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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पञ्चम अध्याय

ॐ पञ्चम अध्याय ऋभुका उपदेश चालू अज्ञान एवं ज्ञानकी सात भूमिकाएँ महर्षि ऋभु बोले—'तात ! इसके आगे मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे ठीक-ठीक सुनो । अज्ञानकी सात भूमिकाएँ होती हैं, और ज्ञानकी भी सात भूमिकाएँ होती हैं। इनके बीच असख्य दूसरी भूमिकाएँ उत्पन्न होती हैं। स्वरूपमें अवस्थित होना मुक्ति है। अहम्भावना ही स्वरूपसे च्युत होना है। शुद्ध सत्तामात्र संवित् ही आत्माका स्वरूप है, उससे जो विचलित नहीं होते, उनमें अज्ञानसे उत्पन्न राग-द्वेष आदि दूषित भाव नहीं होते । स्वरूपसे च्युत होकर वासनार्थ जो चित्तमें डूबना है, उससे बढकर कोई दूसरा मोह न हुआ है और न होगा । एक विषयसे दूसरे विषयको जाते समय जो मध्यमे स्थिति होती है, वह ध्वस्तमननके आकारवाली स्वरूपस्थिति कहलाती है। सारे सङ्कल्पोंकी सम्यक् शान्तिसे शिलाके समान जो निश्चेष्ट स्थिति होती है, जो जाग्रत्-अवस्था तथा स्वप्नावस्थामे विनिर्मुक्त होती है, वह परा स्वरूपस्थिति कहलाती है। अहंताके क्षीण हो जानेपर, शान्त, चेतन तथा भेदभावसे शून्य जो चित्तकी अवस्था होती है, वह स्वरूपस्थिति कहलाती है ॥ १-७ ॥ 'मोह सात प्रकारका होता है—प्रथम बीज-जाग्रत् अवस्था, दूसरा जाग्रत् अवस्था, तीसरा महाजाग्रत् अवस्था, चौथा जाग्रत्स्वप्न अवस्था, पाँचवाँ स्वप्नावस्था, छठा स्वप्नजाग्रत् अवस्था और सातवाँ सुषुप्ति अवस्था । फिर, ये एक दूसरेसे श्लिष्ट होकर अनेक रूप धारण करते हैं। अब इनके पृथक्- पृथक् लक्षण सुनो। प्रथम, जो नामरहित निर्मल चेतनमें चित्की आगे होनेवाली चित्त, जीव आदि नाम, शब्द तथा अर्थकी पात्रतासे युक्त अवस्था होती है, वह बीजरूपमें स्थित जाग्रत्-अवस्था बीजजाग्रत् कहलाती है। यह ज्ञाताकी नवीन अवस्था होती है, अब तुम जाग्रत्की सम्यक् स्थितिकी बात सुनो। बीज-जाग्रत् अवस्थाके बाद 'यह मै हूँ, यह मेरा है'- अपने भीतर जो ऐसी प्रतीति होती है, वह अतिरिक्त भावनाओंसे पहले होनेवाली मोहकी दूसरी जाग्रत् अवस्था कहलाती है। 'यह वह पुरुष है, मैं यह हूँ, वह मेरी वस्तु है' यह पूर्वजन्मों- का उदित हुआ पुष्ट प्रत्यय महाजाग्रत् कहलाता है। अरूढ अथवा रूढ, सर्वथा मनोमय, जो मनकी काल्पनिक सृष्टि जाग्रदवस्थामें होती है, उसे जाग्रत्स्वप्न कहते हैं। एक चन्द्रमें दो चन्द्रोंका भान होना, शुक्ति ( सीप ) मे रजतका भान होना, मृगतृष्णामें जलका भान होना—इत्यादि भेदसे अभ्यासको प्राप्त हुआ जाग्रत्स्वप्न अनेक प्रकारका होता है। थोडी देरतक मैंने देखा, अब यह दृष्टिगत नहीं हो रहा है— जिस अवस्थासे जागनेपर मनुष्यको इस प्रकारका परामर्श (स्मृति) होता है, वह स्वप्न कहलाता है। चिरकालतक साक्षात्कार न होनेके कारण जो पूर्ण विकासको नहीं प्राप्त हुआ, बड़ी-बड़ी बातोंवाला, देरतक टिकनेवाला स्वप्न जाग्रत्के समान ही उदित होता है, वह जाग्रत् अवस्थामें भी परिस्फुरित होनेवाला स्वप्न स्वप्नजाग्रत् कहलाता है। इन छः अवस्थाओंका परित्याग कर जीवकी जो जडात्मक अवस्थिति होती है, वह आनेवाले दुःखबोधसे युक्त अवस्था सुषुप्ति कहलाती है। उस अवस्थामें जगत् अन्तस्तममें लीन हो जाता है। ब्रह्मन् ! मैंने अज्ञानकी इन सात भूमिकाओंको बतलाया । इनमें एक-एक सैकड़ों प्रकारकी विविध ऐश्वर्योंसे युक्त अवस्थाओंका रूप धारण करती है। अब हे निष्पाप पुत्र ! ज्ञानकी जो सात भूमिकाएँ हैं, उनको सुनो, जिनको जान लेनेपर पुरुष पुनः मोह-पङ्कमें नहीं पड़ता ॥ ८—२१ ॥ 'सिद्धान्तवादी लोग योग-भूमिकाओंके बहुतसे भेद बतलाते हैं, परन्तु मुझे तो ये ही कल्याणप्रद सात भूमिकाएँ अभीष्ट हैं। इस प्रकार इन सात भूमिकाओंमें होनेवाले अवबोधको 'ज्ञान' कहते हैं, और इन भूमियोंके पश्चात् होनेवाली मुक्ति 'ज्ञेय' कही जाती है। शुभेच्छा नामकी पहली ज्ञानभूमि कहलाती है। दूसरी विचारणा कहलाती है। तीसरी तनुमानसी, चौथी सत्त्वापत्ति, उसके बाद पाँचवीं असंसक्ति, षष्ठी पदार्थाभावना तथा सप्तमी तुर्यगा है। इनके अन्तर्गत वह मुक्ति है, जिसे प्राप्तकर पुनः शोक नहीं करना पड़ता । अब तुम इन भूमिकाओंकी परिभाषा सुनो । 'मैं मूढ बनकर क्यों बैठा हूँ ? शास्त्र तथा सज्जनोंसे मैं जिज्ञासा करूँगा'—इस प्रकारकी वैराग्य-

अध्याय ५ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ६१५

अध्याय ५ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१५ से पूर्व जो इच्छा होती है, उसे ज्ञानीजन शुभेच्छा कहते हैं। शास्त्र तथा सज्जनोंके सम्पर्कके कारण अभ्यास और वैराग्यके साथ- साथ जो सदाचरणकी प्रवृत्ति है, वह विचारणा कहलाती है। विचारणा और शुभेच्छाके द्वारा इन्द्रियोंके विषयोंमें अनुरक्ति जब क्षीणताको प्राप्त होती है, तब वह तनुमानसी अवस्था कहलाती है। इन तीनों भूमियोंके अभ्याससे वैराग्यके वशीभूत हो जब चित्त शुद्ध सत्त्वस्वरूपमें स्थित होता है, तब उसे सत्त्वापत्ति कहते हैं। इन चारों भूमियोंके अभ्याससे सत्त्वारूढ होकर चमकनेवाली जो असंगहीन कला है, वह असंसक्ति कहलाती है। इन पाँचों भूमियोंके अभ्यासके फलस्वरूप दृढ़तापूर्वक अपने आत्मामें ही रमण करते रहनेसे तथा आन्तर और बाह्य पदार्थोंकी भावना नष्ट हो जानेसे जिसमें दूसरोंके द्वारा चिरकालतक प्रयत्न करानेपर बाह्यभान होता है, वह पदार्थाभावना नामकी षष्ठ भूमिका है। इन छ भूमियोंमें चिरकालतक अभ्यास करनेके बाद भेदबुद्धिका अभाव हो जानेके कारण जो आत्मभावमें एकनिष्ठा हो जाती है, वह तुर्यगा स्थिति कहलाती है। यही तुर्यावस्था जीवन्मुक्त पुरुषकी होती है। इसके पश्चात् जो तुर्यातीत अवस्था है, वह विदेहमुक्तिका विषय है। निदाघ ! जो महा- भाग्यवान् पुरुष सप्तमी भूमिकाका आश्रय ले चुके हैं, वे आत्मामें रमण करनेवाले महात्मा महान् पदको प्राप्त हो गये हैं। जीवन्मुक्त पुरुष सुख दु खके अनुभवकी स्थितिमें नहीं पड़ते। वे कभी कर्त्तव्य-कर्मोंमें लगे रहते हैं और कभी उनमें अलग हो जाते हैं। अपने पासके लोगोंके द्वारा चेताये जानेपर सोकर जगे हुएके समान उठकर, सनातन आचारोंका आचरण करने लगते हैं। ये सात भूमिकाएँ बुद्धिमान् पुरुषोंकी ही ज्ञात होती हैं। इन ज्ञानावस्थाओंको प्राप्तकर जो पशु, म्लेच्छ आदि हैं, वे भी देह रहते या देह त्यागनेके बाद मुक्तिको प्राप्त करते हैं- इसमें सन्देह नहीं है। हृदयकी गाँठोंका खुल जाना ही ज्ञान है, और ज्ञान होनेपर ही मुक्ति होती है ॥ २२-४० ॥ 'मृगतृष्णामें जलकी भ्रान्तिके समान अनात्ममे आत्मबुद्धि आदि अविद्याकी शान्ति ही मुक्ति है, जो मोहसागरसे पार हो गये हैं, उन्होंने ही परम पदको प्राप्त किया है। वे आत्मसाक्षात्कार- की प्राप्तिमे लगे हुए पुरुष इन भूमिकाओंमे स्थित होते हैं। मनकी पूर्णत शान्तिके उपायको योग कहते हैं। उस योगकी सात भूमिकाएँ हैं और उन भूमिकाओंको ऊपर बतला आये हैं। इन भूमिकाओंका लक्ष्य है ब्रह्मपदकी प्राप्ति- जहाँ तू, मैं, अपने और परायेका कोई भाव नहीं रहता, न कोई भावात्मक बुद्धि होती है और न भावाभावका चिन्तन होता है। सब शान्त, आलम्बनशून्य, आकाशस्वरूप, शाश्वत, शिव, दोषरहित, भासमान न होनेवाला, अनिर्वचनीय, कारण- हीन, न सत् न असत्, न मध्य न अन्त, सम्पूर्ण नहीं और सम्पूर्ण भी, मन और वाणीके द्वारा अग्राह्य, पूर्णसे पूर्ण, सुखसे सुखतरस्वरूप, संवेदनमें न आनेवाला, पूर्ण शान्त, आत्मसाक्षात्कारस्वरूप तथा व्यापक ब्रह्मका स्वरूप है। समस्त जागतिक पदार्थोंकी सत्ता आत्मसंवेदनके अतिरिक्त दूसरी कुछ नहीं है ॥ ४१-४७ ॥ 'द्रष्टा और दृश्यका सम्बन्ध होनेपर बीचमें दृष्टिका जो स्वरूप होता है, वह द्रष्टा, दृश्य तथा दर्शनकी त्रिपुटीसे वर्जित साक्षात्काररूप स्थिति होती है। चित्त जब एक देशसे दूसरे देशको जाता है, तब बीचमे जो चित्तकी स्थिति होती है, उस जाड्यविहीन सच्चिद्रूप मननमे सदा तन्मय रहो। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिसे परे जो तुम्हारा सनातन स्वरूप है, उस जड़ चेतनरहित स्थितिमे सदा तन्मय रहो। एक जड़ताको छोड़कर - क्योंकि वह पत्थरका हृदय है, पाषाणरूपताकी प्राप्ति है-उससे रहित जो अमनस्क स्थिति है, सदा उसमे तन्मय रहो। चित्तको दूरसे त्यागकर जिस किसी स्थितिमे हो, उसीमें स्थिर रहो। परमात्मतत्त्वसे पहले मन निकला। तत्पश्चात् मनसे ही विश्वजालसे पूर्ण यह जगत् विस्तृत हुआ। हे विप्र ! शून्यसे भी शून्य उत्पन्न होता है, जैसे आकाश शून्य है और उससे सुन्दर लगनेवाली नीलिमा उल्लसित होती है। सङ्कल्पके नाश हो जानेके कारण जब चित्त गलित हो जाता है, तब संसारके मोहका कुहासा भी गल जाता है। तब शरद्के आनेपर स्वच्छ आकाशके सदृश वह अजन्मा, सबका आदि और अनन्त एक चिन्मात्र विभासित हो उठता है। बिना कर्ताके और बिना रंगके आकाशमें चित्र उठ आया। बिना द्रष्टाके, स्वानुभव, निद्राविहीन स्वप्नदर्शन हो रहा है। साक्षीस्वरूप, समानरूपसे स्वच्छ, निर्विकल्प, दर्पण-जैसे चिदात्मामें बिना इच्छाके तीनों जगत् प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। ब्रह्म एक है, चिदाकाशरूप है, सर्वस्वरूप है और अखण्डित है- चित्त चाञ्चल्यकी शान्तिके लिये यत्नपूर्वक यह भावना करनी चाहिये। जिस प्रकार एक मोटी शिलापर रेखाएँ और उपरेखाएँ खिंची होती हैं, उसी प्रकार त्रैलोक्यसे खचित एक ब्रह्मको देखना चाहिये। किसी दूसरे कारणके न होनेपर यह जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ। अब मैने जो जानना था, उसे जान लिया; जो अद्भुत देखना था, उसे देख लिया। चिरकालका

६१६ महोपनिषद् [ अध्याय ५

६१६ * महोपनिषद् * [ अध्याय ५ थका सा विश्रामको प्राप्त हुआ । चिन्मात्रके अतिरिक्त और कुछ है नहीं, इस प्रकार समझो । इस समस्त जागतिक लीलासे विरत होकर तथा असन्दिग्ध भावसे चिन्मात्रको देखो ॥ ४८-५९ ॥ 'जिन्होंने सङ्कल्प-जालको निरस्त कर दिया है, जो चित्तत्व- हीन परम पदको प्राप्त है, वे ही समस्त दोषोंसे निवृत्त हो ब्रह्म- को प्राप्त करते हैं, जो विमनस्कताको प्राप्त हो चुके हैं, वे शान्त चित्तवाले महाबुद्धिमान् हैं। वेदान्तविचारशील प्राणी, जिनके चित्तकी वृत्तियाँ क्षीण हो गयी हैं, मनश्चिन्तनके त्यागका अभ्यास करते-करते जिनका मन कुछ परिपक्व हो गया है, जो मोक्षका उपाय खोजनेवाले पुरुष हेय तथा उपादेय- दोनों प्रकारके दृश्योंका त्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात् आत्मतत्त्वके साक्षात्कारमे लगे हैं तथा अद्रष्टा अर्थात् प्रपञ्चको नहीं देखते, जो विशेषरूपसे ज्ञातव्य परम तत्त्वमें जागरूक होकर जीवन धारण कर रहे हैं, जो रसमय तथा रस- हीन पदार्थोंमें अत्यन्त परिपक्व वैराग्यके कारण घने मोहसे युक्त संसार-पथमें सोये हुए हैं, वैराग्यकी तीव्रताके कारण पक्षीके जालके समान जिनका संसार-वासनाका जाल टूट गया है तथा हृदयकी ग्रन्थि शिथिल हो गयी है, ऐसे साधकोंका स्वभाव विज्ञानके द्वारा उसी प्रकार सशुद्ध हो जाता है, जिस प्रकार कातक (निर्मली) फलके द्वारा जल स्वच्छ हो जाता है। मन जब रागादिहीन, अनासक्त, द्वन्द्वातीत तथा निरालम्ब हो जाता है, तब वह पिंजड़ेसे छूटे हुए पक्षीके समान मोहजालसे बाहर निकल जाता है । सन्देहरूप दुरात्मापन जिनका शान्त हो गया है, जो प्रपञ्चात्मक कुतूहलसे विरत हैं, उनका चित्त सब प्रकारसे पूर्ण होकर पूर्णचन्द्रके समान सुशोभित होता है ॥ ६०-६८ ॥ 'न मैं हूँ और न यहाँ दूसरा कुछ है, मैं सब दोषोंसे रहित ब्रह्मस्वरूप हूँ- जो इस प्रकार सत् और असत्के मध्यसे देखता है, वही वस्तुतः देखता है । जिस प्रकार सहज ही प्राप्त हुए दर्शन, द्रष्टा तथा दृश्योंमें मन बिना रागके ही जाता है, उसी प्रकार धीर बुद्धिवाले कर्तव्य कर्मोंमें बिना आसक्तिके ही लगे रहते हैं। भलीभाँति जानकर भोगा गया भोग उसी प्रकार तुष्टिका कारण बनता है, जिस प्रकार जानकर सेवा किया गया चोर चोरी छोड़कर मैत्रीका ही निर्वाह करता है। जिसकी मनमें शङ्का भी नहीं है, ऐसे गाँवके मार्गमे आ जानेपर पथिक जिस दृष्टिसे उसे देखता है, उसी दृष्टिसे ज्ञानी पुरुष भोगके ऐश्वर्योको देखते है। निग्रह किया हुआ मन अनायास प्राप्त हुए थोड़े-से भी भोगको, जो विस्तार- को नहीं प्राप्त हुआ है, क्लेशदायक होनेके कारण, बहुत अधिक समझता है । बन्धनसे मुक्त हुआ राजा भोजनके एक ग्रासमात्रसे सन्तुष्ट हो जाता है, परन्तु वह यदि शत्रुके द्वारा आबद्ध न हो तथा आक्रान्त न हो तो राष्ट्र भी उसके लिये उपेक्षणीय हो जाता है। हाथसे हाथको समर्दितकर, दाँत से दाँत पीसकर तथा अङ्गोंसे अङ्गोंको दबाकर, अर्थात् अपने सम्पूर्ण पराक्रम और उत्साहसे, पहले मनपर विजय प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी चाहिये । इस संसार-समुद्रमे मनपर विजय करनेके अतिरिक्त कोई दूसरी गति नहीं है । इस महानरकके साम्राज्यमे दुष्कृतरूपी मतवाले हाथी घूम रहे हैं। आशारूपी बाणो और बरछोंसे सजे- धजे इन्द्रियरूपी शत्रुओका जीतना दुष्कर है। जिन्होंने चित्तके दर्पको नष्ट कर दिया है तथा इन्द्रियरूपी शत्रुओको वशमें कर लिया है, उनकी भोग वासना उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे हेमन्त ऋतुमें कमलका पौधा नष्ट हो जाता है। रात्रिमें बेतालके समान हृदयमें वासनाका तभीतक निवास है, जबतक एकाग्रताके अभ्यासद्वारा मनको जीत नहीं लिया जाता। विवेकी पुरुषका मन अभीष्ट कार्य करनेके कारण भृत्यके समान है, सारे प्रयोजनोंको सिद्ध करनेके कारण मन्त्रीरूप है और मेरे विचारसे समस्त इन्द्रियोको वशमे करनेके कारण सामन्तरूप है। मेरे विचारसे मनीषी पुरुषका मन लालन करनेके कारण स्नेहशील ललनास्वरूप है तथा पालन करनेके कारण पालन करनेवाला पिता है। मनरूपी पिता शास्त्रदृष्टिसे तथा आत्मप्रकाश, आत्मबुद्धि एव आत्मानुभवके द्वारा परम सिद्धिको प्रदान करता है । अत्यन्त हृष्ट, अत्यन्त दृढ, स्वच्छ, भलीभाँति वशमें किया हुआ, भलीभाँति जाग्रत्, आत्मगुणोंसे तेजस्वी बनाया हुआ मनोरम मनरूपी मणि हृदयमें सुशोभित होता है । ब्रह्मन् ! भाँति-भाँतिके पङ्कोंसे मलिन इस मनरूपी मणिको सिद्धिके लिये विवेकरूपी जलसे धोकर आलोकवान् बनो । श्रेष्ठ विवेकका आश्रय लेकर बुद्धिसे सत्यका साक्षात् (निश्चय) करके, इन्द्रियरूपी शत्रुओंको पूर्णतः छिन्नकर संसार-सागर- से पार हो जाओ ॥ ६९-८४ ॥ 'केवल आस्थाको-संसारकी आशाको ही अनन्त दुःखोंका कारण जानो, और सर्वत्र केवल अनास्थाको सुखका घर समझो । वासनाके सूत्रसे बँधा हुआ यह संसार बारबार होता है। वह प्रसिद्ध वासना अत्यन्त दुःखका कारण बनती है और मनका

५] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१७


उन्मूलन करनेके लिये आती है। जीव चाहे धीर हो, अत्यन्त बहुश्रुत हो, कुलीन हो, महान् हो, फिर भी वह तृष्णासे उसी प्रकार बँध जाता है, जैसे शृङ्खलासे सिंह बँध जाता है। परम पुरुषार्थका आश्रय लेकर और भलीभाँति उद्यम करते हुए शास्त्रानुसार शान्तिपूर्वक आचरण करता हुआ कौन पुरुष सिद्धिको नहीं प्राप्त करता । 'मैं ही अखिल विश्वरूप हूँ, मैं अच्युत परमात्मस्वरूप हूँ, मेरे सिवा और कुछ नहीं है'—इस प्रकारके ज्ञानद्वारा होनेवाला अहम्भाव ही श्रेष्ठ है। 'मैं समस्त प्रपञ्चसे अतीत हूँ, बालके अग्रभागसे भी सूक्ष्म हूँ'—ब्रह्मन् ! इस प्रकारके ज्ञानसे जो अहङ्कार होता है, वह दूसरा शुभप्रद अहम्भाव है और वह मोक्षका कारण बनता है, बन्धनका नहीं । ऐसा अहम्भाव जीवन्मुक्त पुरुषोंको ही होता है । 'हाथ-पैर आदिसे युक्त यह शरीरमात्र मैं हूँ'—इस प्रकारका निश्चय तीसरा लौकिक अहङ्कार है और यह अत्यन्त तुच्छ है । यह अहङ्कारात्मक दुरात्मा जीव ही संसाररूपी दुःखद वृक्षका मूल है। इससे मारा गया प्राणी अधःपतनकी ओर ही दौड़ता है । इस दुःखद अहङ्कारको त्यागकर और चिरकालतक शुभ अहङ्कारकी भावनामें लगा हुआ प्राणी शमयुक्त होकर मुक्तिको प्राप्त होता है। पहले कहे गये दो अलौकिक अहङ्कारोंको अङ्गीकार करके तीसरे दुःखद लौकिक अहङ्कारको त्याग देना चाहिये । पश्चात् उनको भी छोड़कर जो सब प्रकारके अहङ्कारोंसे रहित होकर स्थित है, वही उच्च पदको प्राप्त होता है ॥ ८५-९६ ॥

'भोगकी इच्छामात्र ही बन्धन है और उसका त्याग ही मोक्ष कहलाता है । मनकी उन्नति उसके विनाशमे है। मनोनाश महाभाग्यवान्‌का लक्षण है। ज्ञानी पुरुषके मनका नाश हो जाता है । अज्ञानीके लिये मन बन्धनरूप है । ज्ञानीका मन न आनन्दरूप है न आनन्दरहित है, न चल है, न अचल और न स्थिर ही है; वह न सद्रूप है, न असद्रूप ही और न इनके बीचकी ही स्थितिमें रहता है। जैसे चित्‌से प्रकाशित होनेवाला आकाश सूक्ष्मताके कारण दिखलायी नहीं देता, उसी प्रकार अखण्ड चेतनसत्ता सर्वव्यापी होते हुए भी दृष्टिगोचर नहीं होती । सारे सङ्कल्पोंसे रहित, सारी सजातोंसे शून्य यह चिदात्मा अविनाशी तथा स्वात्मा आदि नामोंसे व्यक्त किया जाता है । जो ज्ञानियोंकी दृष्टिमें आकाशसे भी सौगुनी स्वच्छ, निर्मल तथा निष्कल-रूप (अवयवरहित) है, एव जो सकल एव निर्मल संसारके रूपमे एकमात्र अपना ही दर्शन कराती है—इस प्रकारकी चित्, चेतनसत्ता न अस्त होती है न उदय होती है, न उठती है न स्थिर रहती है, न जाती है न आती है; न यहाँ है और न यहाँ नहीं है। वह चित् अर्थात् चेतनसत्ता विकल्परहित, निरालम्ब और निर्मल स्वरूपवाली है। गुरुको चाहिये कि प्रारम्भमें शम-दम आदि गुणोंके द्वारा शिष्यके अन्तःकरणको शुद्ध करे । पश्चात् 'यह सब कुछ ब्रह्मरूप है और तुम शुद्ध ब्रह्मस्वरूप हो' ऐसा बोध प्रदान करे । अज्ञानी पुरुषको तथा जो अर्द्ध-जाग्रत् है, उसे जो कहता है कि 'सब ब्रह्म ही है', वह उसे महानरकजालमें ढकेल देता है । जिसकी बुद्धि जाग्रत् हो गयी है, भोगकी इच्छा नष्ट हो गयी है, तथा जो सर्वथा आकाङ्क्षारहित हो गया है—ऐसे पुरुषको प्राज्ञ गुरु वेदान्तका यह उपदेश दे कि अविद्यारूप मल है ही नहीं । जिस प्रकार दीपकके होनेपर ही प्रकाश होता है, सूर्यनारायणके होनेपर ही दिन होता है, पुष्पके होनेपर ही सुगन्ध होती है, उसी प्रकार चित्-चेतनके ऊपर ही जगत्‌की स्थिति है । यह जगत् वास्तवमे है नहीं, केवल भासता है । जब तुम्हारी ज्ञान-दृष्टि निर्मल—आवरणशून्य हो जायगी, ज्ञानका सब ओर प्रकाश हो जायगा तथा तुम अपने स्वरूपमें स्थित हो जाओगे, तभी तुम मेरे उपदेशके बलाबलको ठीक ठीक जान सकोगे ॥ ९७-१०७ ॥

'स्वार्थनाशके लिये उद्यम करना ही जिसका एकमात्र प्रयोजन है, ऐसी श्रेष्ठ अविद्याके द्वारा ही, ब्रह्मन् ! सब दोषोंको हर लेनेवाली विद्याकी प्राप्ति होती है। अस्त्रके द्वारा अस्त्रका शमन होता है तथा मलके द्वारा मल धोया जाता है, विषके द्वारा विषका शमन होता है, शत्रुके द्वारा शत्रु मारा जाता है । इसी प्रकारकी यह भूतमाया है, जो अपने नाशसे ही हर्ष प्रदान करती है । इसका स्वरूप दिखलायी नहीं देता, दिखलायी देते ही यह नष्ट हो जाती है। परमार्थतः यह माया है ही नहीं—इस प्रकारकी दृढ भावनाके साथ 'सब ब्रह्म ही है'—ऐसी जो अन्तर्भावना होती है, वही मुक्ति प्रदान करती है । यह भेददृष्टि ही अविद्या है। इसका सर्वथा त्याग करना चाहिये ॥ १०८-११३ ॥

मुने ! (मायाके द्वारा) जो नही प्राप्त होता है, वह अक्षयपद कहलाता है । द्विज ! यह माया किससे उत्पन्न हुई—यह तुम्हें नहीं विचारना है । 'मैं इसे किस प्रकार नष्ट करूँ'—यही तुम्हें विचार करना है । इसके क्षीण होकर नष्ट हो जानेपर तुम उस अक्षयपदको जान सकोगे । जहाँसे यह प्रकट होती है, जैसा इसका स्वरूप है, जिस प्रकार यह नष्ट होगी—अर्थात् निदान, लक्षण और शमनके

६१८ महोपनिषद् [ अध्याय ५

६१८ * महोपनिषद् * [ अध्याय ५

उपायका विचार करते हुए, इस रोगके घर अर्थात् अविद्याकी चिकित्साके लिये पूरा प्रयत्न करो, जिससे यह जन्म अर्थात् आवागमनके कष्टोंमें तुम्हें बारवार न डाले, और चित्‌रूपी समुद्र अपने-आपमें स्वच्छ आत्मपरिस्पन्दनके द्वारा विभासित हो उठे। 'वह चित्-सत्ता एक अखण्ड स्वरूपवाली है'— इस प्रकार अपने भीतर दृढ भावना करनी चाहिये। वह चित्-शक्ति चिन्मय समुद्रमें किञ्चित् क्षुभित हो रही है। समुद्रमें लहरोंके समान वहाँ स्वच्छ चिन्मय तरङ्ग ही उठ रहे हैं। अपने-आप आकाश-सरोवरमें जैसे वायु लहराता है, उसी प्रकार स्वात्मामें ही आत्मशक्तिसे आत्मा तरङ्गायमान होता है। सर्व-शक्तिमत्ताके कारण इस प्रकारकी दैवी स्फुरणा क्षणमात्रके लिये होती है। देश, काल और क्रियाकी शक्ति जिसको चलायमान करनेमें समर्थ नहीं होती, वह आत्मशक्ति अपने स्वभावको जानकर उच्च अनन्त पदमें स्थित है । यह चित् शक्ति जाननेमें न आनेके कारण परिमित-सी होकर रूपकी भावना करती है। उस परम आकर्षक-शक्तिके द्वारा जब इस प्रकार रूपकी भावना होती है, उसी समय उसके पीछे नाम और सख्या आदि दृष्टियाँ लग जाती हैं । ब्रह्मन् ! विकल्पके रूपको धारण करनेवाला तथा देश, काल और क्रियाका आधारभूत जो चित्-शक्तिका रूप है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है । पुन वह भी वासनाओंकी कल्पना करता हुआ अहङ्कारका रूप धारण करता है। अहङ्कार जब निश्चयात्मक एव दोपयुक्त हो जाता है, तब वह बुद्धि कहलाता है। और बुद्धि जब सङ्कल्पका रूप ग्रहण करती है, तब मननास्पद मन बनती है । मन जब घने विकल्पमें पडता है, तब शनै-शनै इन्द्रियरूप ग्रहण करता है। हाथ-पैरयुक्त शरीरको बुद्धिमान् पुरुष इन्द्रिय कहते हैं । इस प्रकार जीव सङ्कल्प और वासनाकी रज्जुओंसे बँधकर दुःखजालमे फँसा हुआ क्रमशः अधोगतिको प्राप्त होता है । इस तरह शक्तिमय चित् घने अहङ्कारको प्राप्त होकर रेशम बनानेवाले कीड़ेके समान स्वेच्छासे बन्धनमें पडता है। अपने ही द्वारा कल्पित तन्मात्रारूपी जालके भीतर रहकर, शृङ्खलामें बँधे हुए सिंहके समान, चित् शक्ति अत्यन्त विवशताको प्राप्त हो जाती है । आत्मा ही कहीं मन, कहीं बुद्धि, कहीं ज्ञान, कहीं क्रिया, कहीं अहङ्कार और कहीं चित्तके नामसे जाना जाता है। कहीं इसे प्रकृति कहते हे, और कहीं 'माया है' ऐसी कल्पना करते ह । कहीं यह बन्धनके नामसे प्रसिद्ध है और कहीं पुर्यष्टक कहलाता है। कहीं इसे अविद्या कहते हैं और कहाँ 'इच्छा' माना जाता है । यह आशा- पाशका निर्माण करनेवाले अखिल विश्वको उसी प्रकार धारण करता है, जैसे भीतर फलविहीन वटबीज वटको धारण करता है ॥ ११४-१३३ ॥

'चिन्तारूपी अग्निशिखासे दग्ध, क्रोधरूपी अजगरके द्वारा चबाये हुए, कामरूपी समुद्रके कल्लोलमें स्थित तथा अपने पिता- मह आत्माको भूले हुए इस मनका, ब्रह्मन् ! कीचड़से फँसे हाथीके समान उद्धार करो । प्रपञ्चकी भावनासे व्याप्त इस प्रकारके जीवाश्रित भाव ब्रह्मके द्वारा लाखों, करोड़ों तथा असख्य रूपोंमें कल्पित होकर पहले उत्पन्न हो चुके हैं, और आज भी चारों ओर उत्पन्न हो रहे हैं, तथा निर्झरसे उत्पन्न जलकणोंके समान और भी उत्पन्न होते रहेंगे । कुछ तो प्रथम ही उत्पन्न हो रहे हैं और कुछ भाव सौसे अधिक बार उत्पन्न हो चुके हैं, कोई असख्य जन्म ग्रहण कर चुके हैं और किन्हींके दो ही तीन जन्म हुए हैं। कोई किन्नर, गन्धर्व, विद्याधर एव नागरूपमें प्रकट हे, कोई सूर्य, चन्द्र, वरुण, शिव, हरि एव ब्रह्मारूप बन रहे हैं। कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्ररूपमे स्थित हैं। कोई तृण, ओषधि, वृक्ष, फल, मूल एवं पत्रके रूपमे हैं। कोई कदम्ब, नीबू, आम, ताड़ तथा तमाल वृक्ष बन रहे हैं । कोई महेन्द्र, मलय, सह्य, मन्दर, मेरु आदि पर्वतोंका आकार धारण किये हुए हैं। कोई खारे समुद्र, तथा कोई दूध, घृत, ईखके रस तथा जलकी राशिके रूपमें अवस्थित हैं। कोई विशाल दिशाओंका -रूप धारण किये हुए हैं। कोई महान् वेगशाली नदियोंके रूपमें है। कोई हाथसे फेंके जानेवाले गेंदके समान मृत्युके द्वारा बारवार ताडित होकर आकाशमें ऊपर उठते और नीचे गिरते रहते हैं। कोई-कोई मूर्ख मनुष्य विवेकको प्राप्त करके भी सहस्रों जन्म भोगकर पुन संसाररूपी सङ्कटमें पड़ते हैं। दिशा और कालके द्वारा अनवच्छिन्न आत्मतत्त्व अपनी शक्तिसे सहज ही दिशा और कालके द्वारा आकलित जो शरीर ग्रहण करता है, वही जीवके पर्यायभूत वासनाके आवेगसे सङ्कल्पोन्मुख चञ्चल मनका रूप धारण करता है । वह सङ्कल्पात्मिका मन-शक्ति क्षणमात्रमे निर्मल आकाशकी भावना करती है, उसमे शब्दबीज अङ्कुरोन्मुख रहता है । तत्पश्चात् वही मन और भी घनीभूत होनेपर घने स्पन्दनके क्रमसे वायुके स्पन्दनकी भावना करता है। उसमें स्पर्श-बीज अङ्कुरोन्मुख रहता है । उसके बाद दृढ अभ्यासके द्वारा शब्द और स्पर्श्वरूप आकाश और वायुके सङ्घर्षसे अग्नि उत्पन्न होती है । वह रूप- तन्मात्राके साथ मिलकर तीन गुणोंसे युक्त होती है । उन तीनों गुणोंके साथ सयुक्त हुआ मन रस-तन्मात्राका अनुभव करता हुआ क्षणमात्रमें जलकी शीतलताका चिन्तन करता है। इससे उसे जलका अनुभव होता है । पश्चात् उन चार गुणोंसे युक्त होकर मन दूसरे ही क्षण गन्ध तन्मात्राकी भावना करता है, इससे उसे पृथ्वीका अनुभव होता है। इस प्रकार पाँचों तन्मात्राओंसे घिरकर सूक्ष्मताका त्याग करता हुआ वह आकाशमें अभ्रकणोंके आकारमें स्फुरित शरीरको देखता है।

अध्याय ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१९

वही अहङ्कारकी कलाओंसे युक्त और बुद्धि-बीजसे समन्वित पुर्यष्टक कहलाता है, जो प्राणियोंके हृत्कमलमें मँडरानेवाले षट्पदके समान है। उसमें तीव्र संवेगके द्वारा तेजस्वी शरीरकी भावना करता हुआ मन उसी प्रकार स्थूलताको प्राप्त होता है, जैसे पाकके द्वारा विल्वफल। स्वच्छ आकाशमे, मूषा (सोना गलानेके पात्र) में पिघले सोनेके समान स्फुरित होकर वह तेज अपने स्वभावके द्वारा ही गठित होने लगता है। उसका ऊपरी भाग सिरके पिण्डके समान तथा अधोभाग पैरके समान हो जाता है तथा दोनों पाश्र्वोंमें बाहुकी आकृतियाँ एव मध्यमें उदरका आकार समयानुसार व्यक्त होकर शुद्ध शरीररूप धारण करते हैं। वे ही बुद्धि, वीर्य, बल, उत्साह, विज्ञान और ऐश्वर्यसे युक्त होकर सब लोकोंके पितामह भगवान् ब्रह्मा बनते हैं ॥ १३४-१५७ ॥ 'भूत, भविष्य और वर्तमानको स्पष्ट देखनेवाले भगवान् ब्रह्माजी अपने उत्तम और सुन्दर शरीरको देखकर सोचने लगे कि इस चिन्मात्र आत्मस्वरूपी परमाकाशमे, जिसका ओर-छोर नहीं दिखायी देना, पहले क्या होना चाहिये । इस प्रकार चिन्तन करते ही तत्काल उन्हें निर्मल आत्म-दृष्टि प्राप्त हुई । उन्होंने अतीत कालके अनेकों सर्गोंको देखा तो समस्त धर्मों और गुणोंके सारे क्रम उन्हें स्मरण हो आये । उन्होंने लीलासे ही नाना प्रकारके आचारोंसे युक्त भाँति भाँतिकी प्रजाको आकाशमें गन्धर्व- नगरके समान सङ्कल्पसे उत्पन्न कर दिया । उनके स्वर्ग और अपवर्गके लिये तथा धर्म, काम और अर्थकी सिद्धिके लिये अनन्त चित्र-विचित्र शास्त्रोंकी कल्पना की । ब्रह्मारूपी मन- की कल्पनासे जगत्‌की स्थिति होनेके कारण ब्रह्माके जीवनके साथ ही इसकी स्थिति है, उनके नाशके साथ यह भी नाशको प्राप्त होता है। द्विजवर ! वास्तवमें कहीं कोई न उत्पन्न होता है और न मरता है। सब कुछ मिथ्या दीख पडता है। यह विश्व-प्रपञ्च आशारूपी सर्पिणियोंकी पिटारी है। इसका त्याग करो। 'यह असत् है' यों जानकर मातृभावमें स्थित हो । अर्थात् मै ही इसका उत्पादक हूँ, ऐसी भावना करो । गन्धर्वनगर भूपित हो या अभूपित—वह जिस प्रकार तुच्छ है, उसी प्रकार अविद्याके अंशस्वरूप सुत-दारा आदि- की स्थिति है। फिर इनके लिये सुख-दु ख क्या करना । धन-दारा आदि प्रपञ्चका बढ़ना दुःखमय है। इसमें संतुष्ट होनेकी कोई बात नहीं है। मोह-मायाके बढनेपर, भला, इस लोकमें किसको शान्ति मिली है। जिन वस्तुओंकी अधिकतासे मूर्खोको अनुराग होता है, उन्हींकी प्राप्तिसे प्राज्ञ पुरुषको वैराग्य उत्पन्न होता है। अतएव, तत्त्वज्ञानी निदाघ ! सासारिक व्यवहारोंमें जो-जो नष्ट होता जाय, उसकी उपेक्षा करते चलो और जो-जो प्राप्त होता जाय, उसे ग्रहण करते जाओ । जो भोग प्राप्त नहीं हैं, स्वभावत उनकी इच्छा न करना तथा जो प्राप्त हैं, उनका उपभोग करना—यही पण्डितका लक्षण है । सत् और असत्‌के मध्यमें शुद्ध पदको जानकर तथा उसका अवलम्बन करके आभ्यन्तर तथा बाह्य दृश्योंको न तो ग्रहण करो और न त्याग करो । कर्ममें स्थित जिस ज्ञानी पुरुषको इच्छा और अनिच्छा समान हैं, उसकी बुद्धि जलमें पद्मपत्रके समान लिपाय- मान नहीं होती । ब्राह्मण ! यदि ऐन्द्रिय विषयोंका विभव तुम्हारे हृदयमें स्पन्दित नहीं होता, तो तुम ज्ञातव्य पदार्थको जानकर संसार-सागरसे समुत्तीर्ण हो गये । उच्चपदकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त बुद्धिमत्तापूर्वक वासणारूपी पुष्पोंसे गन्ध लेकर उससे शीघ्र ही अपनी चित्तवृत्तिको दूर हटा लो ॥ १५८-१७५ ॥ 'वासनारूपी जलसे पूर्ण इस ससार-सागरमें जो प्रज्ञारूपी नौकापर आरूढ हैं, वे विद्वान् दूसरे पार पहुँच गये हैं। ससार- रूपी समुद्रको जाननेवाले पुरुष सासारिक व्यवहारका न तो त्याग करते हैं न उसकी आकाङ्क्षा ही करते हैं। वे सारे व्यवहारोंका अनासक्तरूपसे निर्वाह करते हैं। सत्तासामान्य अनन्त आत्मतत्त्व-रूप चेतनका जो विषयोन्मुख होना है, उसी- को विज्ञ पुरुष सङ्कल्पका अङ्कुर मानते हैं । वह सङ्कल्प थोडी- सी सत्ता प्राप्त करके जब शनै -शनै. घनीभूत होता है, तब वह बादलके समान दृढ होकर चित्ताकाशको आच्छन्न करके जडताका कारण बनता है। चेतन विषयोंको अपनेसे पृथक्‌की भाँति समझता हुआ, जिस प्रकार बीज अङ्कुरावस्था- को प्राप्त होता है, वैसे ही सङ्कल्पावस्थाको प्राप्त होता है। सङ्कल्पसे सङ्कल्प-क्रिया स्वय ही उत्पन्न होती है और स्वयं ही शीघ्र-शीघ्र बढ़ती है। वह दुःखका ही कारण बनती है, सुख प्रदान नहीं करती। चित्तमें सङ्कल्पकी क्रिया- को रोको । स्थितिमें पदार्थोंकी भावना मत करो, क्योंकि सङ्कल्पका नाश करनेके लिये जिसने कमर कस ली है, वह पुन. उनका अनुगमन नहीं करेगा । भावनाका केवल अभाव हो जानेपर सङ्कल्प स्वय ही नष्ट हो जाता है। मुनि ! सङ्कल्पके द्वारा ही सङ्कल्पको और मनके द्वारा मनको छिन्न करके तुम अपने आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाओ, इसमें दुष्कर ही क्या है ? क्योंकि जिस प्रकार यह आकाश शून्य है, उसी प्रकार यह जगत् शून्य है। जिस प्रकार धानका छिलका तथा ताँवेकी कालिमा क्रियासे नष्ट हो जाती है, विप्र ! उसी प्रकार पुरुषका मलरूपी दोष क्रियासे दूर हो जाता है। धानके छिलके- की भाँति जीवका मल उसके स्वभावगत है, तथापि वह नष्ट अवश्य हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं है। अतएव उद्योगी बनो' ॥ १७६-१८६ ॥ ॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥

षष्ठ अध्याय

ॐ षष्ठ अध्याय ऋभुका उपदेश चालू 'अन्तरकी आकाररूप एव भावनामय भावोकी सम्पत्तिका त्याग करके, हे निष्पाप ! तुम जो हो, उसी स्थितिमें इस जगत्में सुखसे विचरण करो । 'मै सर्वत्र अकर्ता हूँ'—इस भावनाकी दृढतासे वह परम अमृता नामकी समता ही शेष रहती है । खेद तथा उल्लासके विलास अपने ही किये हुए हैं—इस भावनामे अपने सङ्कल्पके क्षीण होनेपर समता ही अवशिष्ट रह जाती है। समस्त पदार्थोंमें समताकी जो सत्यनिष्ठ स्थिति है, उसमें चित्तके भलीभाँति स्थित होनेपर वह पुनः आवागमनका कारण नहीं बनता। अथवा मुनि ! समस्त कर्तृत्व तथा अकर्तृत्वका त्याग करके, मनको पीकर, तुम जो हो, उसी स्थितिमें स्थिर हो जाओ। अन्तमें समाधिस्थ होकर जिससे तुम त्याग करते हो, उसका भी त्याग कर दो । चेतनने ही मन. सकल्पका आकार धारण कर रक्खा है तथा यही प्रकाश एव अन्धकार बना हुआ है। अतः वासना करनेवालेका प्राणस्पन्दनके साथ साथ समूल त्याग करके आकाशके समान निर्लेप एवं प्रशान्तचित्त हो जाओ। हृदयसे सारी वासनाओंका त्याग करके जो निराकुल होकर रहता है, वह मुक्त है, वह परमेश्वर है । उसने दसो दिशाओंमे भ्रान्तिके वश होकर घूमते हुए समस्त द्रष्टव्य पदार्थोंको देख लिया। युक्तिपूर्वक आचरण करनेवाले ज्ञानी पुरुषके लिये यह ससार गोष्पदके समान सहज ही तरनेयोग्य हो जाता है । शरीरके बाहर तथा भीतर, नीचे-ऊपर तथा दिशाओंमे—इधर-उधर, सर्वत्र आत्मा ही आत्मा है। उसके लिये जगत् अनात्ममय नहीं होता॥१-१०॥ 'वह स्थान नहीं है, जहाँ मैं नहीं हूँ, और वह वस्तु नहीं है, जो आत्ममय न हो । मैं दूसरी किस वस्तुकी इच्छा करूँ, सब कुछ सत् और चिन्मय होकर व्याप्त है। यह सब कुछ निश्चयपूर्वक ब्रह्म ही है, यह सब आत्मा ही व्याप्त हो रहा है । हे निष्पाप ! मैं और हूँ, यह और है—इस प्रकार- की भ्रान्तिको छोड़ दो । व्यापी और नित्य घनब्रह्ममे कल्पित भावोंकी सम्भावना नहीं है। इसमें न शोक है न मोह है, न जरा है न जन्म है । जो आत्मतत्त्वमें है, वही है, अतएव सर्वदा सर्वत्र किसी वस्तुकी इच्छा न करते हुए तथा जो कुछ प्राप्त हो जाय, उसीको अनासक्त होकर भोगते हुए सन्ताप- हीन होकर रहो । त्याग और ग्रहणका परित्याग करके सर्वदा विगतज्वर होकर रहो। हे महामतिमान्! जिसका यह अन्तिम जन्म है, उसमे शीघ्र ही, वगमे श्रेष्ठ मुक्ताके समान, निर्मल विद्या प्रवेश करती है । विरक्त चित्तवालोंकी, सम्यक्रूपमे, स्वानुभूतिसे प्रकट की गयी यह बात है कि द्रष्टाको दृश्यके सम्बन्धसे जो निश्चयात्मिका आनन्द-प्रतीति होती है, उस अपने आत्मतत्त्वसे उत्पन्न स्पन्दनकी हम सम्यक् रीतिसे उपासना करते हैं। वासनाओंके साथ द्रष्टा, दृश्य और दर्शन—इन तीनोका त्याग करके साक्षात्कारके रूपमे भासमान आत्माकी हम सम्यक् उपासना करते हैं । 'अस्ति और नास्ति—इन दोनो पक्षोंके बीचमे स्थित, प्रकाशोको भी प्रकाशित करनेवाले, शाश्वत आत्माकी हम सम्यक् उपासना करते हैं। अपने हृदयमे स्थित महेश्वरको छोड़कर जो अन्य वस्तुकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करते है, वे अपने हाथमे स्थित कौस्तुभ- मणिका त्याग करके दूसरे रत्नकी इच्छा करते हैं। इन इन्द्रियरूपी शत्रुओंको—चाहे ये उठे हुए हों या न हों— बारबार विवेकरूपी दण्डसे उसी प्रकार मारना चाहिये, जैसे इन्द्र वज्रसे पहाड़ोंको मार गिराते है ॥ ११-२१ ॥ 'ससाररूपी रात्रिके दुःस्वप्नरूप एव सर्वथा शून्य इस देहमय भ्रममे जो कुछ प्रपञ्चका प्रसार देखा, सब ही अपवित्र देखा। बाल्यजीवनमे अज्ञानसे आबद्ध रहा, यौवनमें वनिताद्वारा मारा गया, अब अन्तमे यह नराधम स्त्री-पुत्रकी चिन्तामें दुखी होकर क्या कर सकता है । सत्के सिरपर असत् स्थित है। रमणीय भावोंके ऊपर अरमणीयता सवार है। सुखोंके सिर- पर दुःख स्थित है । मे किस एकका आश्रय लूँ ? जिनके निमेष और उन्मेषसे जगत्का सहार और सृष्टि होती है, इस प्रकारके पुरुष भी जब कालके गालमे चले जाते हैं, तब मुझ-जैसों- की तो गणना ही क्या है । ससार ही दुःखोंकी अन्तिम सीमा कही गयी है, उसमे शरीरके पड़े रहनेपर सुखास्वादन कैसे हो सकता है ? मैं जाग गया हूँ, मै जाग गया हूँ । मेरी आत्माको चुरानेवाला दुष्ट चोर यह मन ही है । मनने मुझको चिरकाल- से चुरा लिया है। मैं इसको मार डालूँगा । हेय पदार्थोंके लिये खेद न करो, उपादेय पदार्थोंमें अनुरक्त मत होओ । हेय और उपादेयसम्बन्धी दृष्टिका त्यागकर शेषमे स्थित होकर सुस्थिर हो जाओ । ससारकी ओरसे निराशा, निर्भयता, नित्यता,

अध्याय ६ ]

अध्याय ६ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :- ६२१

समता, अभिन्नता, निष्कामता, निष्क्रियता, सौम्यता, निर्विकल्पता, धृति, मैत्री, सन्तोष, मृदुता तथा मृदुभाषिता प्रभृति गुण वासनासे विहीन तथा हेयोपादेयसे मुक्त ज्ञानी पुरुषमें रहते हैं । तृष्णारूपी भीलनीके फैलाये हुए वासनारूपी जालमे तुम फँस गये हो, चिन्तारूपी रश्मियोंके द्वारा समाररूपी मृगजाल चारों ओर फैला हुआ है । तात ! जिस प्रकार बवंडरसे मेघजाल छिन्न भिन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार इम ज्ञानरूपी तेज बर्छीसे उसे काटकर अपने व्यापक स्वरूपमें स्थित हो जाओ ॥ २२-३२ ॥

'कुल्हाड़ीके द्वारा वृक्षके समान, मनसे ही मनको काटकर 'पावन पदको शीघ्र ही प्राप्तकर स्थिर हो जाओ । खड़े रहते, चलते, सोते, जागते, निवास करते, उठते और गिरते समय भी 'ये सब असत् ही ह' ऐसा निश्चय करके हृद्यमें आस्थाको छोड़ दो। यदि इम दृश्यका आश्रय लेते हो तो चित्तयुक्त होकर बन्धनमें पड़ते हो, और यदि इस दृश्यका सम्यक् त्याग करते हो तो चित्तशून्य होकर मोक्षके भागी बनते हो । न मै हूँ, न जगत् है - इस प्रकार चिन्तन करते हुए तुम पर्वतके समान अचल होकर रहो। आत्मा और जगत्‌के मध्य, द्रष्टा और दृश्य-इन दोनों अवस्थाओंके बीच अपनेको सर्वदा दर्शनस्वरूप आत्मा ही समझते रहो। आस्वादनके पदार्थ तथा आस्वादनकर्तासे भिन्न तथा इन दोनोंके मध्यमें अवस्थित केवल आस्वादनका ध्यान करते हुए परमात्ममय हो जाओ । बीच-बीचमे निरालम्ब-अवस्थाका अवलम्बन कर स्थिर हो जाओ । रज्जुसे बँधे हुए तो मुक्त हो जाते हैं, परंतु तृष्णासे बँधे हुए जीव किसीके द्वारा भी मुक्त नहीं किये जा सकते । अतएव निदाघ ! तुम सङ्कल्प को छोड़ते हुए तृष्णाका त्याग करो । अभावशून्यताविषयी बर्छीके द्वारा इम अद्भावमयी, स्वभावत उत्पन्न हुई पापिनी तृष्णाको काटकर समस्त प्राणियोंको उत्पन्न होनेवाले भयसे अभय होकर सुन्दर परमार्थलोकमें विचरण करो । मे इन पदार्थोंका हूँ और ये मेरे जीवन हैं, इनके बिना मैं कुछ नहीं हूँ और न ये मेरे बिना कुछ हैं-अन्त करणके इस निश्चयका त्याग करके तथा मनसे विचारकर 'मे पदार्थोंका नहीं हूँ तथा पदार्थ मेरे नहीं ह'-ऐसी भावना करो । शान्तचित्तसे विचार- पूर्वक कर्मोंको महज भावसे करते हुए जो वासनाका त्याग है, ब्रह्मन् ! वही ध्येय कहा गया हे ॥ ३३-४३ ॥

'समता रखनेवाली बुद्धिसे जो वासनाका सर्वथा क्षय करके ममतारहित हो जाता है, उसीसे शरीर-बन्धन छोड़ा जाता है। ऐसा वासनाक्षय अवश्यकर्त्तव्य है । जो अहङ्कारमयी वासनाको सहजमें ही छोड़कर ध्येय वस्तुका सम्यक् त्याग करके स्थित होता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सङ्कल्परूपी वासनाका

मूलसहित त्याग करके शान्तिको प्राप्त होता है, उसीका वह त्याग जानने योग्य हे। और उसीको मुक्त एव ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ जानो। ये ही दोनो ब्रह्मत्वको प्राप्त होते हैं, ये ही दो ससारतापसे मुक्त हैं। शम दमसम्पन्न सन्यासो और योगी, हे मुनीश्वर ! यथासमय आ पड़नेवाले सुखों और दु.खोंमें रत नहीं होते । जिसकी अन्तर्दृष्टिमें इच्छा-अनिच्छा दोनो ही नहीं ह तथा जो सुषुप्तके समान आचरण करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो वासनाशून्य है, वह हर्ष, अमर्ष, भय, क्रोध, काम और कार्पण्यदृष्टिमे न प्रसन्न होता है, न दुखी होता है । जो तृष्णा बाह्य विषयोंकी वासनासे उत्पन्न होती है, वह बन्धनकारक होती है, और जो तृष्णा सब प्रकारके विषयोंकी वासनासे मुक्त होती है, वह मोक्षकारक होती है। 'मुझे अमूक वस्तु प्राप्त हो'-इस प्रकारकी प्रार्थनासे युक्त इच्छा दु.ख, जन्म और भय प्रदान करनेवाली होती है । उसे दृढ़ बन्धनस्वरूप जानो । महात्मालोग सत् और असत्रूप सभी पदार्थोंकी इच्छाका सर्वदा एव सम्यक् त्याग करके परम उदार पदको प्राप्त होते हैं। बन्धकी आस्था (बन्धनकी सत्तामें विश्वास) तथा मोक्षकी आस्था एव सुख-दुःख-स्वरूपवाली सत् और असत्की आस्थाका सर्वथा त्याग करके तुम प्रशान्त महासागरकी भाँति स्थिर हो जाओ ॥ ४४-५३ ॥

'महात्मन् ! पुरुषको चार प्रकारके निश्चय होते हैं। 'पैरसे लेकर सिरतक मेरी सृष्टि माता पिताके द्वारा हुई है' - यह पहला निश्चय है । ब्रह्मन् बन्धनमे दुःख देखकर 'मै सब प्रकारके सासारिक भारोंसे परे बालके अग्रभागसे भी सूक्ष्म आत्मा हूँ'-इस प्रकारका दूसरा निश्चय सतजनोंको मुक्ति प्रदानके लिये होता है । विप्रवर ! तीसरा निश्चय यह है कि 'मै समस्त जगत्‌के पदार्थोंका आत्मा हूँ, सर्वस्वरूप ओर अक्षय हूँ।' यह निश्चय मोक्षका कारण बनता हे । 'मै अथवा जगत् सत्र आकाशवत् शून्य है'-इस प्रकारका चौथा निश्चय मोक्षसिद्धि प्रदान करता है। इनमेंसे पहला निश्चय बन्धनमे डालनेवाली तृष्णासे युक्त होता है। शेष तीनो निश्चय स्वच्छ, शुद्ध तृष्णासे युक्त होते हैं और इन त्रिविध निश्चयोंवाले पुरुष जीवन्मुक्त तथा आत्मतत्त्वमे विलास करनेवाले होते हैं । परम बुद्धिमान् ! सब कुछ मे ही हूँ-इस प्रकारका जो निश्चय है, उसको ग्रहण करके बुद्धि पुनः विषादको प्राप्त नहीं होती ॥ ५४-६० ॥

'शून्य ही प्रकृति, माया, ब्रह्मज्ञान, शिव, पुरुष, ईशान तथा नित्य आत्माके नामसे पुकारा जाता है । परमात्ममयी अद्वैतशक्ति ही द्वैत एव अद्वैतसे उत्पन्न हुए पदार्थोंसे जगत्‌के निर्माणकी लीला करकेविकसित होती है। जो समस्त प्रपञ्चसे परे आत्मपदका आश्रय लेकर एक परिपूर्ण चिन्मय स्थितिमें रहकर न उद्वेग करते हैं न सन्तुष्ट होते हैं, संसारमें वे शोकको

६२२ महोपनिषद् [ अध्याय ६

६२२ * महोपनिषद् * [ अध्याय ६

[बायाँ स्तम्भ]

नहीं प्राप्त होते । जो नित्य प्राप्त कर्मको करता है, शत्रु मित्रको समान दृष्टिसे देखता है तथा इच्छा और अनिच्छासे मुक्त है, न शोक करता है न किसी वस्तुकी इच्छा करता है, सबसे प्रिय बोलता है, पूछे जानेपर मृदु भाषण करता है, और प्राणियोके आशयको जानता है, वह संसारमे शोकको नहीं प्राप्त होता । ध्येय वस्तुके त्यागसे विलसित होनेवाली पूर्व दृष्टिका अवलम्बनकर, संसार-तापसे रहित एव आत्मस्थ होकर जीवन्मुक्तकी भाँति जगत्में विचरण करो । सारी आशाओको हृदयसे त्यागकर, वीतराग एव वासनाशून्य होकर, बाहरसे समस्त जागतिक व्यवहारोंको भलीभाँति करते हुए ससारमे ताप-रहित होकर विचरण करो । बाहरसे कृत्रिम क्रोधका नाट्य करते हुए तथा हृदयसे क्रोधशून्य, बाहरसे कर्ता तथा हृदयसे अकर्ता बनकर शुद्धचित्तसे लोकमे विचरण करो । अहङ्कारको छोड़कर, शान्तचित्त होकर, कलङ्क-कालिमासे सर्वथा मुक्त हो, आकाश-सा स्वच्छ जीवन ले शुद्ध मनसे लोकमें विचरण करो ॥ ६१–६९ ॥

'उदार एव श्रेष्ठ आचरणसे युक्त, समस्त सदाचारोंका अनुगमन करता हुआ, भीतरसे अनासक्त होकर बाहरसे यत्नशील-सा रहे । अन्तःकरणमें वैराग्यवान् होकर बाहरसे आशान्वित व्यवहार करे । यह मेरा बन्धु है और वह नहीं है, यह तुच्छ बुद्धिवालोंकी बात है । उदार चरित्रवालोंके लिये तो सारा संसार ही अपना कुटुम्ब होता है। जो भाव और अभावसे मुक्त है, जरा मरणसे वर्जित है, जहाँ सारे सङ्कल्प पूर्णतः शान्त हो जाते हैं, ऐसे रागरहित एव सुरम्य पदका आश्रय लो । यह स्वच्छ, निष्काम, दोषविहीन ब्राह्मी स्थिति है । इसको ग्रहण करके विहार करता हुआ पुरुष सङ्कटकालमें मोहको नहीं प्राप्त होता । वैराग्यसे अथवा शास्त्रज्ञानसे तथा महत्त्वादि गुणोंके द्वारा जो सङ्कल्पका नाश किया जाता है, उससे मन स्वय ही उन्नत अवस्थाको प्राप्त होता है । निराशाके वशीभूत हुआ

[दायाँ स्तम्भ]

मन वैराग्यके द्वारा पूर्णताको प्राप्त होता है । वही आशायुक्त होनेपर शरद्‌मे स्वच्छ सरोवरके समान रागको प्राप्त होता है । उसी भोगसे विरक्त मनको पुनः-पुनः प्रतिदिन व्यापारोंम डालते हुए प्राज्ञ पुरुषको लज्जा क्यों नहीं आती । चित् और विषयके योग को बन्धन कहते हैं । उस योगसे मुक्त होना ही मुक्ति कहलाता है । निश्चयपूर्वक विषयविहीन चित् ही आत्मा है, यह समस्त वेदान्त सिद्धान्तका सार है । इस निश्चयको ग्रहणकर प्रदीप्त अन्तःकरणसे स्वयं ही अपने आपको देखो । , इससे आनन्दपदकी प्राप्ति होगी । मै चित् हूँ । ये लोक चित् है, दिशाएँ चित् हैं । ये जीवमात्र चित् ह । दृश्य और दर्शनसे मुक्त होकर, केवल स्वच्छ रूपवाला साक्षी चिदात्मा निराभास और नित्य उदित होकर द्रष्टा बन रहा हूँ । विषयोसे मुक्त, पूर्ण ज्योतिःस्वरूप, समस्त संवेदनसे पूर्णतया मुक्त चित्स्वरूप तथा महान् मवित् मात्र मै हूँ । मुनीश्वर ! सारे सङ्कल्पोंको पूर्णतः शान्त करके ममत्व एषणाओका परित्यागकर निर्विकल्पपदमें जाकर आत्मस्थ हो जाओ ॥ ७०–८२ ॥

'जो ब्राह्मण इस महोपनिषदका नित्य अध्ययन करता है, वह अश्रोत्रिय हो तो श्रोत्रिय हो जाता है । उपनीत न हो तो उपनीत हो जाता है । वह अग्निपूत होता है, वह वायूपूत होता है, वह सोमपूत होता है, सत्यपूत होता है । वह सर्वथा पवित्र हो जाता है। वह सब देवताओका परिचित हो जाता है । उसको सारे तीर्थस्नानोका फल प्राप्त होता है । उसे सब देवताओके ध्यानका फल मिल जाता है । वह सब यज्ञोंका अनुष्ठान कर लेता है । सहस्रों गायत्रीके जपका फल उसे प्राप्त होता है । सहस्रों इतिहास-पुराणके पाठका फल उसे मिल जाता है । दस हजार प्रणवजपका फल उसे मिलता है। जहाँतक उसकी दृष्टि जाती है, वह पंक्तिको पवित्र करता है। सात पहले और सात आगेकी पीढियोंको पवित्र करता है। यों भगवान् हिरण्यगर्भ—ब्रह्माजीने कहा । इसका जप करनेसे अमृतत्वकी प्राप्ति होती है, यह उपनिषद्—रहस्य है ।'


॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥

॥ सामवेदीय महोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ।

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ शुक्लयजुर्वेदीय मुक्तिकोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्ति. !!! प्रथम अध्याय श्रीराम और हनुमान्‌का संवाद, वेदान्तकी महिमा, मुक्तिके भेद, १०८ उपनिषदोंकी नामावली तथा वेदोंके अनुसार विभाग; उपनिषदोंके पाठका माहात्म्य तथा उनके श्रवणके अधिकारी ॐश्रीरामचन्द्रजी अयोध्यापुरीमे रमणीय रत्नमण्डपके बीच सीता, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न आदिसे समन्वित होकर रत्नसिंहासनपर आसीन थे । सनक-सनन्दनादि मुनिगण, वशिष्ठ आदि गुरुजन तथा शुकादि अन्यान्य भागवत रात- दिन उनका स्तवन करते रहते थे । सर्वान्तर्यामी एव निर्विकार श्रीरामचन्द्रजी एक समय अपने स्वरूप-ध्यानमें रत होकर समाधिस्थ हो रहे थे । उनकी समाधि टूटनेपर श्री- हनुमान्‌जीने भक्तिपूर्वक सुननेकी इच्छासे स्तवन करते हुए श्रीरामचन्द्रजीसे पूछा—'रामजी ! आप परमात्मा हैं, सत्-चित् और आनन्दस्वरूप परब्रह्मके अवतार हैं। रघुवर ! इस अवसरपर मैं आपको बारवार प्रणाम करता हूँ । श्रीरामजी, मैं आपके यथार्थ स्वरूपको जानना चाहता हूँ, जो मुक्ति प्रदान करनेवाला है, जिससे मैं अनायास—सहजमें ही इस संसार-बन्धनसे छूट जाऊँ । रामजी ! कृपा करके मुझसे उसका वर्णन कीजिये, जिससे मैं मुक्त हो जाऊँ' ॥ १-६ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'महाबलशाली हनूमान् ! तुमने अच्छा प्रश्न किया । मैं तत्त्वकी बात कहता हूँ, सुनो । मेरा स्वरूप वेदान्तमें अच्छी प्रकारसे वर्णित है, अतएव तुम वेदान्त- शास्त्रका आश्रय लो।' श्रीहनुमान्‌जीने पूछा—'रघुवंशियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामजी ! वेदान्त किसे कहते हैं, और उसकी स्थिति कहाँ है—मुझे बतलायें।' श्रीरामजीने कहा—'हनूमान्‌जी ! सुनो, मैं तुम्हें अविलम्ब वेदान्तकी स्थिति बतलाऊँगा । मुझ विष्णुके निःश्वाससे सुविस्तृत चारों वेद उत्पन्न हुए । तिलोंमें तेलकी भाँति वेदोंमें वेदान्त सुप्रतिष्ठित है।' श्रीहनुमान्- जीने पूछा—'श्रीरामजी ! वेद कितने प्रकारके हैं, और राघव ! उनकी शाखाएँ कितनी हैं तथा उनमे उपनिषद् कौन-कौन-से हैं, यह कृपा करके तत्त्वतः-यथार्थरूपसे समझाइये' ॥७-१०॥ श्रीरामजीने कहा-वेद चार कहे गये हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद । उन चारोंकी अनेकों शाखाएँ हैं, और उन शाखाओंके उपनिषद् भी अनेकों हैं । ऋग्वेदकी इक्कीस शाखाएँ हैं । पवनतनय ! यजुर्वेदकी एक सौ नौ शाखाएँ हैं। और शत्रुतापन ! सामवेदसे सहस्र शाखाएँ निकली हैं । कपीश्वर ! अथर्ववेदकी शाखाओंके पचास भेद हैं । एक-एक शाखाकी एक-एक उपनिषद् मानी गयी है । जो व्यक्ति उन उपनिषदोंके एक भी मन्त्रका भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह व्यक्ति मुनियोंके लिये भी दुर्लभ मेरी सायुज्य-मुक्ति प्राप्त करता है॥ ११-१४ ॥ हनूमान्‌जीने कहा—श्रीरामजी ! कोई-कोई मुनिश्रेष्ठ कहते हैं कि मुक्ति एक ही प्रकारकी होती है । और कुछ मुनिगण कहते हैं कि तुम्हारा नामस्मरण करनेसे मुक्ति होती है तथा काशीमे मरनेवालेको भगवान् शङ्कर तारक-मन्त्रका उपदेश देते हैं, जिससे प्राणी मुक्त हो जाता है। दूसरे मुनियोंका कथन है कि सांख्ययोगसे मुक्ति होती है, और कुछ मुनियोंके मतसे भक्तियोग ही मुक्तिका कारण है। अन्य महर्षियोंके कथनानुसार वेदान्त वाक्योंके अर्थका विचार करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है । और किसी-किसीके मतमें सालोक्य, सायुज्य, सामीप्य और कैवल्यरूपमे मुक्ति चार प्रकारकी कही गयी है' ॥ १५-१६ ॥ श्रीरामने कहा—'कपिवर ! कैवल्य-मुक्ति तो एक ही प्रकारकी है, वह परमार्थरूप है। इसके अतिरिक्त भक्तिपूर्वक मेरा नाम-स्मरण करते रहनेसे दुराचारमें लगा हुआ मनुष्य भी सालोक्यमुक्तिको प्राप्त होता है, वहाँसे वह अन्य

६२४ मुक्तिकोपनिषद् [ अध्याय १

६२४ * मुक्तिकोपनिषद् * [ अध्याय १ लोकोंमे नहीं जाता । जिसकी काशीक्षेत्रमें ब्रह्मनाल नामक प्रदेशके अन्तर्गत मृत्यु होती है, वह मेरे तारक-मन्त्रको प्राप्त करता है, और उसे वह मुक्ति मिलती है, जिससे उसे आवागमनमें नहीं आना पड़ता । काशीक्षेत्रमे चाहे कहीं भी मृत्यु हो, शङ्करजी प्राणीके दाहिने कानमे मेरे तारक-मन्त्रका उपदेश करते हैं, जिससे उसके सारे पापोंके समूह झड़ जाते हैं, तथा वह मेरे सारूप्यको—समान रूपको प्राप्त हो जाता है। वही सालोक्य-सारूप्य मुक्ति कहलाती है। जो द्विज सदाचार-रत होकर नित्य एकमात्र मेरा ध्यान करता है और मुझे सर्वात्मस्वरूप चिन्तन करता है, वह मेरे सामीप्यको प्राप्त होता है—सदा मेरे समीप निवास करता है। वही सालोक्य- सारूप्य सामीप्य मुक्ति कहलाती है। जब गुरुके द्वारा उपदिष्ट मार्गसे मेरे अव्यय, निर्विकार स्वरूपका ध्यान करता है, तब वह द्विज भ्रमरकीटके समान सम्यक् रूपसे मेरे सायुज्यको प्राप्त करता है। वही कल्याणमयी, ब्रह्मानन्दको प्रदान करने- वाली सायुज्य-मुक्ति है। मेरी उपासनासे जो चार प्रकारकी मुक्तियाँ होती हैं—सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य एव कैवल्य, उनमें यह कैवल्यमुक्ति किस उपायका अवलम्बन करनेसे सिद्ध होती है, सो सुनो ॥ १७-२३ ॥ अकेली माण्डूक्योपनिषद् मुमुक्षुजनोंको मुक्ति प्रदान करनेमे समर्थ है। यदि उससे भी ज्ञानमे परिपक्वता न आये तो दस उपनिषदोंका पाठ करो। उससे ज्ञान प्राप्त करके शीघ्र ही मुझे अद्वैत धाम अर्थात् तेजके रूपमें प्राप्त करोगे। अञ्जनीकुमार ! यदि उससे भी ज्ञानकी दृढता न हो तो बत्तीस उपनिषदोंका सम्यक्रूपसे अभ्यास करके संसारसे निवृत्त हो जाओ। यदि विदेहमुक्त—शरीर छोड़नेके बाद मुक्त होना चाहते हो तो एक सौ आठ उपनिषदोंका पाठ करो। उन उपनिषदोंके नाम, क्रम और शान्तिपाठ यथार्थतः कहता हूँ, सुनो। ईश^१, केन^२, कठ^३, प्रश्न^४, मुण्डैक^५, माण्डूक्य^६, तैत्तिरीयं^७, ऐतयं^८, छान्दोग्यं^९, बृहदारण्यकं^१०, ब्रह्म^११, कैवल्य^१२, जाबाल^१३, श्वेताश्वतर^१४, हंस^१५, आरुणिक^१६, गर्भ^१७, नारायण^१८, परमहंस^१९, अमृतबिन्दु^२०, अमृतनाद^२१, अथर्वशिरस्^२२, अथर्वशिखा^२३, मैत्रायणी^२४, कौषीतकिब्राह्मण^२५, बृहज्जाबाल^२६, नृसिंहतापनीय^२७, कालाग्निरुद्र^२८, मैत्रेयी^२९, सुबाल^३०, क्षुरिका^३१, मन्त्रिका^३२, सर्वसार^३३, निरालम्ब^३४, शुकरहस्य^३५, वज्रसूचिका^३६, तेजोबिन्दु^३७, नादबिन्दु^३८, ध्यानबिन्दु^३९, ब्रह्मविद्या^४०, योगतत्त्व^४१, आत्मप्रबोध^४२, नारद- परिव्राजक^४३, त्रिशिखिबाह्मण^४४, सीता^४५, योगचूडामणि^४६, निर्वाण^४७, मण्डलब्राह्मण^४८, दक्षिणामूर्ति^४९, शरभ^५०, स्कन्द^५१, त्रिपाद्विभूति- महानारायण^५२, अद्वयतारक^५३, रामरहस्य^५४, रामतापनीय^५५, वासुदेव^५६, मुद्गल^५७, शाण्डिल्य^५८, पैङ्गल^५९, भिक्षुक^६०, महत्^६१, शारीरक^६२, योगशिखा^६३, तुरीयातीत^६४, संन्यास^६५, परमहंसपरिव्राजक^६६, अक्षमाला^६७, अव्यक्त^६८, एकाक्षर^६९, अन्नपूर्णा^७०, सूर्य^७१, अक्षि^७२, अध्यात्म^७३, कुण्डिका^७४, सावित्री^७५, आत्मा^७६, पाशुपत^७७, परब्रह्म^७८, अवधूत^७९, त्रिपुरातापनीय^८०, देवी^८१, त्रिपुरा^८२, कठरुद्र^८३, भावना^८४, रुद्रहृदय^८५, योगकुण्डली^८६, भस्मजाबाल^८७, रुद्राक्षजावाल^८८, गणपति^८९, जाबालदर्शन^९०, तारसार^९१, महावाक्य^९२, पञ्चब्रह्म^९३, प्राणाग्निहोत्र^९४, गोपालतापनीय^९५, कृष्ण^९६, याज्ञवल्क्य^९७, वराह^९८, शाट्यायनीय^९९, हयग्रीव^१००, दत्तात्रेय^१०१, गरुड^१०२, कलिसन्तरण^१०३, जाबालि^१०४, सौभाग्यलक्ष्मी^१०५, सरस्वतीतहस्य^१०६, बह्वृच^१०७ और मुक्तिकोपनिषद्^१०८ ॥ २४-३६ ॥ ये एक सौ आठ उपनिषदें मनुष्यके आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक—तीनों तापोंका नाश करती हैं। इनके पाठ और स्वाध्यायसे ज्ञान और वैराग्यकी प्राप्ति होती है तथा लोक वासना, शास्त्र-वासना एव देह-वासनारूप त्रिविध वासनाओंका नाश होता है। पूर्व और पश्चात् विहित प्रत्येक उपनिषद्की शान्तिका पाठ करते हुए, वेदविद्याविशारद, व्रतपरायण, स्नान किये हुए, स्वय आत्मतत्त्वोपदेष्टाके मुखसे— ग्रहण अर्थात् श्रवण करके जो द्विजश्रेष्ठ अष्टोत्तरशत उपनिषदोंका पाठ करते हैं, वे जबतक प्रारब्धकर्मोंका नाश नहीं हो जाता, तबतक जीवन्मुक्त बने रहते हैं। उसके पश्चात् कालक्रमसे जब प्रारब्धका नाश हो जाता है, तब वे मेरी विदेह-मुक्तिको प्राप्त करते हैं। समस्त उपनिषदोंके बीच एक सौ आठ उपनिषदें मारस्वरूप हैं। इनका एक बार भी श्रवण करनेसे सारे पापोंके समूह नष्ट हो जाते हैं। पवनकुमार ! तुम मेरे शिष्य हो, अतएव मैने तुम्हारे लिये इस शास्त्रका वर्णन किया है । मेरे द्वारा वर्णित यह अष्टोत्तरशत उपनिषद्रूप शास्त्र अत्यन्त गोपनीय है । ज्ञानसे, अज्ञानसे अथवा प्रसङ्गवश भी इनका पाठ करनेसे संसाररूप बन्धनसे मुक्ति मिल जाती है । जो तुमसे राज्य अथवा धन माँगे, उसे उसकी कामना-पूर्तिके लिये राज्य अथवा धन दे सकते हो; परन्तु इन एक सौ आठ उपनिषदोंको जिस-किसीको देना ठीक नहीं। निश्चय- पूर्वक जो नास्तिक हैं, कृतघ्न हैं, दुराचारी हैं, मेरी भक्तिसे मुँह मोड़े हुए हैं तथा शास्त्ररूप गड्ढोंमें गिरकर मोहित हो रहे हैं अर्थात् जो केवल शास्त्र-चर्चा में ही लगे हुए हैं, उन्हें तो कभी नहीं देना चाहिये । मारुति ! सेवापरायण शिष्यको, अनुकूल (आज्ञाकारी) पुत्रको अथवा जो कोई भी मेरा भक्त हो, अच्छे कुलमे उत्पन्न हो, सुशील और सद्बुद्धिसम्पन्न हो, उसे भलीभाँति परीक्षा करके अष्टोत्तरशत उपनिषदों-

अध्याय १ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ६२५

अध्याय १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६२५ को प्रदान करना चाहिये । इस प्रकारका जो व्यक्ति इन उपनिषदोंको पढता या सुनता है, वह मुझको प्राप्त होता है—इसमें कुछ भी सदेह नहीं है ॥ ४७-४७ ॥ यही बात ऋचामें भी कही गयी है । कहते हैं, वेद-विद्या— उपनिषद् ब्राह्मणके पास गयी और बोली—'मेरी रक्षा करो, मैं तुम्हारी निधि हूँ । याद रहे—मुझे निन्दकों, मिथ्याचारी और दुष्ट प्रकृतिवालोंको मत सुनाना, कभी मत सुनाना, तभी मैं वीर्यवती—सामर्थ्ययुक्त अथवा सफल होऊँगी ।' जिसे गुरु श्रुतशील (शास्त्राभ्यासी), प्रमादरहित, मेधावी और ब्रह्मचर्यसे युक्त समझे, उसीके समीप आनेपर उसकी सम्यक् परीक्षा करके इस आत्मविषयक वैष्णवी विद्याको प्रदान करे ॥ ४८-४९ ॥ पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीसे श्रीहनूमान्‌जीने पूछा—भगवन् ! ऋग्वेदादिके अनुसार उपनिषदोंका अलग अलग विभाग करके शान्ति-मन्त्रोंको मुझपर अनुग्रह करके कहिये ॥ ५० ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा—ऐतरेयं¹, कौषीतकिब्राह्मण², नाद-³ बिन्दु⁴, आत्मप्रबोध⁵, निर्वाणं⁶, मुद्गलं⁷, अक्षमालिका⁸, त्रिपुरा⁹, सौर्भाग्य-¹⁰ लक्ष्मी और बह्वृच—ये दस उपनिषद् ऋग्वेदीय हैं और इनका शान्ति-मन्त्र है 'वाङ् मे मनसि' इत्यादि ॥ ५१ ॥ ईशावास्य¹, बृहदारण्यक², जाबाल³, हंसैं⁴, परमहंस⁵, सुर्बाल⁶, मन्त्रिका⁷, निरालम्ब⁸, त्रिशिखिब्राह्मण⁹, मण्डलब्राह्मण¹⁰, अद्वयतारक¹¹, पैङ्गल¹², भिक्षुक¹³, तुरीयातीत¹⁴, अध्यात्म¹⁵, तारसार¹⁶, याज्ञवल्क्य¹⁷, शाट्यायनी¹⁸ और मुक्तिंका¹⁹—ये शुक्लयजुर्वेदके उन्नीस उपनिषद् हैं, इनका शान्तिमन्त्र है 'पूर्णमद पूर्णमिदम' इत्यादि ॥५२॥ कठवल्ली¹, तैत्तिरीय², ब्रह्म³, कैवल्यै⁴, श्वेताश्वेतर⁵, र्गभ⁶, नारायण⁷, अमृतविन्दु⁸, अमृतनाद⁹, कालाग्निरुद्र¹⁰, क्षुरिका¹¹, सर्वसार¹², शुकरहस्य¹³, तेजोविन्दु¹⁴, ध्यानविन्दु¹⁵, ब्रह्मविद्या¹⁶, योगतत्त्व¹⁷, दक्षिणामूर्ति¹⁸, स्कन्द¹⁹, शारीरक²⁰, योगशिखा²¹, एकाक्षर²², अक्षि²³, अवधूत²⁴, कठरुद्र²⁵, रुद्रहृदय²⁶, योगकुण्डली²⁷, पञ्चब्रह्म²⁸, प्राणाग्निहोत्र²⁹, वराह³⁰, कलिसंतरण³¹ और सरस्वती-³² रहस्य—ये कृष्णयजुर्वेदके बत्तीस उपनिषद् हैं, इनका शान्तिमन्त्र है—'सह नाववतु सह नौ भुनक्तु' इत्यादि ॥५३॥ केन¹, छान्दोग्य², आरुणिक³, मैत्रायणी⁴, मैत्रेयी⁵, वज्रसूचिका⁶, योगचूडामणि⁷, वासुदेवै⁸, महत्⁹, सन्यास¹⁰, अव्यक्त¹¹, कुण्डिका¹², सावित्री¹³, रुद्राक्षजाबाल¹⁴, जाबालदर्शन¹⁵ और जाबालि—¹⁶ ये सामवेदके सोलह उपनिषद् हैं, इनका शान्तिमन्त्र है 'आप्यायन्तु ममाङ्गानि०' इत्यादि ॥ ५४ ॥ प्रश्न¹, मुण्डकै², माण्डूक्य³, अथर्वाङ्गिरस्⁴, अथर्वशिखा⁵, बृहज्जाबाल⁶, नृसिंहतापनीय⁷, नारदंपरिव्राजक⁸, सीतों⁹, शरभ¹⁰, त्रिपाद्विभूतिमहानारायण¹¹, रामरहस्य¹², रामतापनीय¹³, शाण्डिल्य¹⁴, परमहंसपरिव्राजक¹⁵, अन्नपूर्णा¹⁶, सूर्य¹⁷, आत्मा¹⁸, पाशुपत¹⁹, परब्रह्म²⁰, त्रिपुरातपनीय²¹, देवी²², भावना²³, भस्मजाबाल²⁴, गणपति²⁵, महावाक्य²⁶, गोपालतापनीय²⁷, कृष्ण²⁸, हयग्रीव²⁹, दत्तात्रेय³⁰ और गरुड—³¹ये अथर्ववेदके इकतीस उपनिषद् हैं, इनका शान्तिमन्त्र है 'भद्रं कर्णेभि शृणुयाम०' इत्यादि ॥ ५५ ॥ जो लोग मुक्तिके अभिलाषी हैं, जो नित्यानित्यवस्तु- विवेक, इस लोक एव परलोकके भोगोंसे वैराग्य, शम दम आदि षट्सम्पत्ति तथा मोक्षाभिलाषरूप साधनचतुष्टयसे सम्पन्न हैं, वे श्रद्धावान् पुरुष सत्कुलमें उत्पन्न, श्रोत्रिय ( वेदज्ञान- सम्पन्न ), शास्त्रानुरागी, गुणवान्, सरलहृदय, समस्त प्राणियोंकी भलाईमें रत तथा दयाके समुद्र सद्गुरुके निकट विधिपूर्वक भेंट लेकर जाते हैं और उनसे १०८ उपनिषदोंको विधिपूर्वक पढकर निरन्तर श्रवण मनन-निदिध्यासनका अभ्यास करते हैं। फिर प्रारब्धका क्षय होनेपर जब उनके स्थूल, सूक्ष्म तथा आतिवाहिक—तीनों शरीर नष्ट हो जाते हैं, तब वे उपाधिमुक्त घटाकाशके समान परिपूर्णताको प्राप्त करते है, अर्थात् ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। यही विदेहमुक्ति कहलाती है, इसीको कैवल्यमुक्ति भी कहते हैं। अतएव ब्रह्मलोकमें रहनेवाले भी ब्रह्माजीके मुखसे वेदान्तका श्रवण मनन निदिध्यासन करके उन्हींके साथ कैवल्यको प्राप्त करते है। अतः सबके लिये केवल ज्ञानद्वारा ही कैवल्यमुक्ति कही गयी है—कर्मयोग, सांख्य- योग तथा उपासनादिके द्वारा नहीं। यह उपनिषद् है ॥५६॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥ उ० अं० ७९—

द्वितीय अध्याय

ॐ द्वितीय अध्याय जीवन्मुक्ति एवं विदेहमुक्तिका स्वरूप, उनके होनेमें प्रमाण, उनकी सिद्धिका उपाय तथा प्रयोजन तत्पश्चात् श्रीहनुमान्जीने श्रीरामजीसे पूछा- 'भगवन् ! जीवन्मुक्ति क्या है, विदेह-मुक्ति क्या है और इनके होनेमें प्रमाण क्या है ? तथा उनकी सिद्धि कैसे होती है और उस सिद्धिका प्रयोजन क्या है ?' ॥ १ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा-'हनुमान् ! जीवको 'मे भोक्ता हूँ, मे कर्ता हूँ, मे सुखी हूँ और मे दुखी हूँ' - इत्यादि जो ज्ञान होता है, वह चित्तका धर्म है। यही ज्ञान क्लेशरूप होनेके कारण उसके लिये बन्धनका कारण हो जाता है। इस प्रकार- के ज्ञानका निरोध ही जीवन्मुक्ति है। घटरूप उपाधिसे मुक्त घटाकाशकी भाँति प्रारब्धरूप उपाधिके नष्ट होनेपर यह जीव विदेहमुक्त हो जाता है। जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिके होनेमे अक्षोत्तरशत-उपनिषद् ही प्रमाण हैं। कर्तापन और भोक्तापन आदि दु खोंकी निवृत्तिके द्वारा नित्यानन्दकी प्राप्ति ही इनका प्रयोजन है। वह आनन्द प्राप्ति पुरुषके प्रयत्नसे-पुरुषार्थसे सिद्ध होती है। जैसे पुत्रेष्टि यज्ञके द्वारा पुत्रकी, वाणिज्य- व्यापारके द्वारा धनकी एव ज्योतिष्टोम यज्ञके द्वारा स्वर्गकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार पुरुषके प्रयत्नमे होनेवाले वेदान्त- के श्रवण मनन और निदिध्यासनसे उत्पन्न हुई समाधिसे जीवन्मुक्ति आदिकी सिद्धि होती है और वह सारी वासनाओं- के नाश होनेपर प्राप्त होती है ॥ २ ॥ "पुरुषका प्रयत्न या पुरुषार्थ दो प्रकारका होता है- शास्त्रविरुद्ध और शास्त्रानुकूल । उनमे शास्त्रविरुद्ध पुरुषार्थ अनर्थका कारण होता है और शास्त्रानुकूल पुरुषार्थ परमार्थ- को सिद्ध करनेवाला होता है। लोक वासना, शास्त्र-वासना तथा देह वासनाके कारण प्राणीको यथार्थज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती । अर्थात् ये तीन प्रकारकी वासनाएँ ही ज्ञानकी प्राप्तिमें बाधक हैं। वासनाएँ पुनः दो प्रकारकी होती हैं- शुभ और अशुभ । शुभ वासनाओंके द्वारा, हनूमान् ! यदि तुम ज्ञानका अनुशीलन करते हो तो क्रमशः उसके द्वारा मेरे पदको प्राप्त करोगे, और यदि अशुभ भावोंसे युक्त रहते हो तो वे तुम्हे महान् सकटमें डाल देंगे । कपीश्वर ! पूर्वके सस्कारोंको तुम्हें यत्नपूर्वक जीतना चाहिये । शुभाशुभ मार्गोसे बहती हुई वासनारूपी नदीको अपने पुरुषार्थके द्वारा शुभ- मार्गमें लगाना चाहिये । अशुभ मागोंमें जाते हुए वासना- प्रवाहको शुभ मागोंमें उतारना चाहिये, क्योंकि मनका यह स्वभाव है कि अशुभसे हटानेपर वह शुभकी ओर जाता है और शुभसे हटाये जानेपर अशुभमें प्रवृत्त होता है। मनुष्यको चाहिये कि पुरुषार्थके द्वारा यत्नपूर्वक चित्तरूपी बालकको फुसलाकर - थपथपाकर शुभमे ही लगाये। अभ्यास- के द्वारा जब तुम्हारी दोनो प्रकारकी वासनाएँ जल्दी ही क्षीण होने लगे, तब शत्रुओका मर्दन करनेवाले हनूमान् ! तुम जान लेना कि अभ्यास परिपक्वताको प्राप्त हो गया। पवनकुमार ! जहाँ वासनाके अस्तित्त्वका संदेह भी हो, वहाँ शुभ वासनाओं- में ही बारवार चित्तको लगाये । शुभ वासनाओंकी वृद्धि होनेपर कभी दोष नही उत्पन्न हो सकता ॥ ३-१० ॥ "महामति हनूमान् ! वासनाक्षय, विज्ञान और मनोनाश- इन तीनोंका एक साथ चिरकालतक अभ्यास करनेपर ये फल प्रदान करते ह। जबतक इन तीनोंका बारवार एक साथ अभ्यास न किया जाय, तबतक सैकड़ो वर्ष बीतनेपर भी कैवल्य पदकी प्राप्ति नहीं होती। यदि अलग-अलग इनका चिरकालतक भी खूब अभ्यास किया जाय तो, जिस प्रकार टुकड़े टुकड़े करके जपे हुए मन्त्र सिद्ध नहीं होते, उसी प्रकार इनमे सिद्धिकी प्राप्ति नहीं होती। यदि इन तीनोका चिरकालतक अभ्यास किया जाय तो हृदयकी दृढ ग्रन्थियाँ भी निःसन्देह उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे कमलकी नालको तोड़नेपर उसके रेशे टूट जाते है। जिस दृढती ससार-वासनाका सैकड़ों जन्मोंसे अभ्यास हो रहा है, वह चिरकालतक साधना किये बिना कदापि क्षीण नहीं होती । इसलिये, प्यारे हनूमान् ! पुरुषार्थके द्वारा प्रयत्न करते हुए विवेकपूर्वक भोगकी इच्छाओंको दूरसे ही नमस्कार करके इन तीनोका सम्यक्रूपसे अवलम्बन करो ॥ ११-१६ ॥ "वासनासे युक्त मनको ज्ञानियोंने बद्ध बतलाया है और जो मन वासनासे सम्यक्रूतया मुक्त हो गया है, वह मुक्त कहलाता है । महाकपि ! मनको वासनाविहीन स्थितिमें शीघ्र ले आओ। भलीभाँति विचार करनेसे और सत्यके अभ्याससे वासनाओंका नाश हो जाता है। वासनाओके नाशसे चित्त उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जैसे तेलके समाप्त हो जानेपर दीपक बुझ जाता है। वासनाओंका भलीभाँति त्याग

अध्याय २] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ६२७

अध्याय २] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६२७ करके मुझ चैतन्यस्वरूपमें जो निवात दीपशिखाके समान निश्चल होकर स्थित रहता है, वह मुझ सच्चिदानन्दस्वरूपको एकीभावसे प्राप्त होता है। समाधि अथवा कर्मानुष्ठान वह करे या न करे। जिसके हृदयमें वासनाका सर्वथा अभाव हो गया है, वही मुक्त है, वही उत्तमाशय है ॥ १७-२० ॥ "जिसके मनसे वासनाएँ दूर हो गयी हैं, उसे न नैष्कर्म्य- से—कर्मोंके त्यागसे मतलब है और न कर्मानुष्ठानसे । उसे समाधान अर्थात् षट्सम्पत्ति और जपकी भी आवश्यकता नहीं है। सारी वासनाओंका त्याग करके मनका मौन धारण करनेके अतिरिक्त कोई दूसरा परम पद नहीं है। किसी प्रकारकी प्रत्यक्ष वासना न होनेपर भी चक्षु आदि इन्द्रियाँ जो स्वतः अपने-अपने बाह्य विषयोंमें प्रवृत्त होती हैं, इसमें कोई-न-कोई सूक्ष्म वासना ही कारण है। अनायास सामने आये हुए दृश्य विषयोंमें जैसे चक्षु-इन्द्रियकी वारंवार प्रवृत्ति रागरहित ही होती है, उसी प्रकार धीर पुरुष कार्योंमें अनासक्तभावसे ही प्रवृत्त होते हैं। पवनतनय ! जो सत्ता- बुद्धिसे प्रकट होती है और उसीके अनुकूल होती है तथा जिसमें चित्तका उदय और लय भी होता है, मुनलोग उसी वृत्तिको वासनाके नामसे पुकारते हैं । चिर-परिचित पदार्थोंके अनन्य चिन्तनके द्वारा जो चित्तमें अत्यन्त चञ्चलता उत्पन्न हो जाती है, वही चित्त-चाञ्चल्य जन्म, जरा और मृत्युका एकमात्र कारण होता है। वासनाके कारण प्राणीमें स्पन्दन होता है और उस स्पन्दनसे पुनः वासनाकी उत्पत्ति होती है, इस प्रकार चित्तरूपी बीजमें अङ्कुर लगते रहते हैं ॥ २१–२६ ॥ "चित्तरूपी वृक्षके दो बीज हैं—प्राण स्पन्दन ( प्राणोंकी गति ) और वासना । इन दोनोंमेंसे एकके भी क्षीण होनेसे दोनों नष्ट हो जाते हैं। अनासक्त होकर व्यवहार करनेसे, संसार- का चिन्तन छोड़ देनेसे और शरीरकी विनश्वरताका दर्शन करते रहनेसे वासना उत्पन्न नहीं होती। और वासनाका भलीभाँति त्याग हो जानेपर चित्त अचित्तताको प्राप्त होता है, अर्थात् उसकी वासनात्मिका प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है। वासनाके नष्ट हो जानेपर जब मन मनन करना छोड़ देता है, तब मनके निराकृत होनेपर परम शान्तिप्रद विवेककी उत्पत्ति होती है। जबतक तुम्हारे अन्दर ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो जाती, जबतक तुम्हें परमपद अज्ञात है, तबतक गुरु तथा शास्त्र-प्रमाणके द्वारा निर्णीत मार्गका आचरण करो । तदनन्तर कषायोंका परिपाक होनेपर जब निश्चयपूर्वक तुम्हें तत्त्वका ज्ञान हो जाय, तब तुम्हें निश्चिन्त होकर समस्त शुभ वासनाओंका भी त्याग कर देना चाहिये ॥ २७-३१ ॥ "चित्तनाश दो प्रकारका होता है—सरूप और अरूप । जीवन्मुक्तका चित्तनाश सरूप होता है और विदेहमुक्तका अरूप होता है। अर्थात् जीवन्मुक्तका चित्त स्वरूपसे रहता तो है, पर वह अचित्त हुआ रहता है, विदेहमुक्त होनेपर उसका स्वरूपतः नाश हो जाता है। पवनसुत ! अब एकाग्र- चित्तसे मनोनाशके विषयमें सुनो। जब तुम्हारा मन चित्त- नाशकी स्थितिको प्राप्त हो जायगा अर्थात् उसकी अनुसंधानात्मिका वृत्ति शान्त हो जायगी, तब मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा प्रभृति गुणोंसे युक्त होकर वह परमशान्तिको प्राप्त कर लेगा—इसमें कोई संशय नहीं है। जीवन्मुक्तका मन आवागमनसे मुक्त हो जाता है, अतः उसका वह मनोनाश सरूप कहलाता है। विदेह-मुक्ति मिल जानेपर जो मनोनाश होता है, वह अरूप कहलाता है। अतएव सहस्रों अङ्कुर, त्वचा, पत्ते, शाखा एव फल फूलसे युक्त इस संसार-वृक्षका यह मन ही मूल है—यह निश्चित हुआ । और वह मन सङ्कल्प- रूप है। सङ्कल्पको निवृत्त करके उस मनस्तत्त्वको सुखा डालो, जिससे यह संसार वृक्ष भी नीरस होकर सूख जाय । अपने मनके निग्रहका एक ही उपाय है, वह है यह निश्चय करना कि मनका अभ्युदय—उसका स्फीत होना ही उसका विनाश— पतन है, और उसके नाशमें ही उसका महान् अभ्युदय— उसकी उन्नति है। ज्ञानसे मनोनाश होता है। अज्ञानीका मन उसके लिये शृङ्खलारूप—बन्धनका कारण होता है। रात्रिमें वेतालोंकी भाँति हृदयमें वासनाओंका वेग तभीतक रहता है, जबतक एक तत्त्वके दृढ अभ्याससे मनपर विजय नहीं कर ली जाती। जिनका चित्त और अभिमान क्षीण हो गये हैं और इन्द्रियरूपी शत्रु वशमें हो गये हैं, उनकी भोग- वासनाएँ उसी प्रकार क्षीण हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतुके आनेपर कमलिनी—कमलका पौधा स्वयमेव नष्ट हो जाता है। हाथसे हाथको मलकर, दाँतसे दाँत पीसकर तथा अङ्गोंको अङ्गोंसे दबाकर—अर्थात् अपनी पूरी शक्ति लगाकर पहले अपने मनको जीतना चाहिये । बारंबार, एकाग्रचित्त होकर बैठने तथा सदद्युक्ति के द्वारा आत्म चिन्तन करनेके अतिरिक्त मनको जीतनेका दूसरा कोई उपाय नहीं है ॥ ३२-४१ ॥ "जिस प्रकार मदमत्त हाथी अङ्कुशके बिना वशमे नहीं आता, उसी प्रकार चित्तको वशमे करनेके लिये अध्यात्म- विद्याका ज्ञान, सत्सङ्गति, वासनाओंका भलीभाँति परित्याग

६२८ मुक्तिकोपनिषद् [ अध्याय २

६२८ * मुक्तिकोपनिषद् * [ अध्याय २

तथा प्राणवायुका निरोध अर्थात् प्राणायाम-ये प्रवल उपाय हैं। इन श्रेष्ठ युक्तियोके रहते हुए जो हठपूर्वक चित्तको निरुद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं, वे दीपकको छोड़कर अन्धकारमें भटकते हैं। जो मूढ पुरुष हठसे चित्तको वशमें करनेका उद्योग करते हैं, वे उन्मत्त हाथीको कमल नालके तन्तुओंसे बाँधनेकी चेष्टा करते हैं । वृत्तिरूप लताओंके आश्रयभूत चित्तरूपी वृक्षके दो बीज हैं-एक है प्राणोंका स्पन्दन (गति), दूसरी दृढ भावना। प्राण वायुके सञ्चालनसे घट- घट व्यापक संवित्-समष्टि-चेतना चलायमान हो उठती है। चित्तकी एकाग्रतासे ज्ञानकी प्राप्ति होती है और उससे मुक्ति- लाभ होता है। अतएव चित्तकी एकाग्रताके साधनोंमें ध्यान- की यथोचित विधि बतलायी जाती है-॥४२-४७॥

"चित्त सर्वथा विकारहीन न हो, तो भी यशके आविर्भाव और अरिष्टके तिरोभावके क्रमसे केवल चैतन्य-चिदानन्द स्वरूप परब्रह्मका चिन्तन करो। जिस क्षण चित्त चिदानन्दमें आरूढ होता है, वह यशकी स्थिति है, और जिस क्षण उससे अलग होता है, वह अरिष्टकी स्थिति है। चित्तकी चाञ्चल्यके कारण यह स्वाभाविक स्थिति होती है, अतएव अरिष्टकी स्थितिसे पुनः-पुनः यशकी स्थितिमे चित्तको स्थापितकर परब्रह्मके चिन्तनमें लगो । अपानवायुके भीतर रोक दिये जानेपर जबतक हृदयमे प्राणवायुका उदय नहीं होता, तबतक वह कुम्भकावस्था रहती है, जिसका योगीलोग अनुभव करते हैं। और प्राण वायुके बाहर रोक दिये जानेपर जबतक अपान वायुका उदय नहीं होता, तबतक जो पूर्ण समावस्था रहती है, उसे बाह्य कुम्भक कहते हैं॥ ४८-५० ॥

"चिरकालतक ध्यानका अभ्यास करते रहनेपर जब अहङ्कार विगलित हो जाता है और मनोवृत्ति ब्रह्माकारमें प्रवाहित होने लगती है, तब उसे सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। जब चित्त- की सारी वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय परमानन्द प्रदान करनेवाली असम्प्रज्ञात नामकी समाधि होती है, जो योगियोंको प्रिय है। इस समाधिकी अवस्थामें कुछ भी मान नहीं होता। हो कैसे, उस स्थितिमे मन और बुद्धिका अस्तित्त्वतक नहीं रहता, केवल चित्स्वरूपकी अवस्थिति होती है। इस समाधिमे चित्त निरालम्ब होकर कैवल्य स्थिति- मे रहता है, मुनिलोग इस समाधिकी भावना करते हैं। इस समाधिमें ऊपर, नीचे और बीचमें-सर्वत्र शिवस्वरूप पूर्ण ब्रह्म ही अनुभूत होते हैं, यह समाधि परमार्थ अर्थात् मोक्ष- स्वरूप है तथा साक्षात् ब्रह्माके मुखसे उपदिष्ट हुई है ॥५१-५४॥

"दृढ भावनाके द्वारा पूर्वापरका विचार छोड़कर चित्त जो पदार्थके स्वरूपको ग्रहण करता है, उस चित्तविकारको वासना कहते हैं। कपिश्रेष्ठ ! आत्मा चित्तके तीव्र संवेगसे जैसी भावना करता है, इतर वासनाओंसे मुक्त होकर वह शीघ्र वैसा ही बन जाता है। इस प्रकारका पुरुष वासनाके वशीभूत होकर जो कुछ देखता है, उसीको सद्वस्तु-यथार्थ मानकर मोहको प्राप्त होता है। वासनाके वेगकी विभिन्नताके कारण चित्त अपने वासनात्मक स्वरूपको नहीं छोड़ता। एक वासनाके छोड़ते छोड़ते दूसरी वासनामें रमने लगता है। जिस प्रकार नशेके कारण पुरुषकी विवेकबुद्धि नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार वह दुर्बुद्धि भ्रान्त होकर सब कुछ देखता है। वासना दो प्रकारकी होती है-शुद्ध और मलिन । मलिन वासना आवागमनमे डालती है और शुद्ध वासना मनुष्यको जन्म- मृत्युसे छुड़ाती है। ज्ञानीजन कहते हैं कि मलिन वासना निविड़ अहङ्कार और घन अज्ञानस्वरूप होती है, वह पुनर्जन्म प्रदान करती है ॥ ५५-६० ॥

"जिस प्रकार बीजके अच्छी प्रकार भुन जानेपर उससे अङ्कुर नहीं उत्पन्न होता, उसी प्रकार संसार-वासनाके नष्ट हो जानेपर पुनर्जन्म नहीं होता। अतएव दग्ध बीजके समान स्थिति होनी चाहिये । वायुनन्दन ! चबाये हुएको चबानेके समान नाना शास्त्रोंकी व्यर्थ आलोचनासे क्या लाभ, प्रयत्न होना चाहिये भीतरी प्रकाशको खोजनेके लिये। कपिशार्दूल ! दर्शन और अदर्शन अर्थात् सत् ख्याति और असत्-ख्याति दोनों- को छोड़कर जो स्वयं कैवल्यरूपमें स्थित रहता है, वह ब्रह्मविद् नहीं, स्वयं ब्रह्मस्वरूप ही है। चारों वेदोंका और अनेकों शास्त्रोंका अध्ययन करके भी जो ब्रह्मतत्त्वको नहीं जानता, वह परमानन्दसे उसी प्रकार वञ्चित रहता है, जैसे कलछुल भोजनके पदार्थोंमें रहती हुई भी उनके रसको नहीं जानती । जिसका अपने शरीरकी अपवित्र गन्धको प्रत्यक्ष करके भी उससे विराग नहीं होता, उसको चिराग पैदा करनेवाला दूसरा कौन सा उपदेश दिया जा सकता है ॥ ६१-६४ ॥

"शरीर अत्यन्त मलयुक्त है और आत्मा अत्यन्त निर्मल है, दोनोंके भेद को जानकर किसकी शुचिताका उपदेश किया जाय। जो वासनासे बँधा है, वही बद्ध है, और वासनाओंका नाश ही मोक्ष है। अतएव वासनाओंका सम्यक्रूपसे परित्याग करके मोक्ष-प्राप्तिकी वासनाका भी त्याग करो । पहले मानसी वासनाओंका त्याग करके विषय वासनाओंका भी त्याग करो; और मोक्षादिकी शुद्ध-निर्दोष वासनाओंको ग्रहण करो ।

अध्याय २ ] ⁕ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁕ ६२९

अध्याय २ ] ⁕ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ⁕ ६२९ इसके बाद उनको भी छोड़कर, अथवा उन भव्य वासनाओं- को व्यवहारमें रखते हुए भी भीतरसे शान्त अर्थात् सब प्रकारकी वासनाओंसे मुक्त रहकर सबके प्रति समान स्नेह रखते हुए एकमात्र चित्स्वरूपमें अपनी वासना लगाओ । 'मारुति ! फिर उस चिद्वासनाको भी मन और बुद्धिके साथ परित्याग करके अन्ततोगत्वा तुम मुझमे पूर्णतया समाहित हो जाओ । जो शब्दरहित, स्पर्श्वरहित, रूपरहित, रसरहित और गन्धरहित है, जो कभी विकारको नहीं प्राप्त होता, जिसका न कोई नाम है और न कोई गोत्र है तथा जो सब प्रकारके दुःखोंको हरनेवाला है—पवनतनय ! इस प्रकारके मेरे स्वरूपका तुम भजन करो ॥ ६५-७० ॥ "हनूमान् ! जो साक्षिस्वरूप है, आकाशके समान अनन्त है, जिसे एक बार जान लेनेपर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता, जो अजन्मा, एक—अद्वितीय, निर्लेप, सर्वव्यापी एवं सर्वश्रेष्ठ है; जो अकार-उकार-मंकाररूप तीन कलाओंसे युक्त तथा सम्पूर्ण कलाओंसे विमुक्त अद्वय-तत्त्व है, वह ओंङ्काररूप अक्षर—अविनाशी ब्रह्म मैं ही हूँ। मैं द्रष्टा हूँ, शुद्धस्वरूप हूँ, कभी विकारको प्राप्त नहीं होता और मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा पदार्थ नहीं है, जो मेरा विषय बने । अर्थात् मेरा द्रष्टापन भी कहनेके लिये ही है। मै आगे-पीछे, ऊपर-नीचे— सर्वत्र परिपूर्ण हूँ। मे भूमा हूँ, मुझमें किसी प्रकारकी कमी नहीं है। हे हनूमान् ! तुम मेरे इस स्वरूपका चिन्तन करो । मैं अज हूँ, अमर हूँ, अजर हूँ, अमृत हूँ, स्वयंप्रकाश हूँ, सर्वव्यापी हूँ, अव्यय—अविनाशी हूँ, मेरा कोई कारण नहीं—मैं स्वयम्भू हूँ, समस्त कार्य-कलापसे परे मैं शुद्धस्वरूप हूँ, नित्यतृप्त हूँ—इस प्रकार तुम चिन्तन करो। इस प्रकार चिन्तन करते-करते जब कालवश शरीरपात होगा, तब वायुके स्पन्दनके समान तुम जीवन्मुक्त पदका भी परित्याग करके निर्वाण मुक्ति—विदेह-मुक्तिकी अवस्थामें पहुँच जाओगे । यही बात ऋचामे भी कही गयी है— 'जो आकाशमें तेजोमय सूर्यमण्डलकी भाँति, परमव्योममें चिन्मय प्रकाशद्वारा सब ओर व्याप्त है, भगवान् विष्णुके उस परमधामको विद्वान् उपासक सदा ही देखते हैं। साधनामें सदा जाग्रत् रहनेवाले निष्काम उपासक ब्राह्मण वहाँ पहुँचकर उस परमधामको और भी उद्दीप्त किये रहते हैं, जिसे विष्णुका परमपद कहते हैं। वह परमपद निष्काम उपासकको प्राप्त होता है ।' जो इस प्रकार जानता है, वह उक्त फलका भागी होता है । यह महा-उपनिषद् है" ॥ ७१-७६ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥ ॥ शुक्लयजुर्वेदीय मुक्तिकोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! मन ही बन्ध-मोक्षका कारण है मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासक्तं मुक्तं निर्विषयं स्मृतम् ॥ ( ब्रह्मविन्दु० २ । ३ ) मनुष्योंके बन्ध और मोक्षमें मन ही कारण है, विषयासक्त मन बन्धनके लिये है और निर्विषय मन ही मुक्त माना जाता है ।

ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय गर्भोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! गर्भकी उत्पत्ति एवं वृद्धिके प्रकार

ॐ शरीर पञ्चात्मक, पाँचोंमें वर्तमान, छः आश्रयोंवाला, छः गुणोंके योगसे युक्त, सात धातुओंसे निर्मित, तीन मलोंसे दूषित, दो योनियोंसे युक्त तथा चार प्रकारके आहारसे पोषित होता है । पञ्चात्मक कैसे है ? पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश (—इनसे रचा हुआ होनेके कारण) शरीर पञ्चात्मक है । इस शरीरमें पृथिवी क्या है ? जल क्या है ? तेज क्या है ? वायु क्या है ? और आकाश क्या है ? इस शरीरमें जो कठिन तत्त्व है, वह पृथिवी है, जो द्रव है, वह जल है, जो उष्ण है, वह तेज है, जो सञ्चार करता है, वह वायु है, जो छिद्र है, वह आकाश कहलाता है । इनमें पृथिवी धारण करती है, जल एकत्रित करता है, तेज प्रकाशित करता है, वायु अवयवोंको यथास्थान रखता है, आकाश अवकाश प्रदान करता है । इसके अतिरिक्त श्रोत्र शब्दको ग्रहण करनेमे, त्वचा स्पर्श करनेमें, नेत्र रूप ग्रहण करनेमें, जिह्वा रसका आस्वादन करनेमें, नासिका सूँघनेमें, उपस्थ आनन्द लेनेमे तथा पायु मलोत्सर्ग- के कार्यमें लगा रहता है । जीव बुद्धिद्वारा ज्ञान प्राप्त करता है, मनके द्वारा सङ्कल्प करता है, वाक् इन्द्रियसे बोलता है। शरीर छः आश्रयोवाला कैसे है ? इसलिये कि वह मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु और कषाय—इन छ. रसोंका आस्वादन करता है । षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद—ये सप्त स्वर तथा इष्ट, अनिष्ट और प्रणिधानकारक (प्रणवादि) शब्द मिलाकर दस प्रकारके शब्द (स्वर) होते हैं । शुक्ल, रक्त, कृष्ण, धूम्र, पीत, कपिल और पाण्डुर—ये सप्त रूप (रंग) हैं ॥ १ ॥

सात धातुओंसे निर्मित कैसे है ? जब देवदत्तनामक व्यक्तिको द्रव्य आदि भोग्य विषय जुड़ते हैं, तब उनके परस्पर अनुकूल होनेके कारण षड्रस पदार्थ प्राप्त होते हैं—जिनसे रस बनता है । रससे रुधिर, रुधिरसे मास, माससे मेद, मेदसे स्नायु, स्नायुसे अस्थि, अस्थिसे मज्जा और मज्जासे शुक्र—ये सात धातुएँ उत्पन्न होती हैं । पुरुषके शुक्र और स्त्रीके रक्तके संयोगसे गर्भका निर्माण होता है । ये सब धातुएँ हृदयमे रहती हैं, हृदयमें अन्तराग्नि उत्पन्न होती है, अग्निकेस्थानमें पित्त, पित्तके स्थानमें वायु और वायु- से हृदयका निर्माण सृजन-क्रमसे होता है ॥ २ ॥ ऋतुकालमें सम्यक् प्रकारसे गर्भाधान होनेपर एक रात्रि- में शुक्र शोणितके संयोगसे कलल बनता है । सात रातमें बुद्बुद बनता है । एक पक्षमें उसका पिण्ड (स्थूल आकार) बनता है । वह एक मासमें कठिन होता है । दो महीनोंमें वह सिरसे युक्त होता है, तीन महीनोंमें पैर बनते हैं, पश्चात् चौथे महीने गुल्फ (पैरकी घुट्टियाँ), पेट तथा कटि-प्रदेश तैयार हो जाते है । पाँचवें महीने पीठकी रीढ तैयार होती है । छठे महीने मुख, नासिका, नेत्र और श्रोत्र बन जाते हैं । सातवें महीने जीवसे युक्त होता है । आठवें महीने सब लक्षणोंसे पूर्ण हो जाता है । पिताके शुक्रकी अधिकतासे पुत्र, माताके रुधिरकी अधिकतासे पुत्री तथा शुक्र और शोणित दोनोंके तुल्य होनेसे नपुंसक संतान उत्पन्न होती है । व्याकुल चित्त होकर समागम करनेसे अन्धी, कुबड़ी, खोड़ी तथा बौनी संतान उत्पन्न होती है । परस्पर वायुके सङ्घर्षसे शुक्र दो भागोंमें बँटकर सूक्ष्म हो जाता है, उससे युग्म

ༀ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ༀ ६३१ (जुड़वाँ) संतान उत्पन्न होती है। पञ्चभूतात्मक शरीरके समर्थ—स्वस्थ होनेपर चेतनामें पञ्च ज्ञानेन्द्रियात्मक बुद्धि होती है, उससे गन्ध, रस आदिके ज्ञान होते हैं। वह अविनाशी अक्षर ॐकारका चिन्तन करता है, तब इस एकाक्षरको जानकर उसी चेतनके शरीरमें आठ प्रकृतियाँ (प्रकृति, महत्-तत्त्व, अहङ्कार और पाँच तन्मात्राएँ) तथा सोलह विकार (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच स्थूल भूत तथा मन) होते हैं। पश्चात् माताका खाया हुआ अन्न एव पिया हुआ जल नाड़ियोंके सूत्रोंद्वारा पहुँचाया जाकर गर्भस्थ शिशुके प्राणोंको तृप्त करता है। तदनन्तर नवें महीने वह ज्ञानेन्द्रिय आदि सभी लक्षणोंसे पूर्ण हो जाता है। तब वह पूर्व-जन्मका स्मरण करता है। उसके शुभ-अशुभ कर्म भी उसके सामने आ जाते हैं ॥ ३ ॥ तब जीव सोचने लगता है—'मैंने सहस्रो पूर्व-जन्मोंको देखा, उनमें नाना प्रकारके भोजन किये, नाना प्रकारके— नाना योनियोंके स्तनोंका पान किया। मैं बारवार उत्पन्न हुआ, मृत्युको प्राप्त हुआ। अपने परिवारवालोंके लिये जो मैंने शुभाशुभ कर्म किये, उनको सोचकर मैं आज यहाँ अकेला दग्ध हो रहा हूँ। उनके भोगोंको भोगनेवाले तो चले गये, मैं यहाँ दुःखके समुद्रमें पड़ा कोई उपाय नहीं देख रहा हूँ। यदि इस योनिसे मैं छूट जाऊँगा—इस गर्भके बाहर निकल गया तो अशुभ कर्मोंका नाश करनेवाले तथा मुक्तिरूप फल को प्रदान करनेवाले महेश्वरके चरणोंका आश्रय लूँगा। यदि मे योनिसे छूट जाऊँगा तो अशुभ कर्मोंका नाश करनेवाले और मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण करूँगा। यदि मैं योनिसे छूट जाऊँगा तो अशुभ कर्मोंका नाश करनेवाले और मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले सांख्य और योगका अभ्यास करूँगा। यदि मैं इस बार योनिसे छूट गया तो मैं ब्रह्मका ध्यान करूँगा।' पश्चात् वह योनिद्वार- को प्राप्त होकर योनिरूप यन्त्रमें दबाया जाकर बड़े कष्टसे जन्म ग्रहण करता है। बाहर निकलते ही वैष्णवी वायु (माया) के स्पर्शसे वह अपने पिछले जन्म और मृत्युओंको भूल जाता है और शुभाशुभ कर्म भी उसके सामनेसे हट जाते हैं ॥ ४ ॥ देह-पिण्डका 'शरीर' नाम कैसे होता है? इसलिये कि ज्ञानाग्नि, दर्शनाग्नि तथा जठराग्निके रूपमें अग्नि इसमें आश्रय लेता है। इनमें जठराग्नि वह है, जो खाये, पिये, चाटे और चूसे हुए पदार्थोंको पचाता है। दर्शनाग्नि वह है, जो रूपोंको दिखलाता है, ज्ञानाग्नि शुभाशुभ कर्मोंको सामने खड़ा कर देता है। अग्निके शरीरमें तीन स्थान होते हैं—आह्वनीय अग्नि मुखमें रहता है, गार्हपत्य अग्नि उदरमें रहता है, और दक्षिणाग्नि हृदयमे रहता है। आत्मा यजमान है, मन ब्रह्मा है, लोभादि पशु है, धैर्य और सतोष दीक्षाएँ हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ यज्ञ- के पात्र हैं, कर्मेन्द्रियाँ हवि (होम करनेकी सामग्री) है, सिर कपाल है, केश दर्भ हैं, मुख अन्तर्वेदिक़ा है, सिर चतुष्कपाल है, पार्श्वकी दन्तपक्तियाँ षोडश कपाल हैं, एक सौ सात मर्मस्थान हैं, एक सौ अस्सी संधियाँ हैं, एक सौ नौ स्नायु हैं, सात सौ शिराएँ हैं, पाँच सौ मज्जाएँ हैं, तीन सौ साठ अस्थियाँ हैं, साढे चार करोड़ रोम है, आठ पल (तोले) हृदय है, द्वादश पल (बारह तोला) जिह्वा है, प्रस्थमात्र (एक सेर) पित्त, आढकमात्र (ढाई सेर) कफ, कुडवमात्र (पावभर) शुक्र तथा दो प्रस्थ (दो सेर) मेद है, इसके अतिरिक्त शरीरमे आहारके परिमाणसे मल-मूत्रका परिमाण अनियमित होता है। यह पिप्पलाद ऋषिके द्वारा प्रकटित मोक्षशास्त्र है, पैप्पलाद मोक्षशास्त्र है ॥ ५ ॥ ॥ गर्भोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कैवल्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! आत्माका स्वरूप तथा उसे जाननेका उपाय

महर्षि आश्वलायन भगवान् प्रजापति ब्रह्माजीके पास विधिपूर्वक समिधा हाथमे लेकर गये और बोले, 'भगवन् ! सदा सतजनोंके द्वारा परिसेवित, अत्यन्त गोप्य तथा अतिशय श्रेष्ठ उस ब्रह्मविद्याका मुझे उपदेश कीजिये, जिसके द्वारा विद्वान्‌लोग शीघ्र ही सारे पापोंको नष्ट करके परात्पर पुरुष—परब्रह्मको प्राप्त होते हैं।' ब्रह्माजीने उन महर्षिसे कहा—'आश्वलायन ! तुम उस परात्पर तत्त्वको श्रद्धा, भक्ति, ध्यान और योगके द्वारा जाननेका यत्न करो। उसकी प्राप्ति न कर्मके द्वारा होती है, न सन्तान अथवा धनके द्वारा। ब्रह्मज्ञानियोंने केवल त्यागके द्वारा अमृतत्वको प्राप्त किया है। स्वर्गलोकसे भी ऊपर गुहामें अर्थात् बुद्धिके गह्वरमें स्थित होकर जो ब्रह्मलोक प्रकाशित है, उसमे यति-सयमशील योगीजन प्रवेश करते हैं। जिन्होंने वेदान्तके सविशेष ज्ञानसे तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासनके द्वारा परम तत्त्वका निश्चय कर लिया है, वे शुद्ध अन्त.करणवाले योगीजन संन्यास-योगके द्वारा ब्रह्मलोकमें जाकर कल्पके अन्तमें अमृतस्वरूप होकर मुक्त हो जाते हैं। स्नानादिसे शुद्ध होनेके अनन्तर निर्जन स्थानमें सुखसे बैठकर, ग्रीवा, सिर और शरीरको सीधे रखकर सारी इन्द्रियोंका निरोध करके भक्ति-पूर्वक अपने गुरुको प्रणाम करके सन्यास-आश्रममें स्थित योगीलोग अपने हृदय-कमलमें रजोगुणरहित, विशुद्ध, दुःख-शोकातीत आत्मतत्त्वका विशदरूपसे चिन्तन करते है। इस प्रकार जो अचिन्त्य है, अव्यक्त और अनन्तरूप है, कल्याणमय है, प्रशान्त है, अमृत है, जो ब्रह्म अर्थात् निखिल ब्रह्माण्डका मूल कारण है; जिसका आदि, मध्य और अन्त नही, जो एक अर्थात् अद्वितीय है, विभु और चिदानन्द है, रूपरहित और अद्भुत है, उस उमासहित अर्थात् ब्रह्मविद्याके साथ परमेश्वरको, समस्त चराचरके स्वामीको, प्रगान्तस्वरूप, त्रिलोचन, नीलकण्ठ महादेव अर्थात् परात्पर परब्रह्मको—जो सब भूतोंका मूल कारण है, सबका साक्षी है तथा अविद्यासे परे प्रकाशमान हो रहा है, उसको मुनिलोग ध्यानके द्वारा प्राप्त करते हैं ॥ १-७ ॥

'वही ब्रह्मा है, वही शिव है, वही इन्द्र है, वही अक्षर—अविनाशी परमात्मा है, वही विष्णु है; वह प्राण है, वह काल है, अग्नि है, वह चन्द्रमा है। जो कुछ हो चुका है और जो भविष्यमें होनेवाला है, वह सब वही है, उस सनातन तत्त्वको जानकर प्राणी मृत्युके परे चला जाता है। इसके अतिरिक्त मुक्तिका दूसरा कोई मार्ग नहीं है। जो आत्माको सब भूतोंमें देखता है तथा सब भूतोको आत्मामें देखता है, वह परब्रह्मको प्राप्त करता है; दूसरे किसी उपायसे नहीं। आत्मा—अन्तःकरणको नीचेकी अरणि तथा प्रणवको ऊपरकी अरणि बनाकर ज्ञानीजन ज्ञानरूपी मन्थनके अभ्यासद्वारा ससार-बन्धनको नष्ट कर देते हैं—ज्ञानाग्निमें जला डालते हैं। वही प्राणी मायाके वश अत्यन्त मोहग्रस्त होकर शरीरको ही अपना स्वरूप मान सब प्रकारके कर्मोंको करता है। वही जाग्रत् अवस्थामें स्त्री, अन्न पान आदि नाना प्रकारके

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६३३ भोगोंको भोगता हुआ परितृप्ति लाभ करता है। वही जीव स्वप्नावस्थामें अपनी मायासे कल्पित जीवलोकमें सुख-दुःखका भोक्ता बनता है और सुषुप्तिकालमें सारे मायिक प्रपञ्चके विलीन होनेपर वह तमोगुणसे अभिभूत होकर सुख-स्वरूपको प्राप्त होता है। पुनः जन्मान्तरोंके कर्मोंकी प्रेरणासे वह जीव सुषुप्तिसे स्वप्न-जगत्में उतरता है और उसके बाद जाग्रत्- अवस्थामें आता है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और -कारण- शरीररूपी तीन पुरोंमें जो जीव क्रीडा करता है, उसीसे यह सारा प्रपञ्च-वैचित्र्य उत्पन्न होता है॥ ८-१४॥ 'इस समस्त प्रपञ्चका आधार आनन्दस्वरूप अखण्ड बोध है- जिसमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीररूपी तीनों पुर लयको प्राप्त होते हैं। इसीसे प्राण उत्पन्न होता है, मन और सारी इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, आकाश, वायु, अग्नि, जल और सारे विश्वको धारण करनेवाली पृथ्वी उत्पन्न होती है। जो परब्रह्म सबका आत्मा है, समस्त कार्य-कारणरूप विश्वका महान् आयतन अर्थात् आधार है, जो सूक्ष्म-से-सूक्ष्म है, अविनाशी है, वह तुम्हीं हो, तुम वही हो। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति आदि जो प्रपञ्च भासमान है, वह ब्रह्म- स्वरूप है और वही मैं हूँ- यों जानकर जीव सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। तीनों धाम अर्थात् जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिमें जो कुछ भोक्ता, भोग्य और भोग हैं, उनसे विलक्षण साक्षी, चिन्मात्रस्वरूप, सदाशिव मैं हूँ। मुझमे ही सब कुछ उत्पन्न हुआ है, मुझमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है, मुझमें ही सब लयको प्राप्त होता है, वह अद्वय ब्रह्मस्वरूप मैं ही हूँ। मैं अणुसे भी अणु हूँ, इसी प्रकार मैं महान्‌से भी महान् हूँ; यह विचित्र विश्व मेरा ही स्वरूप है। मैं पुरातन पुरुष हूँ, मैं ईश्वर हूँ, मैं हिरण्मय पुरुष ब्रह्मा हूँ, मैं शिवस्वरूप हूँ। वह पाणि पाद-विहीन, अचिन्त्यशक्ति परब्रह्म मैं हूँ। मैं नेत्रोंके बिना देखता हूँ, कानोंके बिना सुनता हूँ, बुद्धि आदिसे पृथक् होकर मैं ही जानता हूँ, मुझको जाननेवाला कोई नहीं है, मैं सदा चित्स्वरूप हूँ। समस्त वेद मेरा ही ज्ञान कराते हैं, मैं ही वेदान्तका कर्त्ता हूँ, वेदवेत्ता भी मैं ही हूँ। मुझे पुण्य-पाप नहीं लगते, मेरा कभी नाश नहीं होता और न जन्म ही होता है। और न मेरे शरीर, मन-बुद्धि और इन्द्रियाँ ही हैं। मेरे लिये न भूमि है न जल है, न अग्नि है, न वायु और न आकाश ही है।' जो इस प्रकार गुहा-बुद्धिके गह्वरमें स्थित, निष्कल (अवयवहीन) और अद्वितीय, सदसत्‌से परे सबके साक्षी मेरे परमात्मस्वरूपको जानता है, वह शुद्ध परमात्मस्वरूपको प्राप्त होता है। जो शतरुद्रियका पाठ करता है, वह अग्निपूत होता है, वायुपूत होता है, आत्मपूत होता है, सुरापानके दोषसे छूट जाता है, ब्रह्महत्याके दोषसे मुक्त हो जाता है, वह स्वर्णकी चोरीके पापसे छूट जाता है, वह शुभाशुभ कर्मोंसे उद्धार पाता है, भगवान् सदाशिवके आश्रित हो जाता है तथा अविमुक्तस्वरूप हो जाता है। अतएव जो आश्रमसे अतीत हो गये हैं, उन परमहंसोंको सदा-सर्वदा अथवा कम-से-कम एक बार इसका पाठ अवश्य करना चाहिये। इससे उस ज्ञानकी प्राप्ति होती है, जो भवसागरका नाश कर देता है। इसलिये इसको इस प्रकार जानकर मनुष्य कैवल्यरूप मुक्तिको प्राप्त होता है, कैवल्य पदको प्राप्त होता है॥ १५-२५॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कैवल्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ज्ञानमयी दृष्टि 'दृष्टिं ज्ञानमयीं कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत् ।' 'दृष्टिको ज्ञान (ब्रह्म) मयी करके जगत्‌को ब्रह्ममय देखे ।' उ० अ० ८०-