} वार्षिक मूल्य \right}} जय विराट जय जगत्पते । गौरीपति जय रमापते ॥

सम्पादक—हनुमानप्रसाद पोद्दार, चिम्मनलाल गोस्वामी, एम्० ए०, शास्त्री मुद्रक-प्रकाशक—घनश्यामदास जालान, गीताप्रेस, गोरखपुर

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कल्याण 2603 वर्ष २३]

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श्रीहरिः कल्याण-प्रेमियों तथा ग्राहकोंसे निवेदन १-इस 'उपनिषद्-अङ्क'में चित्रोंसमेत सब मिलाकर करीब ८३० पृष्ठ दिये गये हैं। इनके अतिरिक्त ३ बड़े साइजके यन्त्र हैं। रंगीन चित्र जितने सम्भव थे, दिये गये हैं। २-जिन सज्जनोंके रुपये मनीआर्डरद्वारा आ गये होंगे, उनके अङ्क जानेके बाद शेष ग्राहकोंके नाम वी० पी० भेजी जा सकेगी। अतः जिनको ग्राहक न रहना हो, वे कृपा करके मनाहीका एक कार्ड तुरंत डाल दें ताकि वी० पी० भेजकर 'कल्याण' को व्यर्थका नुकसान न उठाना पड़े। उनके दो पैसेके खर्चसे 'कल्याण' के कई आने बच जायँगे। आशा है, पुराने सम्बन्धके नाते वे इतना त्याग अवश्य स्वीकार करेंगे। ३-इस विशेषाङ्कका अलग मूल्य भी ६=) ही है। अतः पूरे वर्षके लिये ही ग्राहक बनना चाहिये। आजकल नये-नये उपद्रव तथा अशान्तिके कारण बन रहे हैं। इसलिये यदि किसी कारणवश आगेके अङ्क पूरे वर्षतक न भेजे जा सकें तो जितने अङ्क पहुँचें, उतनेमें ही मूल्य पूरा समझनेकी कृपा करें। ४-मनीआर्डर-कूपनमें अपना पता और ग्राहक-नंबर जरूर लिखें। ग्राहक-नंबर याद न हो तो कम-से- कम 'पुराना ग्राहक' अवश्य लिख दें। नये ग्राहक हों तो 'नया ग्राहक' लिखनेकी कृपा करें। ५-ग्राहक-नंबर न लिखनेसे आपका नाम 'नये ग्राहकों'में दर्ज हो जायगा। इससे आपकी सेवामें 'उपनिषद्-अङ्क' नये नंबरोंसे पहुँच जायगा और पुराने नंबरकी वी० पी० दुबारा जायगी। ऐसा भी हो सकता है कि उधरसे आपने रुपये भेजे हों और उनके हमारे पास पहुँचनेके पहले ही आपके नाम वी० पी० चली जाय। दोनों ही सूरतोंमें आपसे यह प्रार्थना है कि आप कृपापूर्वक वी० पी० लौटावें नहीं, चेष्टा करके कृपया नया ग्राहक बनाकर उनके नाम-पते साफ-साफ हमें लिखनेकी कृपा करें। आप ऐसा करेंगे तो आपका 'कल्याण' नुकसानसे बचेगा और आप 'कल्याण' के प्रचारमें सहायता करके पुण्यके भागी बनेंगे। अगर नया ग्राहक न मिले तो वी० पी० नहीं छुड़ानी चाहिये। ६-'उपनिषद्-अङ्क' सब ग्राहकोंके पास रजिस्टर्ड पोस्टसे जायगा। सब अङ्कोंके जानेमें लगभग दो महीने लग जाते हैं; क्योंकि पोस्ट-आफिसवाले प्रतिदिन अधिक संख्यामें रजिस्टर्ड पैकेट नहीं ले पाते। इसलिये ग्राहक महोदयोंकी सेवामें विशेषाङ्क क्रमसे जायगा। परिस्थिति समझकर कृपालु ग्राहकोंको हमें क्षमा करना चाहिये और धैर्य रखना चाहिये। ७-जिन कल्याण-प्रेमी महानुभावोंने 'कल्याण'के नये ग्राहक बनाये हैं और बना रहे हैं, उनके हम हृदयसे कृतज्ञ हैं। इस बार कल्याण-प्रेमी सज्जनोंको 'कल्याण'के नये ग्राहक बनानेकी फिर सफल चेष्टा करनी चाहिये। धर्मपर इस समय बड़ी विपत्ति आयी हुई है। ऐसे समयमें शुद्ध धर्म-सेवा समझकर 'कल्याण'का प्रचार बढ़ानेमें सभीको सहायक होना चाहिये। ८-गीताप्रेस पोस्ट-आफिस अब 'डिलेवरी आफिस' हो गया है। अतः 'कल्याण' व्यवस्था-विभाग तथा सम्पादन-विभाग और 'गीताप्रेस' तथा 'गीता-रामायण-परीक्षा-समिति'के नाम भेजे जानेवाले सभी पत्र, पारसल, पैकेट, रजिस्ट्री, बीमा आदिपर केवल गोरखपुर न लिखकर पो० गीताप्रेस (गोरखपुर) इस प्रकार लिखना चाहिये। व्यवस्थापक—'कल्याण', पो० गीताप्रेस (गोरखपुर) क्ष--

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( ४ ) पृष्ठ-संख्या पृष्ठ-संख्या ५७-तैत्तिरीयोपनिषद् ... ... ३१३ (३) तृतीय अध्याय ... ... ३७६ (१) शिक्षावल्ली ... ... ३१३ (४) चतुर्थ अध्याय ... .. ३८३ १. प्रथम अनुवाक ˙ ... ३१३ (५) पञ्चम अध्याय .. .. ३९१ २. द्वितीय अनुवाक ... ... ३१४ (६) षष्ठ अध्याय .. ... ३९७ ३ तृतीय अनुवाक ... ... ३१५ ५९-छान्दोग्योपनिषद् ... ˙ ४०६ ४. चतुर्थ अनुवाक ... ... ३१८ (१) प्रथम अध्याय ˙ ४०६ ५. पञ्चम अनुवाक ˙ ... ३२१ १. ओंकारकी व्याख्या ... ४०६ ६ षष्ठ अनुवाक ... ... ३२३ २. ओंकारकी आध्यात्मिक उपासना ४०७ ७ सप्तम अनुवाक ... .. ३२५ ३. ओंकारकी आधिदैविक उपासना .४०८ ८. अष्टम अनुवाक ... ˙ ३२६ ४. ओंकारके आश्रयसे अमृतत्वकी प्राप्ति ४०९ ९ नवम अनुवाक .. ˙ ३२७ ५. सूर्य एव प्राणके रूपमे ओङ्कारकी १०. दशम अनुवाक .. ˙ ३२८ उपासना ... ४०९ ११. एकादश अनुवाक ... ३२९ ६. विविध रूपोंमे उद्गीथोपासना ... ४१० १२. द्वादश अनुवाक ... ३३१ ७. शरीरकी दृष्टिसे उद्गीथोपासना .. ४११ (२) ब्रह्मानन्दवल्ली ˙ ३३३ ८ उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और १. प्रथम अनुवाक ... ... ३३३ दाल्भ्यका संवाद ... ˙ ४११ २. द्वितीय अनुवाक ... ... ३३४ , ९. उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और ३ तृतीय अनुवाक ... ... ३३६ प्रवाहणका संवाद ... ... ४१२ ४. चतुर्थ अनुवाक ... ... ३३७ १०. उपस्तिका आख्यान .. .. ४१३ ५ पञ्चम अनुवाक ... ... ३३९ ११. प्रस्ताव आदि कर्मोंसे संबद्ध ६. षष्ठ अनुवाक ... .. ३४० देवताओंका वर्णन .. ... ४१३ ७. सप्तम अनुवाक ... .. ३४२ १२. शौव उद्गीथका वर्णन ... ४१४ ८ अष्टम अनुवाक ... ... ३४४ १३ तेरह प्रकारके स्तोभोका वर्णन .. ४१४ ९. नवम अनुवाक .. ˙ ३४८ (२) द्वितीय अध्याय ... ४१५ (३) भृगुवल्ली ... ... ३५० १. साधु-दृष्टिसे समस्त सामकी उपासना ... ४१५ १ प्रथम अनुवाक ... ˙ ३५० २. पञ्चविध सामोपासना .. ... ४१५ २ द्वितीय अनुवाक ˙ ˙ ३५० ३ दृष्टिमे सामोपासना ... ... ४१५ ३ तृतीय अनुवाक .. .. ३५१ ४. जलमें सामोपासना ... ... ४१५ ४ चतुर्थ अनुवाक ... ˙ ३५२ ५. ऋतुओंमें सामोपासना ... ४१५ ५ पञ्चम अनुवाक .. ... ३५३ ६. पशुओमे सामोपासना .. ४१६ ६ षष्ठ अनुवाक ˙ ˙ ३५४ ७ प्राणोंमें सामोपासना ˙ ... ४१६ ७ सप्तम अनुवाक .. ˙ ३५५ ८. वाणीमे सप्तविध सामोपासना ... ४१६ ८ अष्टम अनुवाक ... ... ३५५ ९. आदित्य दृष्टिसे सप्तविध सामोपासना ... ४१६ ९. नवम अनुवाक .. ˙ ३५६ १०. मृत्युसे अतीत सप्तविध सामोपासना .. ४१७ १०. दशम अनुवाक .. ... ३५७ ११. गायत्र-सामोपासना ... ... ४१७ ५८-श्वेताश्वतरोपनिषद् ˙ ... ३६३ १२. रथन्तर-सामोपासना ... ... ४१७ (१) प्रथम अध्याय ˙ .. ३६३ १३. वामदेव्य-सामोपासना ... ... ४१७ (२) द्वितीय अध्याय ... ... ३७० १४. बृहत्सामोपासना ... ˙ ४१८

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( ५ ) पृष्ठ-संख्या १५. वैरूप-सामोपासना ... ... ४१८ १६. वैराज-सामोपासना ... ... ४१८ १७. शक्वरी-सामोपासना ... ४१८ १८. रेवती-सामोपासना ... ४१८ १९. यज्ञायज्ञीय-सामोपासना ... ४१९ २०. राजन-सामोपासना ... ... ४१९ २१. सर्वमें अनुस्यूत सामकी उपासना ... ४१९ २२. अग्नि-सम्बन्धी उद्गीथ ... ४१९ २३. धर्मके तीन स्कन्ध, ओंकारकी सर्वरूपता ४२० २४. तीनों कालका सवन ... ४२० (३) तृतीय अध्याय ... ... ४२१ १ आदित्यकी मधुरूपमें कल्पना ... ४२१ २. आदित्यकी दक्षिणस्थित किरणोंमे मधुनाडी दृष्टि .. ४२१ ३. पश्चिम ओरकी किरणोंमें मधुनाडी-दृष्टि ४२१ ४. उत्तर दिशाकी किरणोंमे मधुनाडी-दृष्टि ४२१ ५. ऊर्ध्व-रश्मियोंमें मधुनाडी दृष्टि ... ४२१ ६. वसुओंके जीवनाधार प्रथम अमृतकी उपासना ... ४२२ ७. रुद्रोंके जीवनाधार द्वितीय अमृत-की उपासना ... ४२२ ८. आदित्योंके जीवनाधार तृतीय अमृतकी उपासना ... ४२२ ९. मरुतोंके जीवनाधार चतुर्थ अमृत-की उपासना .. ४२२ १०. साध्योंके जीवनाधार पञ्चम् अमृत-की उपासना ... ४२३ ११. मधुविज्ञान तथा ब्रह्मविज्ञानके अधिकारी ... ४२३ १२. गायत्रीकी सर्वरूपता ... ४२३ १३. पञ्च प्राणोंकी उपासना ... ४२४ १४. जगत्की एव आत्माकी ब्रह्मरूपमें उपासना .. ४२४ १५. विराटरूप कोशकी उपासना ... ४२४ १६. पुरुषकी यज्ञरूपमें उपासना ... ४२५ १७. आत्मयज्ञके अन्य अङ्ग .. ४२५ १८ मन और आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना ४२६ १९. आदित्यकी ब्रह्मरूपमें उपासना ... ४२६ पृष्ठ-संख्या (४) चतुर्थ अध्याय ... ४२७ १. राजा जानश्रुति और रैक्वका उपाख्यान ४२७ २. जानश्रुतिक्रा रैक्वके पास उपदेशके लिये जाना ... ४२७ ३. वायु और प्राणकी उपासना ... ४२७ ४. जबालापुत्र सत्यकामद्वारा गुरुकी आज्ञाका पालन ... ४२८ ५. सत्यकामको वृषभद्वारा ब्रह्मके एक पादका उपदेश ... ४२८ ६. अग्निद्वारा द्वितीय पादका उपदेश ... ४२९ ७. हंसद्वारा तृतीय पादका उपदेश ... ४२९ ८. मद्गुद्वारा चतुर्थ पादका उपदेश ... ४२९ ९. सत्यकामका आचार्यसे पुनः उपदेश ग्रहण ... ४२९ १०. उपकोसलको अग्नियोद्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश ... ४३० ११. अकेले गार्हपत्याग्निद्वारा शिक्षा ... ४३० १२. अन्वाहार्यपचन नामक दूसरे अग्निद्वारा शिक्षा ... ४३० १३. आहवनीय-अग्निद्वारा शिक्षा ... ४३० १४. आचार्य और उपकोसलका सवाद • ४३१ १५. आचार्यद्वारा उपदेश, ब्रह्मवेत्ताकी गतिक्रा वर्णन ... ४३१ १६. पवनकी यज्ञरूपमें उपासना ... ४३१ १७. यज्ञमें योग्य ब्रह्माकी आवश्यकता .. ४३२ (५) पञ्चम अध्याय .. ४३३ १. प्राणकी सर्वश्रेष्ठता ... ४३३ २. महत्त्वप्राप्तिके लिये मन्थोपासना ... ४३३ ३. श्वेतकेतु और प्रवाहणका सवाद; श्वेतकेतु-के पिताका राजासे उपदेश माँगना ... ४३४ ४. द्युलोककी अग्निके रूपमें उपासना .. ४३५ ५. पर्जन्यकी ,, ,, ,, ४३५ ६. पृथिवीकी ,, ,, ,, ४३५ ७. पुरुषकी ,, ,, ,, ४३५ ८. स्त्रीकी ,, ,, ,, ४३५ ९. पाँचवी आहुतिसे पुरुषकी उत्पत्ति ... ४३५ १०. जीवोंकी त्रिविध गति ... ४३५ ११. प्राचीनशाल आदिका राजा अश्वपतिसे वैश्वानर आत्माके सम्बन्धमें प्रश्न ... ४३६

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( ६ )

Left Columnपृष्ठ-संख्या
१२. अश्वपति और औपमन्यवका संवाद... ४३७
१३. अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद... ४३७
१४. अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद... ४३७
१५. अश्वपति और जनका संवाद४३७
१६. अश्वपति और बुडिलका संवाद... ४३८
१७ अश्वपति और उद्दालकका संवाद. ४३८
१८. अश्वपतिका वैश्वानर आत्माके सम्बन्धमे उपदेश... ४३८
१९. 'प्राणाय स्वाहा' से पहली आहुति... ४३८
२०. 'व्यानाय स्वाहा' से दूसरी आहुति.. ४३८
२१. 'अपानाय स्वाहा' से तीसरी आहुति४३९
२२ 'समानाय स्वाहा' से चौथी आहुति४३९
२३. 'उदानाय स्वाहा'से पाँचवीं आहुति४३९
२४. भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये इस प्रकार हवन करनेका फल... ४३९
( ६ ) षष्ठ अध्याय.. ४४०
१. आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुसे प्रश्न४४०
२. सद्रूप परमात्मासे जगत्की उत्पत्ति. ४४०
३. आण्डज, जीवज और उद्भिज्जरूपमें त्रिविध सृष्टि... ... ४४०
४. त्रिवृत्करण... ... ४४१
५ मन अन्नमय, प्राण जलमय और वाक् तेजोमय है... ४४१
६. मथे जाते हुए दहीका दृष्टान्त.. ४४१
७. मनकी अन्नमयताका निश्चय४४२
८. सत्—आत्मा ही सबका मूल है.. ४४२
९. मधुका दृष्टान्त... ... ४४३
१० नदियोंका दृष्टान्त... ... ४४३
११. वृक्षका दृष्टान्त... ४४३
१२. वट बीजका दृष्टान्त... ४४३
१३. नमकका दृष्टान्त... ४४४
१४. आँख बँधे हुए पुरुषका दृष्टान्त. ४४४
१५. मुमूर्षु का दृष्टान्त४४४
१६. मिथ्या ज्ञानी और सच्चे ज्ञानीकी पहचान... ... ४४५
( ७ ) सप्तम अध्याय... ४४६
१. नामकी ब्रह्मरूपमे उपासना... ४४६
२. वाक्‌की ,, ,,. . ४४६

Right Columnपृष्ठ-संख्या
३. मनकी ब्रह्मरूपमें उपासना... ४४७
४. सङ्कल्पकी ,, ,,.. ४४७
५. चित्तकी ,, ,,... ४४७
६. ध्यानकी ,, ,,... ४४७
७. विज्ञानकी ,, ,,.. ४४८
८. बलकी ,, ,,. ४४८
९. अन्नकी ,, ,,... ४४८
१०. जलकी ,, ,,... ४४९
११. तेजकी ,, ,,... ४४९
१२. आकाशकी ,, ,,... ४४९
१३ स्मरणकी ,, ,,... ४४९
१४ आशाकी ब्रह्मरूपसे उपासना... ४५०
१५ प्राणकी ,, ,,. ४५०
१६. सत्य ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है... ४५०
१७. विज्ञान ही ,, ,,... ४५०
१८. मति ही ,, ,,... ४५१
१९. श्रद्धा ही ,, ,,. ४५१
२०. निष्ठा ही ,, ,,... ४५१
२१. कृति ही ,, ,,... ४५१
२२. सुख ही ,, ,,.. ४५१
२३. भूमा ही ,, ,,... ४५१
२४. भूमा ही अमृत है... ४५१
२५. भूमा ही सर्वत्र सब कुछ और आत्मा है.. ४५२
२६. आत्मदर्शनसे सबकी प्राप्ति, आहारशुद्धि- से क्रमशः अविद्याकी निवृत्ति.. ४५२
( ८ ) अष्टम अध्याय.. ४५३
१. आत्मा ही सत्य है ..... ४५३
२ आत्मज्ञानीकी सङ्कल्पसिद्धि. ४५३
३. ब्रह्मकी प्राप्तिसे सबकी प्राप्ति, ब्रह्म हृदयमें ही है४५४
४. आत्माकी महिमा और ब्रह्मचर्यसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति.. ४५४
५ ब्रह्मचर्यकी महिमा... ४५४
६ हृदयगत नाडियों ही उत्क्रमणका मार्ग हैं४५५
७. इन्द्र और विरोचनको प्रजापतिका उपदेश. ४५५
८. विरोचनका भ्रमपूर्ण सिद्धान्त लेकर लौट जाना... ... ४५६
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( ७ ) पृष्ठ-संख्या | पृष्ठ-संख्या ९. इन्द्रका प्रजापतिके पास पुनः आगमन और प्रश्न ... ४५६ | ४. याज्ञवल्क्य और चाक्रायण उपस्तका सवाद ... ४७८ १० स्वप्नके दृष्टान्तसे आत्माके स्वरूपका कथन ... ४५६ | ५. याज्ञवल्क्य और कहोलका सवाद, ब्रह्म और आत्माकी व्याख्या ... ४७८ ११. इन्द्र एक सौ एक वर्षके ब्रह्मचर्यके बाद उपदेशके अधिकारी हुए .. ४५७ | ६. याज्ञवल्क्य और गार्गीका संवाद ... ४७९ १२. इन्द्रके प्रति प्रजापतिका उपदेश ... ४५७ | ७. याज्ञवल्क्य तथा आरुणि उद्दालकका सवाद, आत्माके स्वरूपका वर्णन .. ४७९ १३. श्याम ब्रह्मसे शबल ब्रह्मकी प्राप्तिका उपदेश ... ४५८ | ८. याज्ञवल्क्य-गार्गीका संवाद; अक्षरके नाम-से आत्मस्वरूपका वर्णन .. ४८१ १४. आकाशनामक ब्रह्मका उपदेश ... ४५८ | ९. याज्ञवल्क्य-शाकल्यका संवाद और याज्ञवल्क्यकी विजय .. ... ४८२ १५. आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और उसका फल ... ४५८ | ( ४ ) चतुर्थ अध्याय ... ४८६ ६०-बृहदारण्यकोपनिषद् ... ... ४५९ | १. जनक-याज्ञवल्क्य-सवाद .. ४८६ ( १ ) प्रथम अध्याय .. ४५९ | २. याज्ञवल्क्यका जनकको उपदेश .. ४८८ १. यज्ञकी अश्वके रूपमें कल्पना ... ४५९ | ३. याज्ञवल्क्यके द्वारा आत्माके स्वरूपका कथन ... ४८८ २. प्रलयके अनन्तर सृष्टिकी उत्पत्ति .. ४५९ | ४. कामना-नाशसे ब्रह्म-प्राप्ति ... ४९१ ३. प्राण-महिमा ... ४६० | ५. याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-सवाद • ४९४ ४. ब्रह्मकी सर्वरूपता और चातुर्वर्ण्यकी सृष्टि ... ४६३ | ६. याज्ञवल्कीय काण्डकी परम्परा .. ४९५ ५ अन्नकी उत्पत्ति और उपासना; मन, वाणी और प्राणके रूपमे सृष्टिका विभाग ४६५ | ( ५ ) पञ्चम अध्याय ४९७ ६. नाम-रूप और कर्म ... ४६८ | १. आकाशकी ब्रह्मरूपमे उपासना ... ४९७ ( २ ) द्वितीय अध्याय .. ४६९ | २. 'द द द' से दम, दान और दयाका उपदेश ... ४९७ १ गार्ग्य और अजातशत्रुका संवाद; अजात-शत्रुका गार्ग्यको आत्माका स्वरूप समझाना ४६९ | ३. हृदयकी ब्रह्मरूपसे उपासना ... ४९७ २ शिशु नामसे मध्यम प्राणकी उपासना .. ४७० | ४ सत्यकी ब्रह्मरूपसे उपासना .. ४९७ ३. ब्रह्मके दो रूप ... ४७१ | ५. सत्यकी आदित्यरूपमे उपासना ... ४९८ ४. याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद; याज्ञवल्क्यका मैत्रेयीको अमृतत्वके साधनरूपमे परमात्म-तत्त्वका उपदेश ... ४७१ | ६. मनोमय पुरुषकी उपासना .. ४९८ ५. मधु विद्याका उपदेश, आत्माका विविध रूपोंमें वर्णन .. ४७३ | ७. विद्युत्की ब्रह्मरूपमें उपासना .. ४९८ ६. मधु विद्याकी परम्पराका वर्णन ... ४७४ | ८. वाक्की धेनुरूपमे उपासना ... ४९८ ( ३ ) तृतीय अध्याय .. ४७६ | ९. अन्तरस्थ वैश्वानर अग्नि ... ४९८ १. जनकके यज्ञमें याज्ञवल्क्य और अश्वल-का संवाद ... ४७६ | १०. मरणोत्तर ऊर्ध्वगतिका वर्णन ... ४९९ २. याज्ञवल्क्य और आर्तभागका सवाद .. ४७७ | ११. व्याधिमें और मृतपुरुषके श्मशान-गमन आदिमे तपकी भावनाका फल ... ४९९ ३. याज्ञवल्क्य और लाह्यायनि भुज्युका संवाद ... ४७८ | १२. अन्न एव प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना ४९९ | १३. प्राणकी विविध रूपोंमें उपासना .. ४९९ | १४. गायत्री-उपासना ... ५०० | १५. अन्तसमयकी प्रार्थना ... ५०१ | ( ६ ) षष्ठ अध्याय .. • ५०२ | १. प्राणकी सर्वश्रेष्ठता .. ... ५०२

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( ८ ) पृष्ठ-संख्या | पृष्ठ-संख्या २. पञ्चाग्निविद्या और उसे जाननेका फल, त्रिविध गतिका वर्णन ... ५०३ | ६३-श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् .. ५४२ | काशी एव तारक मन्त्रकी महिमा, ॐकार-रूप पुरुषोत्तम रामके चार पाद .. ५४२ ३. मन्थ विद्या और उसकी परम्परा . ५०५ | ६४-गोपालपूर्वतपनीयोपनिषद् .. ५५१ ४. सन्तानोत्पत्ति-विज्ञान ... ५०६ | १ श्रीकृष्णका परब्रह्मत्व, उनका ध्यान करने-योग्य रूप तथा अष्टादशाक्षर मन्त्र . ५५१ ५. समस्त प्रवचनकी परम्पराका वर्णन . ५०९ | २. श्रीकृष्णोपासनाकी विधि तथा यन्त्र-निर्माणका प्रकार .. .. ५५२ ६१-कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् . . ५११ | ३. अष्टादशाक्षरका अर्थ .. .. ५५५ (१) प्रथम अध्याय ५११ | ४. गोपाल-मन्त्रके जपकी महिमा, उसमे गोलोक-धामकी प्राप्ति . ५५६ पर्यङ्क-विद्या . . ५११ | ५. श्रीकृष्णका स्वरूप एवं उनका स्तवन . ५५६ (२) द्वितीय अध्याय ५१५ | ६५-गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् ५५९ प्राणोपासना ... .. ५१५ | राधा आदि गोपियोका दुर्वासासे सवाद, दुर्वासाके द्वारा श्रीकृष्णके स्वरूपका वर्णन . ५५९ आध्यात्मिक अग्निहोत्र ... ५१६ | ६६-नृसिंहपूर्वतपनीयोपनिषद् ... ५६७ विविध उपासनाओंका वर्णन .. ५१७ | १. नरसिंह-मन्त्रराजकी महिमा तथा उसके अङ्गोंका वर्णन . ५६७ दैवपरिमररूपमें प्राणकी उपासना ५१९ | २ मन्त्रराजकी शरण लेनेका फल, उसके अङ्गोका विशद वर्णन, न्यासकी विधि तथा मन्त्रके प्रत्येक पदकी व्याख्या ५६९ मोक्षके लिये सर्वश्रेष्ठ प्राणकी उपासना ५२० | ३ मन्त्रराज आनुष्टुभकी शक्ति तथा बीज ... ५७३ प्राणोपासकका सम्प्रदान-कर्म . ५२१ | ४. मन्त्रराज आनुष्टुभके अङ्गभूत मन्त्र, अप्रत-वाच्यरूप भगवान् नृसिंहदेवके चार पाद, स्तुतिके मन्त्र . ५७३ (३) तृतीय अध्याय . ५२३ | ५. आनुष्टुभ मन्त्रराजके सुदर्शननामक महाचक्रका वर्णन, मन्त्रराजके जपका फल ५७७ इन्द्र-प्रतर्दन-संवाद, प्रज्ञास्वरूप प्राणकी महिमा .. ५२३ | ६७-नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् ५८० (४) चतुर्थ अध्याय . ५२७ | १. 'ॐ' नामसे परमात्म तत्त्वका तथा उसके चार पादोंका वर्णन, चौथे पादके चार भेद ५८० अजातशत्रु और गार्ग्यका सवाद .. ५२७ | २. परमात्माके चार पादोंकी ओंकारकी मात्राओंके साथ एकता, मन्त्रराज आनुष्टुभके द्वारा तुरीय परमात्माका ज्ञान ... ५८२ ६२-श्रीरामपूर्वतपनीयोपनिषद् .. ५३१ | ३ अनुष्टुभमन्त्रराजके पादोंके अलग-अलग जप तथा ध्यानकी विधि ... ५८५ १ राम-नामके विविध अर्थ, भगवान्‌के साकार तत्त्वकी व्याख्या; मन्त्र एवं यन्त्रका माहात्म्य ५३१ | ४ अपने आत्माका पहले तुरीय-तुरीयरूपमे और पीछे भगवान् नृसिंहके रूपमें ध्यान करके ब्रह्मके साथ अपने-आपको एकीभूत करनेकी विधि ... ... ... ५९१ २ श्रीरामके स्वरूपका कथन, राम-बीजकी व्याख्या ५३२ | ३ राम-मन्त्रकी व्याख्या, जपकी प्रक्रिया तथा ध्यान ५३२ | ४ षडक्षर-मन्त्रका स्वरूप, भगवान् श्रीरामका स्तवन ५३३ | ५ खरके वधसे लेकर बाली-वधतकका संक्षिप्त चरित्र ५३४ | ६. शेष चरित्रका संक्षिप्त वर्णन; आवरण-पूजाके लिये यन्त्रस्थ देवताओंका निरूपण . ५३४ | ७. पूजा-यन्त्रका विस्तृत वर्णन .. ५३६ | ८. पूजा-यन्त्रके अगले अङ्गोंका वर्णन ५३६ | ९. पूजा-यन्त्रके शेषभागका वर्णन तथा श्रीरामके माला-मन्त्रका स्वरूप एवं माहात्म्य . ५३७ | १०. पूजाकी सविस्तर विधि ... . ५३८ |

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( ९ ) पृष्ठ-संख्या पृष्ठ-संख्या ५. अनुष्टुप्-मन्त्रका ओंकारमें अन्तर्भाव करके के सम्बन्धसे ब्रह्मकी जगत्-स्वरूपता और उसीके द्वारा परमात्माके चिन्तनकी विधि ५९२ समाधिका वर्णन . ६४२ ६. अपने-आपको प्रणवके वाच्यार्थ परब्रह्ममें ७६-देव्युपनिषद् .. ६४६ विलीन करनेकी विधि ५९४ देवीकी ब्रह्मस्वरूपता, देवताओं‌द्वारा देवीकी स्तुति, ७ परमात्मा तथा आत्माकी एकताका अनुभव देवी-महिमा और इसके पाठका फल ६४६ एवं चिन्तन करनेका प्रकार ५९५ ७७-बह्वृचोपनिषद् .. ६४९ ८. भयरहित ब्रह्मरूप हो जानेकी विधि .. ५९७ देवीसे सबकी उत्पत्ति और देवीकी ब्रह्मरूपता ६४९ ९. प्रणवके द्वारा आत्माको जानकर साक्षिरूपसे ७८-सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् . ६५० स्थित होनेकी विधि ५९९ १ श्रीमहालक्ष्मीका श्रीसूक्तके अनुसार ६८-महोपनिषद् . ६०३ ध्यान, न्यास, पूजन और यन्त्रकी विधि ६५० १. सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन ६०३ २ योगसम्बन्धी उपदेश ६५२ २. शुकदेवजीको आत्माके सम्बन्धमें जनकका ३. नवचक्र-विवेक ६५३ उपदेश, जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिका स्वरूप ६०४ ४ श्रीसूक्त ६५५ ३. निदाघके वैराग्यपूर्ण उद्‌गार ६०७ ७९-सीतोपनिषद् ... ६५७ ४. निदाघके प्रति उनके पिता ऋभुका उपदेश ६०९ श्रीसीताजीके स्वरूपका तात्त्विक वर्णन ६५७ ५ ऋभुका उपदेश चालू, अज्ञान एवं ज्ञानकी ८०-श्रीराधातापिनीयोपनिषद् .. ६६० सात भूमिकाएँ . ६१४ श्रुतियों‌द्वारा श्रीराधिकाजीकी उपासना और ६ ऋभुका उपदेश चालू ६२० स्तुति ६६० ६९-मुक्तिकोपनिषद् ... ६२३ ८१-श्रीराधोपनिषद् ... .. ६६२ १ श्रीराम और हनुमान्‌का संवाद, वेदान्तकी श्रीराधाजीके स्वरूप तथा नामोंका वर्णन ६६२ महिमा, मुक्तिके भेद, १०८ उपनिषदोंकी ८२-ब्रह्मबिन्दूपनिषद् .. ६६४ नामावली तथा वेदोंके अनुसार विभाग, मनके लयका साधन, आत्माका स्वरूप तथा उपनिषदोंके पाठका माहात्म्य तथा उनके ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय ६६४ श्रवणके अधिकारी ६२३ ८३-ध्यानबिन्दूपनिषद् . ६६६ २. जीवन्मुक्ति एवं विदेहमुक्तिका स्वरूप, उनके ध्यानयोगकी महिमा तथा स्वरूप ६६६ होनेमें प्रमाण, उनकी सिद्धिका उपाय तथा ८४-तेजोबिन्दूपनिषद् . ६६८ प्रयोजन . ६२६ प्रणवस्वरूप तेजोमय बिन्दुके ध्यानकी महिमा ७०-गर्भोपनिषद् . ६३० तथा उसके अधिकारी एवं अनधिकारी ६६८ गर्भकी उत्पत्ति एव वृद्धिके प्रकार ६३० ८५-नादबिन्दूपनिषद् .. ६६९ ७१-कैवल्योपनिषद् . ६३२ ( १ ) प्रथम अध्याय ६६९ आत्माका स्वरूप तथा उसे जाननेका उपाय ६३२ १ ॐकारकी हंसरूपमें उपासना ६६९ ७२-कठरुद्रोपनिषद् .. ६३४ २ ॐकारकी बारह मात्राएँ और उनमें संन्यासकी विधि और आत्मतत्त्वका वर्णन . ६३४ प्राणवियोगका फल . ६६९ ७३-रुद्रहृदयोपनिषद् ... ६३७ ३ योगयुक्त स्थितिका वर्णन ६७० भगवान् रुद्रकी सर्वश्रेष्ठता, सर्वस्वरूपता और ( २ ) द्वितीय अध्याय ६७० ब्रह्मस्वरूपता ६३७ १ ज्ञानीके लिये प्रारब्ध नहीं रह जाता .. ६७० ७४-नीलरुद्रोपनिषद् .. ६४० २ नादके अनेक प्रकार .. ६७१ भगवान् नीलरुद्रकी महिमा और शिव-विष्णुकी ३ नादानुसन्धान .. ६७१ एकता .. ६४० ( ३ ) तृतीय अध्याय ६७१ ७५-सरस्वतीरहस्योपनिषद् .. ६४२ १ नादके द्वारा मन कैसे वशीभूत होता है ६७१ दस बीजमन्त्रोंसे युक्त ऋग्वेदके मन्त्रोंसे २ नादमे मनका लय .. ६७२ सरस्वती देवीकी स्तुति, उसका फल, नाम-रूप- ३ मनके अमन हो जानेकी स्थितिका वर्णन ६७२ आ-

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( १२ ) पृष्ठ संख्या | पृष्ठ-संख्या १०-औपनिषद-सिद्धान्त . . १२० | १३-जैन उपनिषदोंका सार (श्रीसूरजचन्दजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी') .. १४६ ११-जाऊँ कैसे ? (श्रीप्रबोध, बी० ए० (आनर्स), साहित्यरत्न, साहित्यालंकार) ... १३१ | १४-अध्यात्मवाद (पं० श्रीरघुनाथप्रसादजी शास्त्री 'साधक') .. ... १५७ १२-उपनिषत्सार (श्रीमवदेवजी झा) १४० | चित्र-सूची पृष्ठ संख्या | पृष्ठ-संख्या रंगीन | इकरंगे १-उपनिषद्-अङ्कका टाइटल 'मुखपृष्ठ | १५-देवताओंके सामने यक्षका प्राकट्य . १७८ २-दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण १ | १६-अग्निकी असमर्थता . १७८ ३-प्रार्थना .. १६१ | १७-भगवती उमा और इन्द्र .. १८१ ४-पिप्पलादके आश्रममें सुकेशादि मुनि २६० | १८-नचिकेताको मृत्युके अर्पण करना .. १८८ ५-अङ्गिरस और शौनक . २६० | १९-यमराज और नचिकेता . . १८८ ६-यज्ञशालामें उपस्ति .. ४२७ | २०-वरुण और भृगु . . ३६३ ७-रैक्व और जानश्रुति ४२७ | २१-जगत्कारण-मीमांसा . . ३६३ ८-भगवान् श्रीरामचन्द्र . ५३३ | २२-सत्यकाम और उपकोशल .. . ४३६ ९-भगवान् श्रीगोविन्द .. ५६३ | २३-राजा अश्वपतिके भवनमें उद्दालक ... ४३६ १०-सच्चिदानन्द नारायण ... ५६३ | २४-सनत्कुमार-नारद-संवाद . ४४९ ११-श्रीसरस्वती ... ६४४ | २५-मैत्रेयीको उपदेश ... ४४९ १२-सच्चिदानन्दमयी देवी .. ६४७ | २६-ब्रह्मचारियोंको याज्ञवल्क्यका आदेश .. ४७६ १३-श्रीश्रीमहालक्ष्मी .. ६५१ | २७-जनक-याज्ञवल्क्य . .. ४८८ १४-श्रीगणपति . ६९२ | २८-श्रीराम-यन्त्र . . ५३६ | २९-गोपाल-यन्त्र ... . ५५२ | ३०-सुदर्शनमहाचक्र . ... ५७६ कल्याणके पुराने प्राप्य अङ्क ( इनमें ग्राहकोंको कमीशन नहीं दिया जायगा । डाकखर्च हमारा लगेगा । ) संक्षिप्त पद्मपुराणाङ्क पूरी फाइल, पृष्ठ-संख्या ९७८, रङ्गीन चित्र २१, लाइन चित्र २४१, मूल्य ४=) पुराने वर्षोंके साधारण अङ्क आधे मूल्यमें २१ वें वर्षके साधारण अङ्क २, ३, ४, ५, ९, १०, ११, १२ कुल आठ अङ्क एक साथ मूल्य १।), रजिस्ट्री-खर्च ।) कुल १॥) २२ वें वर्षके साधारण अङ्क ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १० कुल आठ अङ्क एक साथ मूल्य १।), रजिस्ट्री-खर्च ।) कुल १॥) उपर्युक्त दोनों वर्षोंके कुल १६ अङ्क एक साथ रजिस्ट्री खर्चसहित मूल्य २॥।) व्यवस्थापक - 'कल्याण', पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)

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कल्याण दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम् । द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं वनमालिनमीश्वरम् ॥ गोपगोपाङ्गनावीतं सुरद्रुमतलाश्रितम् । दिव्यालेङ्करणोपेतं रत्नपङ्कजमध्यगम् ॥ कालिन्दीजलकल्लोलसङ्गिमारुतसेवितम् । चिन्तयंश्चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृतेः ॥ (गो० पू०)

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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ कल्याण वेणुवादनशीलाय गोपालायाहिमर्दिने । कालिन्दीकूललीलाय लोलकुण्डलधारिणे ॥ वल्लवीनयनाम्भोजमालिने नृत्यशालिने । नमः प्रणतपालाय श्रीकृष्णाय नमो नमः ॥ वर्ष २३ } गोरखपुर, सौर माघ २००५, जनवरी १९४९ { संख्या १ पूर्ण संख्या २६६ शरणागति यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ (श्वेताश्वतर० ६। १८) जिन परमेश्वरने ब्रह्माको सर्वप्रथम उत्पन्न किया । जिनने उनको अमित ज्ञानका आकर अपना वेद दिया ॥ आत्मबुद्धिके विमल प्रकाशक अखिल विश्वमे रहे विराज । मैं मुमुक्षु उन परम देवकी शरण ग्रहण करता हूँ आज ॥ उ० सं० १—

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औपनिषद-ब्रह्मका सर्वातीत और सर्वकारण-स्वरूप तथा उसके जाननेका फल ( १ ) यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं सं च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ योनि-योनि—कारण-कारणके जो हैं एक अधिष्ठाता, जिनमें सब विलीन होता जग, जिनसे यह उद्भव पाता । वे आराध्य वरद ईश्वर हैं, वे ही देव—अलौकिक कान्ति, उन्हें तत्त्वसे जान यहाँ मानव पाता है शाश्वत शान्ति ॥ ( २ ) सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥ परम सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, हृदयकी गहन गुफामें छिप जाने, अति महान् वे, घेर विश्वको एकमात्र ही छवि पाते । वे ही एक जगत्-स्रष्टा हैं, विविध रूपमें वे आते, जान उन्हीं मङ्गलमय प्रभुको शान्ति सनातन नर पाते ॥ ( ३ ) स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥ वे ही स्थितिके समय भुवनके संरक्षक, जगके स्वामी, सब भूतोंमे छिपे हुए हैं, वे ही बन अन्तर्यामी । उनका ही ब्रह्मर्षि, देवगण एक चित्त हो करते ध्यान, जान उन्हें यों मनुज मृत्युके तोड़ डालता पाश महान ॥ ( ४ ) घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ माखनमें स्थित सारभाग-से परम सूक्ष्म जो अतिशय सार, एकमात्र सब ओर व्याप्त जो घेरे हुए सकल संसार ।

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  • औपनिषद्-ब्रह्मका सर्वातीत और सर्वकारण-स्वरूप तथा उसके जाननेका फल * ३ सब भूतोंमें छिपे हुए हैं शिव—कल्याणगुणोंसे युक्त, जान उन्हीं प्रभुको होता नर सब भवके बन्धनसे मुक्त ॥ ( ५ ) एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ये ही देव विश्वकर्मा हैं परमात्मा सबके स्वामी, सब मनुजोंके सदा हृदयमें बसे हुए अन्तर्यामी । हृदय, बुद्धि, मनसे चिन्तन हो, तब इनका हो साक्षात्कार, इस रहस्यको जान गये जो जन्म-मृत्युसे होते पार ॥ ( ६ ) तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ता- द्विद्दाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ इन्द्र आदि लोकेश्वर जिनको परम महेश्वर जान रहे, अन्य देवगण भी जिनको निज परम देव हैं मान रहे। पतियोंके भी पूज्य परम पति जगदीश्वर जो स्तुत्य महान्, उन प्रकाशमय परमदेवको समझा हमने सर्वप्रधान ॥ ( ७ ) न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ देह और इन्द्रियसे उनका है सम्बन्ध नहीं कोई, अधिक कहाँ, उनके सम भी तो दीख रहा न कहीं कोई । ज्ञानरूप, बलरूप, क्रियामय, उनकी परा शक्ति भारी, विविध रूपमे सुनी गयी है, स्वाभाविक उनमें सारी ॥ ( ८ ) न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥
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५ ⁕ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁕ वे ही पति, इस जगमें कोई उनका अधिपति शेष नहीं, शासक भी न, कहींपर उनका कोई चिह्न-विशेष नहीं। वे ही एक परम कारण हैं, इन्द्रिय-देवोंके अधिनाय, जनक न उनका, अधिप न कोई, उनसे ही सब विश्व सनाथ॥ (९) एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥ सब भूतोंमें छिपे हुए वे एक देव हैं परमात्मा, सबमे व्यापक, सब जीवोंके वे अन्तर्यामी आत्मा। कर्मोंके अधिपति, फलदाता, सबके ही आश्रय-आवास, साक्षी हैं, केवल, निर्गुण हैं, चेतन हैं—चैतन्य-प्रकाश॥ (१०) एको वशी निष्क्रियाणां बहूना- मेकं बीजं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ जो असंख्य निष्क्रिय जीवोंके शासक और नियन्ता एक, एकमात्र इस प्रकृति बीजको देते हैं जो रूप अनेक। उन प्रभुको निज हृदयस्थित जो सदा देखते धीर प्रवीन, उन्हें सनातन सुख मिलता है, नहीं उन्हें जो साधनहीन॥ (११) नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥* चेतन परम चेतनोंमें, नित्योंमें भी जो नित्य महान्, करते एक अनेक जीवके कर्मफलोंका भोग-विधान। वे सबके कारण हैं, होता सांख्ययोगसे उनका ज्ञान, पाता मोक्ष सभी बन्धनसे नर उन परमदेवको जान॥

  • ये सभी मन्त्र श्वेताश्वतर-उपनिषद्के हैं, इनमें पहले मन्त्रकी संख्या ४।१९, दूसरेसे पाचवें- तककी ४।१४ से ४।१७, छठेसे आठवेंतककी ६।७ से ६।९ और नवेंसे ग्यारहवेंतककी मन्त्रसंख्या ६।११ से ६।१३ है।
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उपनिषद्

( पूज्य-श्रीमज्जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्य अनन्तश्रीविभूषित श्रीमज्ज्योतिर्पीठाधीश्वर स्वामी श्रीब्रह्मानन्द सरस्वतीजी महाराज ) [बायाँ स्तम्भ] धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्दधीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ उपनिषद् अध्यात्मविद्या अथवा ब्रह्मविद्याको कहते हैं । वेदका अन्तिम भाग होनेसे इसे वेदान्त भी कहा जाता है और वेदान्तसम्बन्धी श्रुति-सङ्ग्रह-ग्रन्थोंके लिये भी उपनिषच्छब्दका प्रयोग होता है । उपनिषद् वेदका ज्ञानकाण्ड है। यह चिरप्रदीप्त वह ज्ञानदीपक है जो सृष्टिके आदिसे प्रकाश देता चला आ रहा है और लयपर्यन्त पूर्ववत् प्रकाशित रहेगा । इसके प्रकाशमें वह अमरत्व है, जिसने सनातनधर्मके मूलका सिञ्चन किया है। यह जगत्कल्याणकारी भारतकी अपनी निधि है, जिसके सम्मुख विश्वका प्रत्येक स्वाभिमानी सभ्य राष्ट्र श्रद्धासे नतमस्तक रहा है और सदा रहेगा । अपौरुषेय वेदका अन्तिम अध्यायरूप यह उपनिषद्, ज्ञानका आदिस्रोत और विद्याका अक्षय्य भण्डार है । वेद-विद्याके चरम सिद्धान्त— ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन ।’ ( त्रिपाद्विभूतिमहाना० ३ । ३ ) —का प्रतिपादन कर उपनिषद् जीवको अल्पज्ञानसे अनन्त ज्ञानकी ओर, अल्पसत्ता और सीमित सामर्थ्यसे अनन्त सत्ता और अनन्त शक्तिकी ओर, जगद्दुःखोंसे अनन्तानन्दकी ओर और जन्म-मृत्यु-बन्धनसे अनन्त स्वातन्त्र्यमय शाश्वती शान्ति- की ओर ले जाती है । उपनिषद् सद्गुरुओंसे प्राप्त करनेकी वस्तु है। वैसे तो अधिकारानधिकारपर विचार न करके स्वेच्छया ग्रन्थरूपमें उपनिषदोंका कोई भी अध्ययन कर सकता है, किंतु इस प्रकारसे किसीको ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति नहीं हो सकती । अनधिकारीके साधनसम्पत्तिहीन वासनावासित अन्तःकरणमे ब्रह्मविद्याका प्रकाश नहीं होता । जिस प्रकार मलिन वस्त्रपर रंग ठीक नहीं चढता और जिस प्रकार बंजर भूमिमे, जहाँ लंबी-लंबी जड़ोंवाली घास पहलेसे जमी हुई है, धान्यबीज अङ्कुरित नहीं होता और कुछ अङ्कुरित हो भी जाय तो वृद्धिंगत होकर फलित नहीं होता, उसी प्रकार अनधिकारीके वासनापूर्ण अन्तःकरणमें ब्रह्मविद्याका उपदेशबीज अङ्कुरित [दायाँ स्तम्भ] नही होता और यदि कुछ अङ्कुरित हो भी जाय तो उसमें आत्मनिष्ठारूपी वृद्धि और जीवन्मुक्तिरूपी फलकी प्राप्ति नहीं होती । इसीलिये शास्त्रोंमे सर्वत्र अधिकारीरूपी क्षेत्र- की सम्यक् परीक्षाका विधान है। श्रुतिका आदेश है— नापुत्राय दातव्यं नाशिष्याय दातव्यम् । सम्यक् परीक्ष्य दातव्यं मास षाण्मासवत्सरम् ॥ जिस प्रकार गुरुके लिये शिष्यकी परीक्षाका विधान है, उसी प्रकार शिष्यके लिये भी गुरुके लक्षणोका स्पष्ट निर्देश करते हुए उपनिषद्का उपदेश है— 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥' ( मुण्डक० १ । २ । १२ ) भगवद्गीता भी विधान करती है— तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञान ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन ॥ श्रोत्रिय अर्थात् वेदवेदार्थके ज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ अपरोक्षज्ञानी तत्त्वदर्शी गुरुको प्रसन्न करके उनसे उपनिषद्का उपदेश श्रवण करनेका विधान है। श्रवणं तु गुरो. पूर्वं मननं तदनन्तरम् । निदिध्यासनमित्येतत्पूर्णबोधस्य कारणम् ॥ ( शुक्लरहस्य० ३ । १३ ) साधनचतुष्टयसम्पन्न जिज्ञासु श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुके द्वारा उपनिषत्तत्त्वका उपदेश श्रवण कर तार्किक युक्तियोंद्वारा उसपर प्रगाढ मनन करते हुए गुरूपदिष्ट ध्यानादिके अभ्यास- द्वारा निदिध्यासनपूर्वक 'अह ब्रह्मास्मि' आदिका निरन्तर विचार करते हुए उसपर निष्ठाारूढ होकर सम्यक् तत्त्वज्ञान- विज्ञानस्वरूप परब्रह्मसत्तामे प्रवेश करके तद्रूप हो जाता है— 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'

  • उपनिषद्का यह उपदेश जीवके लिये परमसौभाग्यास्पद अमूल्य निर्णय है । उपनिषत्तत्त्वोपदेशके निष्कर्षमे जीव-ब्रह्मैक्यप्रतिपादन करते हुए पूर्वाचार्योंने संक्षेपमे कह दिया है— 'जीवो ब्रह्मैव नापर ' जीव ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे पृथक् नहीं है । उपनिषद्का उपदेश है—
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६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' 'तत्त्वमसि' यह समस्त (भासमान द्वैतप्रपञ्च ) वास्तवमें ब्रह्म ही है। वही (ब्रह्म) तू है। यह उपनिषद्‌के तत्त्वज्ञानोपदेशका सारांश है। इसमें निष्ठा न होना ही अज्ञान है। जीव ब्रह्मसे अभिन्न होते हुए भी अविद्याके कारण अपने वास्तविक, अजन्मा, अविनाशी, शुद्ध बुद्ध मुक्त सच्चिदानन्दमय आत्मस्वरूपको विस्मृत कर अपनेको जन्म मरणधर्मा, कर्ता, भोक्ता, सुखदुःखवान् मान बैठा है और मिथ्या जगत्में सत्यबुद्धि करके स्वनिर्मित कर्मपाशमें स्वयं बँधकर जन्म मरण संसृतिमें फँसा हुआ अनन्त दुःख भोग रहा है। जीवके सकल दुःखोंके कारण- इस अविद्याकी निवृत्तिके लिये उपनिषदोंमें जीव-ब्रह्मकी एकताके प्रतिपादनके साथ साथ जगत्‌के मिथ्यात्वका उपदेश भी हुआ है, जिसे पूर्वाचार्योंने- 'ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या' -इन सरल शब्दोंमें स्पष्ट कर दिया है। ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है। जिस प्रकार मन्दान्धकारमें रज्जु ही सर्परूप दिखलायी देती है, उसी प्रकार अविद्यामे निर्गुण निराकार ब्रह्म सत्ता ही सगुण साकार जगद्रूप दिखलायी देती है। जिस प्रकार मन्दान्धकारके कारण वास्तविक रज्जु नहीं दिखलायी पड़ती, प्रत्युत वास्तविक सत्ताहीन सर्प ही प्रतिभासित होता है, उसी प्रकार अविद्याके कारण वास्तविक (पारमार्थिक) सत्तामय ब्रह्म नहीं प्रतीत होता और वास्तविक सत्ताहीन व्यावहारिक जगत् ही प्रत्यक्ष प्रतीत होता है। वस्तु एक ही है-जो रज्जु है, वही (भ्रमावस्थामे ) सर्परूप है। उसी प्रकार (ज्ञानावस्थामें ) जो ब्रह्म है वही ( भ्रमावस्था, अज्ञानकी अवस्थामें ) जगद्रूप है। जगत्‌की सत्य-प्रतीति और ब्रह्मकी अप्रतीति तबतक होती रहती है, जबतक अविद्यान्धकारकी निवृत्ति नहीं होती । विचाररूपी प्रकाशद्वारा अधिष्ठानका निश्चय होते ही स्पष्ट हो जाता है कि सर्वाधिष्ठान ब्रह्मसत्ता ही (पारमार्थिक) सत्य है और रज्जुमे आपन्न सर्पके समान ब्रह्ममे अध्यस्त जगत् मिथ्या है। इस प्रकार सद्‌गुरुओंगे दृष्टान्तादिके द्वारा औपनिषद- ज्ञान भलीप्रकार श्रवण कर जिज्ञासु उसपर मनन करते हुए वैराग्यादि साधन सम्पत्तिके सहयोगमे जगत्‌के मिथ्यात्वकी पुष्टि और निदिध्यासनादि अन्तरङ्ग साधनोके सहयोगसे जीवब्रह्मैक्यनिष्ठा-सम्पादनद्वारा स्वात्मानुभूतिमय ज्ञानदीपक प्रदीप्त कर अनादिकालीन अविद्यान्धकारकी निवृत्तिद्वारा निश्चय कर लेता है कि एकमात्र अद्वितीय स्वगत-सजातीय- विजातीय भेदशून्य त्रिकालाबाधित ब्रह्मसत्ता ही सत्य है। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी पारमार्थिक सत्य नहीं है । इस प्रकार दृढ बोधवान् ज्ञानीके लिये अन्य कुछ ज्ञातव्य एव प्राप्तव्य शेष नहीं रह जाता । कृतकृत्य होकर वह नित्य- बोधमय निजस्वरूपमे प्रतिष्ठित हो सच्चिदानन्दका सर्वत्र अनुभव करता हुआ जीवन्मुक्तिका परमानन्द लाभ कर ब्रह्मकी अद्वितीय चिन्मय सत्तामें प्रवेश कर जाता है । ऐसे ब्रह्म- स्वरूप विज्ञानीके लिये उपनिषद्‌का निश्चय है कि- 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति' 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ।' (बृहदा० ४ । ४ । ६) जीव-ब्रह्मैक्य-ज्ञान-निष्ठाकी यह चरम सीमा ही औपनिषद- ज्ञानकी पराकाष्ठा है। उपनिषत्तत्त्व, निर्गुण निराकार ब्रह्म अवाङ्मनसगोचर है । श्रुति उसके लिये कहती है- 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।' इसी अवाङ्मनसगोचर परमाद्वितीय निर्गुण परम तत्त्वका बोध करानेके लिये उपनिषच्छ्रुतियाँ- 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते--' -इत्यादिके द्वारा इस नानागुणधर्मवान् इन्द्रियग्राह्य (शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्ध आदिमय ) जगत्प्रपञ्चका ब्रह्ममें अध्यारोप करती हैं और फिर इन्हीं इन्द्रियग्राह्य ( एव इन्द्रियानुभवद्वारा परिचित ) गुणधर्मोंके निषेधरूपमें उस निर्गुण निर्व्यपदेश्य निर्विशेष ब्रह्म-सत्ताका परिचय कराती हैं । उदाहरणार्थ कठश्रुति उसे अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस आदि कहकर उसका उपदेश करती है- 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् • • • •' इसी प्रकार माण्डूक्य श्रुति उसके सम्बन्धमे कहती है- 'नान्त प्रज्ञ न बहिःप्रज्ञ नोभयतःप्रज्ञ न प्रज्ञानघन न प्रज्ञ नाप्रज्ञम् ।' 'अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्म- प्रत्ययसार प्रपञ्चोपशम शान्त शिवमद्वैत चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय ।' इसी प्रकार अन्यत्र भी उपनिषदोंमे निषेधरूपमें ही उस