कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 667, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१९
वही अहङ्कारकी कलाओंसे युक्त और बुद्धि-बीजसे समन्वित पुर्यष्टक कहलाता है, जो प्राणियोंके हृत्कमलमें मँडरानेवाले षट्पदके समान है। उसमें तीव्र संवेगके द्वारा तेजस्वी शरीरकी भावना करता हुआ मन उसी प्रकार स्थूलताको प्राप्त होता है, जैसे पाकके द्वारा विल्वफल। स्वच्छ आकाशमे, मूषा (सोना गलानेके पात्र) में पिघले सोनेके समान स्फुरित होकर वह तेज अपने स्वभावके द्वारा ही गठित होने लगता है। उसका ऊपरी भाग सिरके पिण्डके समान तथा अधोभाग पैरके समान हो जाता है तथा दोनों पाश्र्वोंमें बाहुकी आकृतियाँ एव मध्यमें उदरका आकार समयानुसार व्यक्त होकर शुद्ध शरीररूप धारण करते हैं। वे ही बुद्धि, वीर्य, बल, उत्साह, विज्ञान और ऐश्वर्यसे युक्त होकर सब लोकोंके पितामह भगवान् ब्रह्मा बनते हैं ॥ १३४-१५७ ॥ 'भूत, भविष्य और वर्तमानको स्पष्ट देखनेवाले भगवान् ब्रह्माजी अपने उत्तम और सुन्दर शरीरको देखकर सोचने लगे कि इस चिन्मात्र आत्मस्वरूपी परमाकाशमे, जिसका ओर-छोर नहीं दिखायी देना, पहले क्या होना चाहिये । इस प्रकार चिन्तन करते ही तत्काल उन्हें निर्मल आत्म-दृष्टि प्राप्त हुई । उन्होंने अतीत कालके अनेकों सर्गोंको देखा तो समस्त धर्मों और गुणोंके सारे क्रम उन्हें स्मरण हो आये । उन्होंने लीलासे ही नाना प्रकारके आचारोंसे युक्त भाँति भाँतिकी प्रजाको आकाशमें गन्धर्व- नगरके समान सङ्कल्पसे उत्पन्न कर दिया । उनके स्वर्ग और अपवर्गके लिये तथा धर्म, काम और अर्थकी सिद्धिके लिये अनन्त चित्र-विचित्र शास्त्रोंकी कल्पना की । ब्रह्मारूपी मन- की कल्पनासे जगत्की स्थिति होनेके कारण ब्रह्माके जीवनके साथ ही इसकी स्थिति है, उनके नाशके साथ यह भी नाशको प्राप्त होता है। द्विजवर ! वास्तवमें कहीं कोई न उत्पन्न होता है और न मरता है। सब कुछ मिथ्या दीख पडता है। यह विश्व-प्रपञ्च आशारूपी सर्पिणियोंकी पिटारी है। इसका त्याग करो। 'यह असत् है' यों जानकर मातृभावमें स्थित हो । अर्थात् मै ही इसका उत्पादक हूँ, ऐसी भावना करो । गन्धर्वनगर भूपित हो या अभूपित—वह जिस प्रकार तुच्छ है, उसी प्रकार अविद्याके अंशस्वरूप सुत-दारा आदि- की स्थिति है। फिर इनके लिये सुख-दु ख क्या करना । धन-दारा आदि प्रपञ्चका बढ़ना दुःखमय है। इसमें संतुष्ट होनेकी कोई बात नहीं है। मोह-मायाके बढनेपर, भला, इस लोकमें किसको शान्ति मिली है। जिन वस्तुओंकी अधिकतासे मूर्खोको अनुराग होता है, उन्हींकी प्राप्तिसे प्राज्ञ पुरुषको वैराग्य उत्पन्न होता है। अतएव, तत्त्वज्ञानी निदाघ ! सासारिक व्यवहारोंमें जो-जो नष्ट होता जाय, उसकी उपेक्षा करते चलो और जो-जो प्राप्त होता जाय, उसे ग्रहण करते जाओ । जो भोग प्राप्त नहीं हैं, स्वभावत उनकी इच्छा न करना तथा जो प्राप्त हैं, उनका उपभोग करना—यही पण्डितका लक्षण है । सत् और असत्के मध्यमें शुद्ध पदको जानकर तथा उसका अवलम्बन करके आभ्यन्तर तथा बाह्य दृश्योंको न तो ग्रहण करो और न त्याग करो । कर्ममें स्थित जिस ज्ञानी पुरुषको इच्छा और अनिच्छा समान हैं, उसकी बुद्धि जलमें पद्मपत्रके समान लिपाय- मान नहीं होती । ब्राह्मण ! यदि ऐन्द्रिय विषयोंका विभव तुम्हारे हृदयमें स्पन्दित नहीं होता, तो तुम ज्ञातव्य पदार्थको जानकर संसार-सागरसे समुत्तीर्ण हो गये । उच्चपदकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त बुद्धिमत्तापूर्वक वासणारूपी पुष्पोंसे गन्ध लेकर उससे शीघ्र ही अपनी चित्तवृत्तिको दूर हटा लो ॥ १५८-१७५ ॥ 'वासनारूपी जलसे पूर्ण इस ससार-सागरमें जो प्रज्ञारूपी नौकापर आरूढ हैं, वे विद्वान् दूसरे पार पहुँच गये हैं। ससार- रूपी समुद्रको जाननेवाले पुरुष सासारिक व्यवहारका न तो त्याग करते हैं न उसकी आकाङ्क्षा ही करते हैं। वे सारे व्यवहारोंका अनासक्तरूपसे निर्वाह करते हैं। सत्तासामान्य अनन्त आत्मतत्त्व-रूप चेतनका जो विषयोन्मुख होना है, उसी- को विज्ञ पुरुष सङ्कल्पका अङ्कुर मानते हैं । वह सङ्कल्प थोडी- सी सत्ता प्राप्त करके जब शनै -शनै. घनीभूत होता है, तब वह बादलके समान दृढ होकर चित्ताकाशको आच्छन्न करके जडताका कारण बनता है। चेतन विषयोंको अपनेसे पृथक्की भाँति समझता हुआ, जिस प्रकार बीज अङ्कुरावस्था- को प्राप्त होता है, वैसे ही सङ्कल्पावस्थाको प्राप्त होता है। सङ्कल्पसे सङ्कल्प-क्रिया स्वय ही उत्पन्न होती है और स्वयं ही शीघ्र-शीघ्र बढ़ती है। वह दुःखका ही कारण बनती है, सुख प्रदान नहीं करती। चित्तमें सङ्कल्पकी क्रिया- को रोको । स्थितिमें पदार्थोंकी भावना मत करो, क्योंकि सङ्कल्पका नाश करनेके लिये जिसने कमर कस ली है, वह पुन. उनका अनुगमन नहीं करेगा । भावनाका केवल अभाव हो जानेपर सङ्कल्प स्वय ही नष्ट हो जाता है। मुनि ! सङ्कल्पके द्वारा ही सङ्कल्पको और मनके द्वारा मनको छिन्न करके तुम अपने आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाओ, इसमें दुष्कर ही क्या है ? क्योंकि जिस प्रकार यह आकाश शून्य है, उसी प्रकार यह जगत् शून्य है। जिस प्रकार धानका छिलका तथा ताँवेकी कालिमा क्रियासे नष्ट हो जाती है, विप्र ! उसी प्रकार पुरुषका मलरूपी दोष क्रियासे दूर हो जाता है। धानके छिलके- की भाँति जीवका मल उसके स्वभावगत है, तथापि वह नष्ट अवश्य हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं है। अतएव उद्योगी बनो' ॥ १७६-१८६ ॥ ॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥