भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

ब्राह्मण ४] \

ब्राह्मण ४]
* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
४२१


[बायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का ऊपरी भाग]

स्पर्श कर सकता है, अन्य अन्यको जान सकता है । परंतु जैसे जलमें वैसे ही सुषुप्तिमें एक अद्वैत द्रष्टा है । हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने जनकको उपदेश दिया । 'यह इस ( पुरुष ) की परमगति है, यह इसकी परम सम्पत्ति है, यह इसका परमलोक है, यह इसका परमानन्द है । इस आनन्दकी मात्राके आश्रित ही अन्य प्राणी जीवन धारण करते हैं ॥ ३१-३२ ॥

वह जो मनुष्योंमें सब अङ्गोंसे पूर्ण समृद्ध, दूसरोंका अधिपति और मनुष्यसम्बन्धी सम्पूर्ण भोगसामग्रियोंद्वारा सबसे अधिक सम्पन्न होता है, वह मनुष्योंका परम आनन्द है। अब जो मनुष्योंके सौ आनन्द हैं, वह पितृलोकको जीतनेवाले पितृगणका एक आनन्द है। और जो पितृलोकको जीतनेवाले पितरोंके सौ आनन्द हैं, वह गन्धर्वलोकका एक आनन्द है । तथा जो गन्धर्वलोकके सौ आनन्द हैं, वह कर्मदेवोंका, जो कि कर्मके द्वारा देवत्वको प्राप्त होते हैं, एक आनन्द है। जो कर्मदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह आजान ( जन्मसिद्ध ) देवोंका एक आनन्द है, और जो निष्पाप, निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ]। जो आजानदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह प्रजापति-लोकका एक आनन्द है; और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ]। जो प्रजापतिलोकके सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्मलोकका एक आनन्द है, और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ] तथा यही परम आनन्द है । हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । [ जनक बोले-] 'मैं श्रीमान्को सहस्र [ गौएँ ] देता हूँ, अब आगे भी आप मोक्षके लिये ही उपदेश करें।' यह सुनकर याज्ञवल्क्यजी डर गये कि इस बुद्धिमान् राजाने तो


[दायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का ऊपरी भाग]

मुझे सम्पूर्ण प्रश्नोंके निर्णयपर्यन्त [ उत्तर देनेको ] बाँध लिया ॥३३॥

वह यह पुरुष इस स्वप्नान्तमें रमण और विहार करके तथा पुण्य और पापको देखकर ही पुनः गये हुए मार्गसे ही यथास्थान जागरित-अवस्थाको ही लौट आता है ॥ ३४ ॥

लोकमे जिस प्रकार बहुत अधिक बोझ लदा हुआ छकड़ा शब्द करता हुआ चलता है, उसी प्रकार यह देही आत्मा प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित [हो मरण कालमे] शब्द करता हुआ जाता है, जब कि यह ऊपरके श्वास छोड़नेवाला हो जाता है । वह यह देह जिस समय कृशताको प्राप्त होता है, वृद्धावस्था अथवा ज्वरादि रोगके कारण कृश हो जाता है, उस समय जैसे आम, गूलर अथवा पिप्पल फल बन्धन (डंठल) से छूट जाता है, वैसे ही यह पुरुष इन अङ्गोंसे छूटकर, फिर जिस मार्गसे आया था, उसीसे प्रत्येक योनिमें प्राणकी विशेष अभिव्यक्तिके लिये ही चला जाता है ॥ ३५-३६ ॥

अतः जिस प्रकार आते हुए राजाकी उग्रकर्मा एव पापकर्म-में नियुक्त सूत और गाँवके नेतालोग अन्न, पान और निवासस्थान तैयार रखकर 'ये आये, ये आये' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं, उसी प्रकार इस कर्मफलवेत्ताकी सम्पूर्ण भूत 'यह ब्रह्म आता है, यह आता है' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं ॥ ३७ ॥

जिस प्रकार जानेके लिये तैयार हुए राजाके अभिमुख होकर उग्रकर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत एवं गाँवके नेतालोग जाते हैं, उसी प्रकार जब यह ऊपरके श्वास लेने लगता है तो अन्तकालमें सारे प्राण इस आत्माके अभिमुख होकर इसके साथ जाते हैं ॥ ३८ ॥


चतुर्थ ब्राह्मण कामना-नाशसे ब्रह्म-प्राप्ति


[बायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का निचला भाग]

वह यह आत्मा जिस समय दुर्बलताको प्राप्त हो मानो सम्मोहित हो जाता है, तब ये वागादि प्राण इसके प्रति अभिमुखतासे आते हैं। वह इन [ प्राणोंकी ] तेजोमात्राको सम्यक् प्रकारसे ग्रहण करके हृदयमें ही अनुक्रान्त (अभिव्यक्त ज्ञानवान् ) होता है। जिस समय यह चाक्षुष पुरुष सब ओरसे व्यावृत्त होता है, उस समय मुमूर्षु रूपज्ञानहीन हो जाता है ॥ १ ॥

[ चक्षु-इन्द्रिय लिङ्गात्मासे ] एकरूप हो जाती है तो लोग 'नहीं देखता' ऐसा कहते हैं; [ घ्राणेन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं सूँघता' ऐसा कहते हैं, [ रसनेन्द्रिय ] एक-


[दायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का निचला भाग]

रूप हो जाती है तो 'नहीं चखता' ऐसा कहते हैं, [ वागिन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं बोलता' ऐसा कहते हैं, [ श्रोत्रेन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं सुनता' ऐसा कहते हैं, [ मन ] एकरूप हो जाता है तो 'मनन नहीं करता' ऐसा कहते हैं, [ त्वगिन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'स्पर्श नहीं करता' ऐसा कहते हैं, और यदि [ बुद्धि लिङ्गात्मासे ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं जानता' ऐसा कहते हैं । उस इस हृदयका अग्र ( बाहर जानेका मार्ग ) अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य

४९२ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ४ भागसे बाहर निकलता है। उसके उत्क्रमण करनेपर उसके साथ ही प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके उत्क्रमण करनेपर सम्पूर्ण प्राण (इन्द्रियवर्ग) उत्क्रमण करते हैं। उस समय यह आत्मा विशेष विज्ञानवान् होता है और विज्ञानयुक्त प्रदेशको ही जाता है। उस समय उसके साथ-साथ ज्ञान, कर्म और पूर्वप्रज्ञा (अनुभूत विषयोंकी वासना) भी जाते हैं ॥ २ ॥ वह दृष्टान्त है—जिस प्रकार जोंक एक तृणके अन्तमें पहुँचकर दूसरे तृणरूप आश्रयको पकड़कर अपनेको सकोड़ लेती है,उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको मारकर— अविद्या (अचेतनावस्था) को प्राप्त कराकर दूसरे आधारका आश्रय ले अपना उपसंहार कर लेता है। उसमें दृष्टान्त— जिस प्रकार सुनार सुवर्णका भाग लेकर दूसरे नवीन और कल्याणतर (अधिक सुन्दर) रूपकी रचना करता है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको नष्टकर—अचेतनावस्थाको प्राप्त करके दूसरे पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा अथवा अन्य भूतोंके नवीन और सुन्दर रूपकी रचना करता है॥ ३-४॥ वह यह आत्मा ब्रह्म है। वह विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, जलमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतेजोमय, काममय, अकाममय, क्रोध- मय, अक्रोधमय, धर्ममय, अधर्ममय और सर्वमय है । जो कुछ इदमय (प्रत्यक्ष) और अदोमय (परोक्ष) है, वह वही है । वह जैसा करनेवाला और जैसे आचरणवाला होता है, वैसा ही हो जाता है । शुभ कर्म करनेवाला शुभ होता है और पापकर्मी पापी होता है । पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यात्मा होता है और पापकर्मसे पापी होता है । कोई-कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है; वह जैसी कामनावाला होता है वैसा ही सङ्कल्प करता है, जैसे सङ्कल्पवाला होता है वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ उस विषयमें यह मन्त्र है—इसका लिङ्ग अर्थात् मन जिसमें अत्यन्त आसक्त होता है, उसी फलको यह साभिलाष होकर कर्मके सहित प्राप्त करता है । इस लोकमे यह जो कुछ करता है, उस कर्मका फल प्राप्तकर उस लोकसे कर्म करनेके लिये पुनः इस लोकमें आ जाता है; अवश्य ही कामना करने- वाला पुरुष ही ऐसा करता है । अब जो कामना न करनेवाला पुरुष है [उसके विषयमें कहते हैं]—जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता, वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ उसी अर्थमे यह मन्त्र है—जिस समय इसके हृदयमें आश्रित सम्पूर्ण कामनाओंका नाश हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमृत हो जाता है और यहीं (इसी शरीरमें) उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार सर्पकी केंचुली बाँबीके ऊपर मृत और सर्पद्वारा परित्याग की हुई पड़ी रहती है, उसी प्रकार यह शरीर पड़ा रहता है और यह अशरीर अमृत प्राण तो ब्रह्म ही है—तेज ही है ।' तब विदेहराज जनकने कहा, 'वह मैं जनक श्रीमान्‌को सहस्र गौएँ देता हूँ' ॥ ७ ॥ उस विषयमें ये मन्त्र हैं—यह ज्ञानमार्ग सूक्ष्म, विस्तीर्ण और पुरातन है । वह मुझे स्पर्श किये हुए है और मैने ही उसका फलसाधक ज्ञान प्राप्त किया है । धीर ब्रह्मवेत्ता पुरुष इस लोकमें जीते-जी ही मुक्त होकर शरीर त्यागके बाद उसी मार्गसे स्वर्गलोक अर्थात् मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥ उस मार्गके विषयमें मतभेद है । कोई उसमे शुक्ल और कोई नीलवर्ण बतलाते हैं तथा कोई पिङ्गलवर्ण, कोई हरित और कोई लाल कहते हैं, किंतु यह मार्ग साक्षात् ब्रह्मद्वारा अनुभूत है। इस मार्गसे पुण्य करनेवाला परमात्मतेजःस्वरूप ब्रह्मवेत्ता ही जाता है ॥ ९ ॥ जो (भोगसक्त मनुष्य) अविद्या (भोगोंके साधनरूप कर्म) की उपासना करते हैं, वे अज्ञानस्वरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करते हैं और जो (मिथ्याज्ञानी) विद्या (कर्तव्य- कर्मका त्याग करके केवल ज्ञानके अभिमान) में रत हैं, वे उससे भी अधिकतर अन्धकारमें प्रवेश करते हैं। वे आनन्द (असुख) नामके निकृष्ट योनि और नरकरूप लोक अज्ञान और दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे आच्छादित हैं; वे अविद्वान् और अज्ञानीलोग मरकर उन्हींको प्राप्त होते हैं। यदि पुरुष आत्माको 'मैं यह हूँ' इस प्रकार विशेषरूपसे जान जाय तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनासे शरीरके पीछे सन्तप्त हो ? जिस पुरुषको इस अनेकों अनर्थों- से पूर्ण और विवेक विज्ञानके विरोधी विषम शरीरमें प्रविष्ट हुआ आत्मा प्राप्त और ज्ञात हो गया है, वही कृतकृत्य है। वही सर्व [शुभों] का कर्ता है, उसीका लोक (मोक्षधाम) है और स्वयं वही लोक (मोक्षरूप) भी है। हम इस शरीरमें रहते हुए ही यदि उसे जान लेते हैं [तो कृतार्थ हो गये ], यदि उसे नहीं जाना तो बड़ी हानि है। जो उसे जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं; किंतु दूसरे लोग तो दुःखको ही प्राप्त होते हैं। जब भूत और भविष्यत्‌के स्वामी इस

ब्राह्मण ४] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४९३

ब्राह्मण ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४९३ प्रकाशमान अथवा कर्म-फलदाता आत्माको मनुष्य साक्षात् जान लेता है तो वह उससे अपनी रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करता *॥ १०-१५ ॥ जिसके नीचे संवत्सरचक्र अहोरात्रादि अवयवोंके सहित चक्कर लगाता रहता है, उस आदित्यादि ज्योतियोंके ज्योतिः- स्वरूप अमृतकी देवगण 'आयु' इस प्रकार उपासना करते हैं। जिसमें पाँच पञ्चजन और [ अव्याकृतसंज्ञक ] आकाश भी प्रतिष्ठित है, उस आत्माको ही मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ । उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ ॥ १६-१७ ॥ जो उसे प्राणका प्राण, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र तथा ' मनका मन जानते हैं, वे उस सनातन और मुख्य ब्रह्मको जानते हैं । ब्रह्मको आचार्योपदेशपूर्वक मनसे ही देखना चाहिये । इसमें नानात्व कुछ भी नहीं है। जो इसमें नानाके समान देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है। उस ब्रह्मको [ आचार्योपदेशके ] अनन्तर एक प्रकारसे ही देखना चाहिये। यह ब्रह्म अप्रमेय, ध्रुव, निर्मल, [ अव्याकृतरूप ] आकाशसे भी सूक्ष्म, अजन्मा, आत्मा, महान् और अविनाशी है । बुद्धिमान् ब्राह्मणको उसे ही जानकर उसीमें प्रज्ञा करनी चाहिये । बहुत शब्दोंका अनुध्यान ( निरन्तर चिन्तन ) न करे; वह तो वाणीका श्रम ही है ॥ १८-२१ ॥ वह यह महान् अजन्मा आत्मा, जो कि यह प्राणोंमें विज्ञानमय है, जो यह हृदयमें आकाश है, उसमें शयन करता है । वह सबको वशमें रखनेवाला, सबका शासन करनेवाला

  • अन्ध तम प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रता ॥ अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वा सोऽबुधो जना ॥ आत्मान चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुष । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसञ्जरेत् ॥ यस्यानुवित्त प्रतिबुद्ध आत्मास्मिन् संदेहे गहने प्रविष्ट । स विश्वकृत्स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोका सउ लोक एव ॥ इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वय न चेदवेदिर्महती विनष्टि । ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दु खमेवापियन्ति ॥ यदैतमनुपश्यत्यात्मान देवमञ्जसा । ईशान भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ (बृह० ४ । ४ । १०-१५) और सबका अधिपति है । वह शुभ कर्मसे बढ़ता नहीं और अशुभ कर्मसे छोटा नहीं होता । यह सर्वेश्वर है, यह भूतोंका अधिपति और भूतोंका पालन करनेवाला है । इन लोकोंकी मर्यादा भङ्ग न हो—इस प्रयोजनसे वह इनको धारण करनेवाला सेतु है । [ उपनिषदोंमें जिसके स्वरूपका दिग्दर्शन कराया गया है ] उस इस आत्माको ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्याय, यज्ञ, दान और निष्काम तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं । इसीको जानकर मुनि होता है । इस आत्मलोककी ही इच्छा करते हुए त्यागी पुरुष सब कुछ त्यागकर चले जाते ( सन्यासी हो जाते ) हैं। इस सन्यासमें कारण यह है— पूर्ववर्ती विद्वान् सन्तान [ तथा सकाम कर्म आदि ] की इच्छा नहीं करते थे । [ वे सोचते थे—] हमें सन्तानसे क्या लेना है, जिन हमको कि यह आत्मलोक अभीष्ट है । अतः वे पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणासे व्युत्थान कर फिर भिक्षाचर्या करते थे । जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है और जो वित्तैषणा है, वही लोकैषणा है। ये दोनों एषणाएँ ही हैं । वह यह 'नेति-नेति' इस प्रकार-निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है, वह ग्रहण नहीं किया जाता; वह अशीर्य है, उसका नाश नहीं होता; वह असङ्ग है, कहीं आसक्त नहीं होता, बँधा नहीं है, इसलिये व्यथित नहीं होता तथा उसका क्षय नहीं होता । इस आत्मज्ञको ये दोनों ( पाप- पुण्यसम्बन्धी शोक-हर्ष ) प्राप्त नहीं होते । अतः इस निमित्तसे मैंने पाप किया है [ ऐसा पश्चात्ताप ] और इस निमित्तसे मैंने पुण्य किया है [ ऐसा हर्ष ] इन दोनोंको ही वह पार कर जाता है । इसे किया हुआ और न किया हुआ नित्यकर्म [ फलप्रदान और प्रत्यवायके द्वारा ] ताप नहीं देता ॥ २२ ॥ यही बात ऋचाद्वारा कही गयी है—यह ब्रह्मवेत्ताकी नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो बढ़ती है और न घटती ही है । उस महिमाके ही स्वरूपको जाननेवाला होना चाहिये, उसे जानकर पापकर्मसे लिप्त नहीं होता । अतः इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है, सभीको आत्मा देखता है । उसे [ पुण्य-पापरूप ] पापकी प्राप्ति नहीं होती, वह सम्पूर्ण पापोंको पार कर जाता है । इसे पाप ताप नहीं पहुँचाता, यह सारे पापोंको सन्तप्त करता है। यह पापरहित, निष्काम, निःसंशय ब्राह्मण हो जाता है । सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है, तुम इसे पहुँचा दिये गये हो'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ।

४९४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

४९४ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ४ [ तब जनकने कहा—] 'वह मैं श्रीमान्‌को विदेह देश देता और कर्मफल देनेवाला है। जो ऐसा जानता है, उसे सम्पूर्ण हूँ, साथ ही आपकी दासता (सेवा) करनेके लिये अपने- कर्मोंका फल प्राप्त होता है। वही यह महान् अजन्मा आत्मा आपको भी समर्पण करता हूँ' ॥ २३ ॥ अजर, अमर, अमृत एव अभय ब्रह्म है। अभय ही ब्रह्म है; वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्न भक्षण करनेवाला जो ऐसा जानता है, वह अभय ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २४-२५ ॥

पञ्चम
याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद
यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्यकी मैत्रेयी और कात्यायनी—ये   प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके
दो पत्नियां थीं। उनमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी और कात्यायनी   लिये क्षत्रिय प्रिय होता है, लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय
साधारण स्त्रियोंकी सी बुद्धिवाली ही थी। तब याज्ञवल्क्यने   नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते हैं;
दूसरे प्रकारकी चर्चाका आरम्भ करनेकी इच्छासे [कहा—]   देवोंके प्रयोजनके लिये देव प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके
'अरी मैत्रेयि !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा—'मैं इस स्थान   लिये देव प्रिय होते हैं, वेदोंके प्रयोजनके लिये वेद प्रिय नहीं
(गार्हस्थ्य-आश्रम) से अन्यत्र सब कुछ त्यागकर जानेवाला   होते, अपने ही प्रयोजनके लिये वेद प्रिय होते हैं, भूतोंके
हूँ, अर्थात् मेरा सन्यास लेनेका विचार है। इसलिये [मैं तेरी   प्रयोजनके लिये भूत प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये
अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ] इस कात्यायनीके साथ   भूत प्रिय होते हैं, सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते,
तेरा बँटवारा कर दूँ'। उस मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि   अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं, अतः अरी
यह धनसे सम्पन्न सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं   मैत्रेयि ! आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और
उससे अमर हो सकती हूँ, अथवा नहीं ?' याज्ञवल्क्यने कहा,   निदिध्यासन (ध्यान) करनेयोग्य है। अरी मैत्रेयि ! निश्चय ही
'नहीं, भोग सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है,   आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर इस
वैसा ही तेरा भी जीवन हो जायगा, धनसे अमृतत्वकी तो आशा   सबका ज्ञान हो जाता है' ॥ ६ ॥
है ही नहीं।' उस मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो   ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको
सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्व-   आत्मासे भिन्न समझता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती
का साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें।' उन याज्ञवल्क्यजीने   है, जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न जानता है। लोक उसे
कहा, 'निश्चय ही तू पहले भी मेरी प्रिया रही है और इस   परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको आत्मासे भिन्न जानता है।
समय भी तूने मेरे प्रिय (प्रसन्नता) को बढ़ाया है। अतः   देवता उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओंको आत्मासे भिन्न
देवि ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तेरे प्रति इस (अमृतत्वके साधन)   समझता है। वेद उसे परास्त कर देते हैं, जो वेदोंको आत्मासे
की व्याख्या करूँगा। तू मेरे व्याख्या किये हुए विषयका   भिन्न जानता है। भूत उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको
चिन्तन करना' ॥ १-५ ॥                                आत्मासे भिन्न समझते हैं। सब उसे परास्त कर देते हैं, जो
उन्होंने कहा—'अरी मैत्रेयि ! यह निश्चय है कि पतिके   सबको आत्मासे भिन्न जानता है। यह ब्राह्मणजाति, यह
प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके   क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देव, ये वेद, ये भूत और ये सब
लिये पति प्रिय होता है, स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं   जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही है। वह दृष्टान्त ऐसा है
होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है, पुत्रोंके   कि जिसपर लकड़ी आदिसे आघात किया जाता है, उस
प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये   दुन्दुभि (नक्कारे) के बाह्य शब्दोंको जिस प्रकार कोई ग्रहण
पुत्र प्रिय होते हैं, धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता,   नहीं कर सकता, किन्तु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको
अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है, पशुओंके प्रयोजनके   ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी गृहीत हो जाता है। वह
लिये पशु प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पशु प्रिय   [दूसरा] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे मुँहसे फूँके जाते हुए
होते हैं, ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता,   शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें कोई समर्थ नहीं होता,
अपने ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; क्षत्रियके   किन्तु शङ्ख या शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी

ब्राह्मण ६ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४९५

ब्राह्मण ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४९५ ग्रहण हो जाता है । वह [ तीसरा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे बजायी जाती हुई वीणाके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमे कोई समर्थ नहीं होता, किन्तु वीणा या वीणाके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ७–१० ॥ वह [ चौथा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धूएँ निकलते हैं, उसी प्रकार हे मैत्रेयि ! ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक (ब्राह्मण-मन्त्र), सूत्र (वैदिक वस्तुसंग्रहवाक्य), सूत्रोंकी व्याख्या, मन्त्रोंकी व्याख्या, इष्ट (यज्ञ), हुत (हवन किया हुआ), आशित (खिलाया हुआ), पायित (पिलाया हुआ), यह लोक, परलोक और सम्पूर्ण भूत हैं—सब इसीके निःश्वास हैं। वह [ पाँचवाँ ] दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक अयन (आश्रयस्थान) है, इसी प्रकार समस्त स्पशोंका त्वचा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन हैं, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त संकल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका दोनों हाथ एक अयन हैं, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मागोंका दोनों चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोंका वाक् एक अयन है ॥ ११-१२ ॥ उसमें [ छठा ] दृष्टान्त इस प्रकार है—जिस प्रकारनमकका डला भीतर और बाहरसे रहित सम्पूर्ण रसघन ही है, हे मैत्रेयि ! उसी प्रकार यह आत्मा अन्तर-बाह्य भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है। यह इन भूतोंसे [ विशेषरूपसे ] उत्थित होकर उन्हींके साथ नष्ट हो जाता है। इस प्रकार मर जानेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती। हे मैत्रेयि ! इस प्रकार मैं कहता हूँ'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १३ ॥ वह मैत्रेयी बोली, 'यहाँ श्रीमान्ने मुझे मोहको प्राप्त करा दिया है। मैं इसे विशेषरूपसे नहीं समझती।' उन्होंने कहा, 'अरी मैत्रेयि ! मैं मोहकी बात नहीं कह रहा हूँ। अरी ! यह आत्मा निश्चय ही अविनाशी और अनुच्छेदरूप धर्मवाला है ॥ १४ ॥ जहाँ [ अविद्यावस्था में ] द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यका रसास्वादन करता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका मनन करता है, अन्य अन्यका स्पर्श करता है और अन्य अन्यको विशेषरूपसे जानता है। किन्तु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसका रसास्वादन करे, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका मनन करे, किसके द्वारा किसका स्पर्श करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा पुरुष इस सबको जानता है, उसे किस साधनसे जाने ? वह यह 'नेति नेति' इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है—उसका ग्रहण नहीं किया जाता; अशीर्य है—उसका विनाश नहीं होता, असङ्ग है—आसक्त नहीं होता; असद्ध है—वह व्यथित और क्षीण नहीं होता। हे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? इस प्रकार तुझे उपदेश कर दिया गया। अरी मैत्रेयि ! निश्चय जान, इतना ही अमृतत्व है।' ऐसा कहकर याज्ञवल्क्यजी परिव्राजक (सन्यासी) हो गये ॥ १५ ॥ षष्ठ ब्राह्मण याज्ञवल्कीय काण्डकी परम्परा अब [ याज्ञवल्कीय काण्डका ] वंश बतलाया जाता है— पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने पौतिमाष्यसे, पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने कौशिकसे, कौशिकने कौण्डिन्यसे, कौण्डिन्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कौशिकसे और गौतमसे, तथा गौतमने अग्निवेश्यसे, अग्निवेश्यने गार्ग्यसे, गार्ग्यने गार्ग्यसे, गार्ग्यने गौतमसे, गौतमने सैतवसे, सैतवने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने गार्ग्यायणीसे, गार्ग्यायणीने उद्दालकायनसे, उद्दालकायनने जाबालायनसे, जाबालायनने

४९६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

४९६ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ४ माध्यन्दिनायनसे, माध्यन्दिनायनने सौकरायणसे, सौकरायणने कौण्डिन्यसे, विदर्भीकौण्डिन्यने वत्सनपाद् बाभ्रवसे, वत्सनपाद् काषायणसे, काषायणने सायकायनसे, सायकायनने कौशिकायनि- बाभ्रवने पन्था सौभरसे, पन्था सौभरने अयास्य आङ्गिरससे, से, कौशिकायनिने घृतकौशिकसे, घृतकौशिकने पाराशर्यायण- अयास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाष्ट्रसे, आभूति त्वाष्ट्रने विश्वरूप से, पाराशर्यायणने पाराशर्यसे, पाराशर्यने जातूकण्र्यसे, जातू- त्वाष्ट्रसे, विश्वरूप त्वाष्ट्रने अश्विनीकुमारोंसे, अश्विनीकुमारोंने कण्र्यने आसुरायणसे और यास्कसे, आसुरायणने त्रैवणिसे, दध्यङ्ङाथर्वणसे, दध्यङ्ङाथर्वणने अथर्वा दैवसे, अथर्वा दैवने त्रैवणिने औपजङ्घनिसे, औपजङ्घनिने आसुरिसे, आसुरिने मृत्यु प्राध्वंसनसे, मृत्यु प्राध्वंसनने प्रध्वंसनसे, प्रध्वंसनने भारद्वाजसे, भारद्वाजने आत्रेयसे, आत्रेयने माण्टिसे, एकर्षिसे, एकर्षिने विप्रचित्तिसे, विप्रचित्तिने व्यष्टिसे, व्यष्टिने माण्टिने गौतमसे, गौतमने गौतमसे, गौतमने वात्स्यसे, वात्स्यने सनारुसे, सनारुने सनातनसे, सनातनने सनगसे, सनगने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कैशोर्य काप्यसे, कैशोर्य काप्यने परमेष्ठीसे, परमेष्ठीने ब्रह्मासे [ यह विद्या प्राप्त की ] । ब्रह्मा कुमारहारितसे, कुमारहारितने गालवसे, गालवने विदर्भी- स्वयम्भू है; ब्रह्माको नमस्कार है ॥ १-३ ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अध्याय

ॐ पञ्चम अध्याय प्रथम ब्राह्मण आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना वह परब्रह्म पूर्ण है और यह (जगत् भी) पूर्ण [परमात्मा] है। 'जिसमें वायु रहता है, वह आकाश ही है। उस पूर्णब्रह्मसे ही यह पूर्ण उत्पन्न होता है। इस पूर्णके ख है'—ऐसा कौरव्यायणीपुत्रने कहा है। यह ओङ्कार पूर्णको निकाल लेनेपर भी पूर्ण ही बच रहता है। आकाश- वेद है—ऐसा ब्राह्मण जानते हैं, क्योंकि जो ज्ञातव्य है, ब्रह्म ॐकार है। आकाश [यहाँ जड नहीं,] सनातन उसका इसीसे ज्ञान होता है ॥ १ ॥ द्वितीय ब्राह्मण 'द-द-द' से दम-दान और दयाका उपदेश देव, मनुष्य और असुर-प्रजापतिके इन तीन पुत्रोंने पिता फिर प्रजापतिसे असुरोंने कहा—'आप हमें उपदेश प्रजापतिके यहाँ ब्रह्मचर्यवास किया। ब्रह्मचर्यवास कर चुकनेपर कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और देवोंने कहा—'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे प्रजापतिने पूछा, 'समझ गये क्या ?' असुरोंने कहा, "समझ गये, आपने 'द' यह अक्षर कहा और पूछा, 'समझ गये क्या ?' इसपर हमसे 'दया करो' ऐसा कहा है।" तब प्रजापतिने 'हाँ, समझ 'उन्होंने कहा, "समझ गये, आपने हमसे 'दमन करो' ऐसा गये' ऐसा कहा। इस प्रजापतिके अनुशासनकी मेघगर्जनारूपी कहा है।" तब प्रजापतिने कहा, 'ठीक है, तुम समझ गये' ॥१॥ दैवी वाणी आज भी द द-द—इस प्रकार अनुवाद करती है, फिर प्रजापतिसे मनुष्योंने कहा—'आप हमें उपदेश अर्थात् भोगप्रधान देवो ! इन्द्रियोंका दमन करो, सङ्ग्रहप्रधान कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और मनुष्यो ! भोगसामग्रीका दान करो, क्रोध-हिंसाप्रधान असुरो ! पूछा, 'समझ गये क्या ?' मनुष्योंने कहा, "समझ गये, आपने जीवोंपर दया करो—यों कहती है। अतः दम, दान और हमसे 'दान करो' ऐसा कहा है।" तब प्रजापतिने 'हाँ, समझ दया—इन तीनोंको सीखे ॥ ३ ॥ गये' ऐसा कहा ॥ २ ॥ तृतीय ब्राह्मण हृदयकी ब्रह्मरूपसे उपासना जो हृदय है, वह प्रजापति है। यह ब्रह्म है, यह सर्व है, बलि समर्पण करते हैं। 'द' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता यह हृदय तीन अक्षरवाला नाम है। 'हृ' यह एक अक्षर है, उसे स्वजन और अन्यजन देते हैं। 'यम्' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, उसके प्रति स्वजन और अन्यजन है। जो ऐसा जानता है, वह स्वर्गलोकको जाता है ॥ १ ॥ चतुर्थ ब्राह्मण सत्यकी ब्रह्मरूपसे उपासना वही-वह हृदय-ब्रह्म ही वह था—जो कि सत्य ही है। जो भी हो जाता है,। जो इस प्रकार इस महत्, यक्ष (पूजनीय), इस महत्, यक्ष (पूज्य), सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवालेको यह प्रथम उत्पन्न होनेवालेको 'सत्य ब्रह्म'—इस प्रकार जानता 'सत्य ब्रह्म है' ऐसा जानता है, वह इन लोकोंको जीत लेता है। है [उसे उपर्युक्त फल मिलता है], क्योंकि ब्रह्म सत्य [उसका शत्रु] उसके अधीन हो जाता है—असत् (अभावरूप) ही है ॥ १ ॥ उ० अ० ६३—

४९८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

४९८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ५ पञ्चम ब्राह्मण सत्यकी आदित्यरूपमें उपासना यह [व्यक्त जगत्] पहले आप (जल) ही था ! उस लगता है, उस समय यह इस मण्डलको शुद्ध ही देखता है। आपने सत्यकी रचना की । अतः सत्य ब्रह्म है । ब्रह्मने प्रजापति फिर ये रश्मियाँ इसके पास नहीं आतीं ॥ १-२ ॥ (विराट्) को और प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया। इस मण्डलमे जो यह पुरुष है, उसका 'भूः' यह सिर है; वे देवगण सत्यकी ही उपासना करते हैं । वह यह 'सत्य' तीन सिर एक है और यह अक्षर भी एक है । 'भुवः' यह भुजा अक्षरवाला नाम है । 'स' यह एक अक्षर है, 'ति' यह एक है, भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । 'स्वः' यह प्रतिष्ठा अक्षर है और 'यम्' यह एक अक्षर है । इनमें प्रथम और (चरण) है, प्रतिष्ठा (चरण) दो हैं और ये अक्षर भी दो अन्तिम अक्षर सत्य है और मध्यका अनृत है । वह यह अनृत हैं । 'अहर्' यह उसका उपनिषद् (गूढ नाम) है; जो ऐसा दोनों ओरसे सत्यसे परिगृहीत है । इसलिये यह सत्य-बहुल ही जानता है, वह पापको मारता है और उसे त्याग देता है। जो है । इस प्रकार जाननेवालेको अनृत नहीं मारता । वह जो सत्य यह दक्षिण नेत्रमे पुरुष है, उसका 'भूः' यह सिर है, सिर है, सो यह आदित्य है । जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है एक है और यह अक्षर भी एक है। 'भुवः' यह भुजा है; और जो भी यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वे ये दोनों पुरुष भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । 'स्वः' यह प्रतिष्ठा है, एक दूसरेमें प्रतिष्ठित हैं । आदित्य रश्मियोंके द्वारा चाक्षुष प्रतिष्ठा (चरण) दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं। 'अहम्' पुरुषमें प्रतिष्ठित है और चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा उसमें यह उसका उपनिषद् (गूढ नाम) है, जो ऐसा जानता है, प्रतिष्ठित है । जिस समय यह (चाक्षुष पुरुष) उत्क्रमण करने वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ३-४ ॥ षष्ठ ब्राह्मण मनोमय पुरुषकी उपासना प्रकाश ही जिसका सत्य (स्वरूप) है, ऐसा यह है । वह यह सबका स्वामी और सबका अधिपति है; पुरुष मनोमय है । वह उस अन्तर्हृदयमें जैसा व्रीहि तथा यह जो कुछ है, सभीका प्रकर्षतया शासन करता (धान) या यव (जौ) होता है, उतने ही परिमाणवाला है ॥ १ ॥ सप्तम ब्राह्मण विद्युत्की ब्रह्मरूपमें उपासना विद्युत् ब्रह्म है-ऐसा कहते हैं । विदान (खण्डन या जानता है, वह इस आत्माके प्रतिकूलभूत पापोंका नाश कर विनाश) करनेके कारण विद्युत् है । जो 'विद्युत् ब्रह्म है' ऐसा देता है, क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है ॥ १ ॥ अष्टम ब्राह्मण वाक्की धेनुरूपमें उपासना वाक्रूप धेनुकी उपासना करे । उसके चार स्तन देवगण हैं, हन्तकारके भोक्ता मनुष्य हैं और स्वधाकारके / हैं-स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार । पितृगण । उस धेनुका प्राण वृषभ है और मन उसके दो स्तन स्वाहाकार और वषट्कारके भोक्ता बछड़ा है ॥ १ ॥ नवम ब्राह्मण अन्तरस्थ वैश्वानर अग्नि जो यह पुरुषके भीतर है, यह अग्नि वैश्वानर जिसे पुरुष कानोंको मूँदकर सुनता \ है । जिस समय है, जिससे कि यह अन्न; जो कि भक्षण किया जाता पुरुष उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको है, पकाया जाता है । उसीका यह घोष होता है, नहीं सुनता ॥ १ ॥

दशम ब्राह्मण

ब्राह्मण १३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४९९ दशम ब्राह्मण मरणोत्तर ऊर्ध्वगतिका वर्णन जिस समय यह पुरुष इस लोकसे मरकर जाता है, उस होता है । उसमें होकर वह ऊपरकी ओर चढता है । वह समय वह वायुको प्राप्त होता है । वहाँ वह वायु उसके लिये चन्द्रलोकमें पहुँच जाता है । वहाँ चन्द्रमा भी उसके लिये छिद्रयुक्त हो जाता—मार्ग दे देता है, जैसा कि रथके पहियेका छिद्रयुक्त हो मार्ग देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र होता है । छिद्र होता है । उसके द्वारा वह ऊर्ध्व होकर चढता है । वह उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढता है । वह अशोक (शारीरिक सूर्यलोकमें पहुँच जाता है। वहाँ सूर्य उसके लिये वैसा ही दुःखसे रहित ) और अधिम ( मानसिक दुःखशून्य ) लोकमें छिद्ररूप मार्ग देता है, जैसा कि लम्बर नामके बाजेका छिद्र पहुँच जाता है और उसमें सदा—अनन्त कालतक अर्थात् ब्रह्माके अनेक कल्पोंतक निवास करता है ॥ १ ॥ एकादश ब्राह्मण व्याधिमें और मृत पुरुषके श्मशान-गमन आदिमें तपकी फल व्याधियुक्त पुरुषको जो ताप होता है, वह निश्चय जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है । मरे ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम हुए मनुष्यको सब प्रकार जो अग्निमें रखते हैं, यह लोकको ही जीत लेता है । मृत पुरुषको जो वनको निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम ले जाते हैं, यह निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा लोकको ही जीत लेता है ॥ १ ॥

द्वादश अन्न एवं प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना कोई कहते हैं कि अन्न ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है। सकता है और न अशुभ ही । ]' पिताने हाथसे निवारण करते हुए क्योंकि प्राणके बिना अन्न सड़ जाता है । कोई कहते हैं— कहा—'प्रातृद ! ऐसा मत कहो। इन दोनोंकी एकरूपताको प्राण ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है । क्योंकि अन्नके बिना प्राप्त होकर कौन परमताको प्राप्त होता है ?' अतः उससे उस प्राण सूख जाता है । परंतु ये दोनों देव एकरूपताको प्राप्त ( प्रातृदके पिता ) ने 'वि' ऐसा कहा । 'वि' यही अन्न है । होकर परम भावको प्राप्त होते हैं—ऐसा निश्चयकर प्रातृद वि-रूप अन्नमें ही ये सब भूत प्रविष्ट हैं । 'रम्' यह प्राण है, स्ट्रपिने अपने पितासे कहा था—'इस प्रकार जाननेवालेका क्योंकि र अर्थात् प्राणमें ही ये सब भूत रमण करते हैं । मैं क्या शुभ करूँ अथवा क्या अशुभ करूँ ? [ क्योंकि जो ऐसा जानता है, उसमें ये सब भूत प्रविष्ट होते हैं और कृतकृत्य हो जानेके कारण उसका तो न कोई शुभ किया जा सभी भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥

त्रयोदश प्राणकी विविध रूपोंमें उपासना 'उक्थ' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । प्राण ही सलोकताको प्राप्त होता है । 'साम' इस प्रकार प्राणकी उपासना उक्थ है, क्योंकि प्राण ही सब इन्द्रियोंको उत्थापित करता है । करे । प्राण ही साम है, क्योंकि प्राणमें ही ये सब भूत सुसङ्गत इस उपासकसे उक्थवेत्ता पुत्र उत्पन्न होता है । जो ऐसी होते हैं । समस्त भूत उसके लिये सुसङ्गत होते हैं, तथा उपासना करता है, वह प्राणके सायुज्य और सालोक्यको उसकी श्रेष्ठतामें कारण होते हैं । जो इस प्रकार उपासना प्राप्त करता है । 'यजुः' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । करता है, वह सामके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता प्राण ही यजु है, क्योंकि प्राणमें ही इन सब भूतोंका योग होता है । प्राण 'क्षत्र' है—इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । प्राण है । सम्पूर्ण भूत इसकी श्रेष्ठताके कारण इससे संयुक्त होते हैं । ही क्षत्र है । प्राण ही क्षत्र है—यह प्रसिद्ध है । प्राण इस जो ऐसी उपासना करता है, वह यजुके सायुज्य और

चतुर्दश ब्राह्मण

५०० - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ ५ देहनी शस्त्रादिजनित क्षतसे रक्षा करता है। अनन्य-जन्य किसीसे त्राण न पानेवाले क्षत्र (प्राण) को प्राप्त होता है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह क्षत्रके सायुज्य और सलोकताको जीत (प्राप्त कर) लेना है ॥ १-४॥ चतुर्दश ब्राह्मण गायत्री-उपासना 'भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौ'—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (प्रथम) पाद है। यह (भूमि आदि) ही इस गायत्रीका प्रथम पाद है। इस प्रकार इसके इस पदको जो जानता है वह इस त्रिलोकीमें जितना कुछ है, उस सबको जीत (प्राप्त कर) लेता है। 'ऋचः यजूंषि, सामानि'—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (द्वितीय) पाद है। यह (ऋक् आदि) ही इस गायत्रीका द्वितीय पाद है। जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है वह जितनी यह त्रयीविद्या है (अर्थात् त्रयीविद्या- का जितना फल है,) उस सभीको जीत लेता है। प्राण, अपान, व्यान—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाल ही गायत्रीका एक (तृतीय) पाद है। यह प्राणादि ही इस गायत्रीका 'तृतीय' पाद है। जो गायत्रीके इस पदको इस प्रकार जानता है, वह जितना यह प्राणिसमुदाय है, सबको जीत लेता है। और यह जो तप्ता (प्रकाशित होता) है वही इसका तुरीय, दर्शत, परोरजा पद है। जो चतुर्थ होता है, वही 'तुरीय कहलाता है। 'दर्शत पदम्' इसका अर्थ है-मानो [यह आदित्मण्डलस्थ पुरुष] दीखता है। 'परोरजा इसका अर्थ है-यह सभी रज (यानी लोको) के ऊपर-ऊपर रहकर प्रकाशित होता है। जो गायत्री- के इस चतुर्थ पदको इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार शोभा और कीर्तिसे प्रकाशित होता है। वह यह गायत्री इस चतुर्थ दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है। वह पद सत्यमें प्रतिष्ठित है। चक्षु ही सत्य है चक्षु ही सत्य है—यह प्रसिद्ध है। इसीसे यदि दो पुरुष 'मैंने देखा है' 'मैंने सुना है' इस प्रकार विवाद करते हुए आयें तो जो यह कहता होगा कि 'मैंने देखा है' उसीका हमे विश्वास होगा। वह तुरीय पादका आश्रयभूत सत्य बलमें प्रतिष्ठित है। प्राण ही बल है, वह सत्य प्राणमें प्रतिष्ठित है। इसीसे कहते हैं कि सत्यकी अपेक्षा बल ओजस्वी है। इस प्रकार यह गायत्री अध्यात्म प्राणमे प्रतिष्ठित है। इस पूर्वोक्त गायत्रीने गयोंका त्राण किया था। प्राण ही गय हैं, उन प्राणोंका इसने त्राण किया। इसने गयोंका त्राण किया था, इसीसे इसका 'गायत्री' नाम हुआ। आचार्यने आठ वर्षके बटुके प्रति उपनयनके समय जिस सावित्रीका उपदेश किया था, वह यही है। वह जिस जिस बटुको इसका उपदेश करता है वह उसके-उसके प्राणोंकी रक्षा करती है ॥ १-४ ॥ कोई शाखावाले इस पूर्वोक्त अनुष्टुप् छन्दवाली सावित्रीका उपदेश करते हैं (गायत्रीछन्दवाली सावित्रीका उपदेश न करके अनुष्टुप्छन्दकी सावित्रीका उपदेश करते हैं)। वे कहते हैं कि वाक् अनुष्टुप् है, इसलिये हम वाक्का ही उपदेश करते हैं। किंतु ऐसा नहीं करना चाहिये। गायत्रीछन्दवाली सावित्री- का ही उपदेश करे। ऐसा जाननेवाला जो बहुत सा भी प्रतिग्रह करे तो भी वह गायत्रीके एक पदके बराबर भी नहीं हो सकता ॥ ५ ॥ जो इन तीन पूर्ण लोकोंका प्रतिग्रह करता है, उसका वह (प्रतिग्रह) इस गायत्रीके इस प्रथम पादसे व्याप्त करता है। और जितनी यह त्रयीविद्या है, उसका जो प्रतिग्रह करता है, वह (प्रतिग्रह) इसके इस द्वितीय पादने व्याप्त करता है। और जितने ये प्राणी हैं, उनका जो प्रतिग्रह करता है, वह (प्रतिग्रह) इसके इस तृतीय पदको व्याप्त करता है। और यही इसका तुरीय दर्शत परोरजा पद है, जो कि यह तरता है; यह किसीके द्वारा प्राप्य नहीं है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कोई कहाँसे कर सकता है? ॥ ६ ॥ उस गायत्रीका उपस्थान— हे गायत्रि ! तू [ त्रैलोक्यरूप प्रथम पादसे ] एकपदी है, [ तीनों वेदरूप द्वितीय पादसे ] द्विपदी है, [ प्राण, अपान और व्यानरूप तीसरे पादसे ] त्रिपदी है [ और तुरीय पादसे ] चतुष्पदी है। [ इन सबसे परे निरुपाधिक स्वरूपसे तू ] अपद है, क्योकि तू जानी नहीं जाती। अतः व्यवहारके अविषयभूत एव समस्त लोकोंसे ऊपर विराज- मान तेरे दर्शनीय तुरीय पदको नमस्कार है। यह पादरूपी शत्रु १. अनुष्टुप्छन्द चार पादोंका होता है और गायत्रीछन्द तीन पादोंका। दोनोंके पाद आठ-आठ अक्षरके ही होते हैं। अनुष्टुप्छन्दमें जो मन्त्र उपलब्ध होता है, उसका भी देवता सविता ही है, इसलिये कुछ लोग उसे ही सावित्री कहते हैं। अनुष्टुप्छन्दवाला मन्त्र इस प्रकार है— 'तत्संवितुर्वृणीमहे वय देवस्य भोजनम् । श्रेष्ठ सर्वधानम तुरं भाम धीमहि।'

१५] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०१ इस [ विश्वाचरणरूप ] कार्यमें सफलता नहीं प्राप्त करे । इस कहा था, तो फिर [ प्रतिग्रहके दोषसे ] हाथी होकर भार क्यों प्रकार यह (विद्वान् ) जिससे द्वेष करता हो, 'उसकी कामना ढोता है ?' इसपर उसने 'सम्राट् ! मे इसका मुख ही नहीं पूर्ण न हो' ऐसा कहकर उपस्थान करे । जिसके लिये इस जानता था' ऐसा कहा । [ तब जनकने कहा-] 'इसका प्रकार उपस्थान किया जाता है, उसकी कामना पूर्ण नहीं होती । अग्नि ही मुख है। यदि अग्निमे लोग बहुत-सा ईंधन रख दें अथवा 'मैं इस वस्तुको प्राप्त करूँ' ऐसी कामनासे उपस्थान तो वह उस सभीको जला डालता है। इसी प्रकार ऐसा जानने- करे ॥ ७ ॥ वाला बहुत सा पाप करता रहा हो, तो भी वह उस सबको उस विदेह जनकने बुडिल अश्वतराश्विसे यही बात कही भक्षण करके शुद्ध, पवित्र, अजर, अमर हो जाता है ॥ ८ ॥ थी कि 'तूने जो अपनेको गायत्रीविद् (गायत्री तत्त्वका ज्ञाता) पञ्चदश ब्राह्मण अन्तसमयकी प्रार्थना हे सबका भरण-पोषण करनेवाले परमेश्वर ! आप सत्य- इन्द्रियाँ अविनाशी समष्टि वायुतत्त्वमें [ प्रविष्ट हो जायँ ], यह स्वरूप सर्वेश्वरका श्रीमुख ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलरूप पात्रसे ढका स्थूलशरीर अग्निमे जलकर भस्मरूप [ हो जाय ] । हे हुआ है । आपकी भक्तिरूप सत्यधर्मका अनुष्ठान करनेवाले सच्चिदानन्दघन यज्ञमय भगवन् ! [ आप मुझ भक्तका ] स्मरण मुझको अपने दर्शन करानेके लिये आप उस आवरणको हटा करें, मेरे द्वारा किये हुए (भक्तिरूप ) कर्मोंका स्मरण करें । लीजिये । हे भक्तोंका पोषण करनेवाले ! मुख्य ज्ञानस्वरूप ! हे यज्ञमय भगवन् ! [ आप मुझ भक्तको ] स्मरण करें, सबके नियन्ता ! भक्तों और ज्ञानियोंके परम लक्ष्य ! प्रजापतिके (मेरे) कर्मोंको स्मरण करें । हे अग्नि ! (अग्निके अधिष्ठातृ प्रिय ! इन रश्मियोंको एकत्र कीजिये-हटा लीजिये, इस देवता ) हमें परम वनरूप परमेश्वरकी सेवामें पहुँचानेके लिये तेजको समेट लीजिये । आपका जो अतिशय कल्याणमय सुन्दर शुभ (उत्तरायण) मार्गसे ले चलिये । हे देव ! दिव्यस्वरूप है, उसको मै आपकी कृपासे [ ध्यानके द्वारा ] [ आप हमारे ] सम्पूर्ण कर्मोंको जाननेवाले हैं, अतः हमारे इस देख रहा हूँ। वह जो (सूर्यका आत्मा) है, वह परम पुरुष मार्गके प्रतिबन्धक पापको दूर कर दीजिये । आपको हम [ आपका स्वरूप है, ] वही मैं भी हूँ। अब ये प्राण और बार-बार नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥ - ॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥

षष्ठ अध्याय

ॐ षष्ठ अध्याय प्रथम ब्राह्मण प्राणकी सर्वश्रेष्ठता

जो कोई ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है, वह अपने ज्ञातजनोंमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है । प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो ऐसी उपासना करता है, वह अपने ज्ञातजनोंमे तथा और जिनमें होना चाहता है, उनमें भी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। जो वसिष्ठको जानता है, वह स्वजनोमे वसिष्ठ होता है। वाक् ही वसिष्ठा है। जो ऐसी उपासना करता है, वह स्वजनों- में तथा और जिनमें चाहता है, उनमे वसिष्ठ होता है। जो प्रतिष्ठाको जानता है, वह समान देश कालमें प्रतिष्ठित होता है और दुर्गममे भी प्रतिष्ठित होता है । चक्षु ही प्रतिष्ठा है। चक्षुसे ही समान और दुर्गम देश कालमे प्रतिष्ठित होता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह समान और दुर्गममें प्रतिष्ठित होता है। जो सम्पद्‌को जानता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है। श्रोत्र ही सम्पद् है। श्रोत्रमें ही ये सब वेद सब प्रकार निष्पन्न हैं। जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे सम्यक् प्रकारसे प्राप्त हो जाता है। जो आयतनको जानता है, वह स्वजनोंका आयतन (आश्रय) होता है तथा अन्य जनोका भी आयतन होता है। मन ही आयतन है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह स्वजनोका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है। जो भी प्रजातिको जानता है, वह प्रजा-सन्तान और पशुओंद्वारा प्रजात (वृद्धिको प्राप्त) होता है। रेतस् ही प्रजाति है। जो ऐसा जानता है, वह प्रजा और पशुओंद्वारा प्रजात होता है ॥ १-६ ॥ ये पूर्वोक्त प्राण (इन्द्रिय, मन आदि) 'मैं श्रेष्ठ हूँ' 'मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार विवाद करते हुए ब्रह्माके पास गये। उससे बोले, 'हममें कौन वसिष्ठ है?' उसने कहा, 'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर (शरीरसे पृथक् हो जानेपर) यह शरीर अपनेको अधिक पापी मानता है, वही तुममें वसिष्ठ है' ॥ ७ ॥ [पहले] वाक्‌ने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके थे?' यह सुनकर उन्होंने कहा, 'जैसे गूंगे मनुष्य वाणीसे न बोलते हुए भी प्राणसे प्राणक्रिया करते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतससे प्रजा (सन्तान) की उत्पत्ति करते हुए [जीवित रहते हैं,] वैसे ही हम जीवित रहे।' यह सुनकर वाक्ने शरीरमें प्रवेश किया। चक्षुने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले—'जिस प्रकार अन्धे लोग नेत्रसे न देखते हुए प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, श्रोत्रसे सुनते, मनसे जानते और रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं,] उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर चक्षुने प्रवेश किया। श्रोत्रने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले—'जिस प्रकार बहरे आदमी कानोंसे न सुनते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, मनसे जानते और रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं,] उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर श्रोत्रने प्रवेश किया। मनने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार मुग्ध पुरुष मनसे न समझते हुए भी प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न करते हुए [जीवित रहते हैं,] उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर मनने शरीरमे प्रवेश किया। रेतसने उत्क्रमण किया। उसने एक वर्ष बाहर रहकर फिर लौटकर कहा, 'तुम मेरे बिना कैसे जीवित रह सके थे?' वे बोले, 'जिस प्रकार नपुंसकलोग रेतस्‌से प्रजा उत्पन्न न करते हुए प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते, श्रोत्रसे सुनते और मनसे जानते हुए [जीवित रहते हैं,] उसी प्रकार हम जीवित रहे।' यह सुनकर वीर्यने शरीरमें प्रवेश किया। फिर प्राण उत्क्रमण करने लगा तो जिस प्रकार सिन्धुदेशीय महान् अश्व पैर बाँधनेके खूँटोंको उखाड़ डालता है, उसी प्रकार वह इन सब प्राणों (इन्द्रियों) को स्थानच्युत करने लगा। उन्होंने कहा, 'भगवन् ! आप उत्क्रमण न करें, आपके बिना हम जीवित नहीं रह सकते।' प्राणने कहा, 'अच्छा, तो

ब्राह्मण २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५०३

ब्राह्मण २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०३ मुझे बलि ( भेंट ) दिया करो।' [इन्द्रियोंने कहा—] 'बहुत अच्छा' ॥ ८–१३ ॥ उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस वसिष्ठगुणसे युक्त हो।' 'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस प्रतिष्ठासे युक्त हो' ऐसा नेत्रने कहा। 'मैं जो समृद्ध हूँ, सो तुम ही उस समृद्धिसे युक्त हो' ऐसा श्रोत्रने कहा। 'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं वह आयतन हो' ऐसा मनने कहा। 'मैं जो प्रजाति हूँ, सो तुम ही उस प्रजातिसे युक्त हो' ऐसा रेतस्ने कहा। [ प्राणने कहा-] 'किंतु ऐसे गुणोंसे युक्त मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है ?' [ वागादि बोले-] 'कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गोंसे लेकर यह जो कुछ भी है, वह सब तुम्हारा अन्न है और जल ही वस्त्र है।' [ उपासनाका फल-] 'जो इस प्रकार प्राणके अन्नको जानता है, उसके द्वारा अभक्ष्य-भक्षण नहीं होता और अभक्ष्यका प्रतिग्रह (संग्रह) भी नहीं होता। ऐसा जाननेवाले श्रोत्रिय भोजन करनेसे पूर्व आचमन करते हैं तथा भोजन करके आचमन करते हैं। इसीको वे उस प्राणको अनग्न (वस्त्रयुक्त) करना मानते हैं' ॥ १४ ॥ द्वितीय ब्राह्मण पञ्चाग्निविद्या और उसे जाननेका फल; त्रिविध गतिका वर्णन प्रसिद्ध है कि आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चालोंकी सभामें आया । वह जीवलके पुत्र प्रवाहणके पास पहुँचा, जो [ सेवकोंसे] परिचर्या करा रहा था। उसे देखकर प्रवाहणने कहा, 'ओ कुमार !' वह बोला, 'जी !' [ प्रवाहण-] 'क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है ?' तब श्वेतकेतुने 'हाँ !' ऐसा उत्तर दिया ॥ १ ॥ 'जिस प्रकार मरनेपर यह प्रजा विभिन्न मागोंसे जाती है— सो क्या तू जानता है ?' श्वेतकेतु बोला, 'नहीं !' [राजा-] 'जिस प्रकार वह पुनः इस लोकमें आती है—सो क्या तुझे मालूम है ?' 'नहीं,' ऐसा श्वेतकेतुने उत्तर दिया। [राजा-] 'इस प्रकार पुनः-पुनः बहुतोंके मरकर जानेपर भी जिस प्रकार वह लोक भरता नहीं है—सो क्या तू जानता है ?' 'नहीं,' ऐसा उसने कहा । [ राजा-] 'क्या तू जानता है कि कितने बारकी आहुतिके हवन करनेपर आप (जल) पुरुष-शब्दवाच्य हो उठकर बोलने लगता है ?' 'नहीं,' ऐसा श्वेतकेतुने कहा। 'क्या तू देवयानमार्गका कर्मरूप साधन अथवा पितृयानका कर्मरूप साधन जानता है, जिसे करके लोग देवयानमार्गको प्राप्त होते हैं अथवा पितृयानमार्गको ? हमने तो मन्त्रका यह वचन सुना है—मैंने पितरोंका और देवोंका, इस प्रकार दो मार्ग सुने हैं, ये दोनों मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले मार्ग हैं। इन दोनों मागोंसे जानेवाला जगत् सम्यक् प्रकारसे जाता है। तथा ये मार्ग [ द्युलोक और पृथिवीरूप ] पिता और माताके मध्यमें हैं।' इसपर श्वेतकेतुने 'मैं इनमेंसे एक भी नहीं जानता,' ऐसा उत्तर दिया ॥ २ ॥ फिर राजाने श्वेतकेतुसे ठहरनेके लिये प्रार्थना की। किंतु वह कुमार ठहरनेकी परवा न करके चल दिया। वह सीधा अपने पिताके पास आया और उससे बोला, 'आपने यही कहा था न कि मुझे सब विषयोंकी शिक्षा दे दी गयी है ?' [ पिता-] 'हे सुन्दर धारणाशक्तिवाले ! क्या हुआ ?' [ पुत्र-] 'मुझसे एक क्षत्रियबन्धुने पाँच प्रश्न पूछे थे, उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता।' [ पिता-] 'वे कौन-से थे ?' [ पुत्र-] 'ये ये' ऐसा कहकर उसने उन प्रश्नोंके प्रतीक बतलाये ॥ ३ ॥ पिताने कहा, 'हे तात ! तू हमारे कथनानुसार ऐसा समझ कि हम जो कुछ जानते थे, वह सब हमने तुझसे कह दिया था। अब हम दोनों वहीं चलें और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उसके यहाँ निवास करेंगे।' [ पुत्र-] 'आप ही जाइये।' तब वह गौतम जहाँ जैवलि प्रवाहणकी बैठक थी, वहाँ आया। उसके लिये आसन लाकर राजाने जल मँगवाया और उसे अर्घ्यदान किया। फिर बोला, 'मैं पूज्य गौतमको वर देता हूँ।' (आप जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हैं, वह बतलाइये। मैं उसकी पूर्ति करूँगा।) उसने कहा, 'आपने मुझे जो वर देनेके लिये प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आपने कुमारसे जो बात पूछी थी, वह मुझसे कहिये।' उसने कहा, 'गौतम ! वह वर तो दैव वरोंमेंसे है, तुम मनुष्यसम्बन्धी वरोंमेंसे कोई वर माँगो' ॥ ४-६ ॥ गौतमने कहा, 'आप जानते हैं, वह तो मेरे पास है। मुझे सुवर्ण तथा गौ, अश्व, दासी, परिवार और वस्त्र भी प्राप्त है । आप महान्, अनन्त और निःसीम धनके दाता होकर मेरे लिये अदाता न हों।' [ राजा-]

५०४ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ६ 'तो गौतम ! तुम शास्त्रोक्त विधिसे उसे पानेकी इच्छा करो।' [ गौतम— ] 'अच्छा, मैं आपके प्रति शिष्यभावसे उपसन्न ( प्राप्त ) होता हूँ। पहले ब्राह्मणलोग वाणीसे ही क्षत्रियादिके प्रति उपसन्न होते रहे हैं।' इस प्रकार उपसत्तिका वाणीसे कथनमात्र करके गौतम वहाँ रहने लगा [ सेवा आदिके द्वारा नहीं ]। उस राजाने कहा, 'गौतम ! जिस प्रकार तुम्हारे पितामहोंने हमारे पूर्वजोंका अपराध नहीं माना, उसी प्रकार तुम भी हमारा अपराध न मानना। इससे पूर्व यह विद्या किसी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही। उसे मैं तुम्हारे ही प्रति कहता हूँ। भला, इस प्रकार विनयपूर्वक बोलनेवाले तुमको निषेध करनेमें (विद्या देनेसे अस्वीकार करनेमें ) कौन समर्थ हो सकता है ?' ॥ ७-८ ॥ गौतम ! वह लोक ( द्युलोक ) ही अग्नि है। उसका आदित्य ही समिध् ( ईंधन ) है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गार हे, अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग ( चिनगारियाँ ) हैं। उस इस अग्निमे देवगण श्रद्धाको हवन करते हैं, उस आहुतिसे सोम राजा होता है। गौतम ! पर्जन्य- देवता ही अग्नि है। उसका संवत्सर ही समिध् है, बादल धूम हैं, विद्युत् ज्वाला है, अशनि ( इन्द्रका वज्र ) अङ्गार है, मेघ- गर्जन विस्फुलिङ्ग है। उस इस अग्निमें देवगण सोम राजाको हवन करते हैं। उस आहुतिसे वृष्टि होती है। गौतम ! यह लोक ही अग्नि है। इसकी पृथिवी ही समिध् है, अग्नि धूम है, रात्रि ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवता वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न होता है। गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसका खुला हुआ मुख ही समिध् है, प्राण धूम है, वाक् ज्वाला है, नेत्र अङ्गार हैं, श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवगण अन्नको होमते हैं। उस आहुतिसे वीर्य होता है। गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उपस्थ ही उसकी समिध् है, लोम धूम हैं, योनि ज्वाला है, जो मैथुनव्यापार है वह अङ्गार है, आनन्दलेश विस्फुलिङ्ग है। उस इस अग्निमे देवगण वीर्य होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है। वह जीवित रहता है। जबतक कर्मशेष रहते हैं, वह जीवित रहता है, और जब मरता है, तब उसे अग्निके पास ले जाते हैं। उस ( आहुतिभूत पुरुष ) का अग्नि ही अग्नि होता है, समिध् समिध् होती है, धूम धूम होता है, ज्वाला ज्वाला होती है, अँगारे अङ्गार होते हैं और विस्फुलिङ्ग विस्फुलिङ्ग होते हैं। उस इस अग्निमे देवगण पुरुषको होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष अत्यन्त दीप्तिमान् हो जाता है ॥ ९-१४ ॥ वे जो [ गृहस्थ ] इस प्रकार इस ( पञ्चाग्निविद्या ) को जानते है तथा जो [ सन्न्यासी या वानप्रस्थ ] वनमें श्रद्धायुक्त होकर सत्य ( सगुण ब्रह्म ) की उपासना करते हैं, वे ज्योतिके अभिमानी देवताओको प्राप्त होते हैं, ज्योतिके अभिमानी देवताओंसे दिनके अभिमानी देवताको, दिनके अभिमानी देवतासे शुक्लपक्षाभिमानी देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे जिन छः महीनोंमे सूर्य उत्तरकी ओर रहकर चलता है, उन उत्तरायणके छः महीनोंके अभिमानी देवताओंको [ प्राप्त होते हैं ]; पण्मासाभिमानी देवताओंसे देवलोकको, देवलोकसे आदित्यको और आदित्य- से विद्युत्सम्बन्धी देवताओंको प्राप्त होते हैं। उन वैद्युत देवोंके पास एक मानस पुरुष आकर इन्हें ब्रह्मलोकोंमें ले जाता है। वे उन ब्रह्मलोकोंमें अनन्त संवत्सरपर्यन्त रहकर [ भगवान्- को प्राप्त हो जाते ] हैं। उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती ॥१५॥ और जो [ सकाम ] यज्ञ, दान, तपके द्वारा लोकोंको जीतते हैं, वे धूम ( धूमाभिमानी देवता ) को प्राप्त होते हैं, धूमसे रात्रिदेवताको, रात्रिसे अपक्षीयमाणपक्ष ( कृष्णपक्षाभिमानी देवता ) को, अपक्षीयमाणपक्षसे जिन छः महीनोमे सूर्य दक्षिणकी ओर होकर जाता है, उन छः मासके देवताओंको, छः मासके देवताओंसे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। चन्द्रमामे पहुँचकर वे अन्न हो जाते हैं। वहाँ जैसे ऋत्विक्गण सोम राजाको 'आप्यायस्व-अपक्षीयस्व' ऐसा कहकर चमसे भरकर पी जाते हैं, उसी प्रकार इन्हे देवगण भक्षण कर जाते हैं। जब उनके कर्म क्षीण हो जाते है तो वे इस आकाशको ही प्राप्त होते हैं। आकाशसे वायुको, वायुसे वृष्टिको और वृष्टिसे पृथिवीको प्राप्त होते हैं। पृथिवीको प्राप्त होकर वे अन्न हो जाते हैं। फिर वे पुरुषरूप अग्निमे हवन किये जाते हैं। उससे वे लोकके प्रति उत्थान करनेवाले होकर स्त्रीरूप अग्निमे उत्पन्न होते हैं। वे इसी प्रकार पुनः-पुनः परिवर्तित होते रहते हैं और जो इन दोनों मागोंको नहीं जानते, वे कीट, पतग और डाँस मच्छर आदि होते हे ॥ १६ ॥

तृतीय ब्राह्मण

३] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०५ तृतीय ब्राह्मण मन्थविद्या और उसकी परम्परा

जो ऐसा चाहता हो कि मैं महत्त्व प्राप्त करूँ, वह उत्तरायणमें शुक्लपक्षकी पुण्य तिथिपर बारह दिन उपसद्व्रती (पयोव्रती) होकर गूलरकी लकड़ीके कस (कटोरे) या चमस- में सर्वौषध, फल तथा अन्य सामग्रियोंको एकत्रितकर, [जहाँ हवन करना हो, उस स्थानका] परिसमूहन* एव परिलेपन† करके अग्निस्थापन करता है और फिर अग्निके चारों ओर कुशा बिछाकर शास्त्रोक्त विधिसे घृतका शोधन करके, जिसका नाम पुँल्लिङ्ग हो उस [हस्त आदि] नक्षत्रमें मन्थको (औषध-फल आदिके पिण्डको) [अपने और अग्निके] बीचमें रखकर हवन करता है। [ 'यावन्तो' इत्यादि प्रथम मन्त्रका अर्थ—] हे जातवेदः ! तेरे वशवर्ती जितने देवता वक्रमति होकर पुरुषकी कामनाओंका प्रतिबन्ध करते हैं, उनके उद्देश्यसे यह आज्यभाग मैं तुझमें हवन करता हूँ। वे तृप्त होकर मुझे समस्त कामनाओंसे तृप्त करें—स्वाहा‡ । [ 'या तिरश्ची' इत्यादि द्वितीय मन्त्रका अर्थ—] 'मैं संवकी मृत्युको धारण करनेवाला हूँ' ऐसा समझकर जो कुटिलमति देवता तेरा आश्रय करके रहता है, सब साधनों- की पूर्ति करनेवाले उस देवताके लिये मे घृतकी धारासे यजन करता हूँ—स्वाहा ॥ १ ॥ 'ज्येष्ठाय स्वाहा, श्रेष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निर्म हवन करके सस्रवको (स्रुवामे बचे हुए घृतको) मन्थम डाल देता है। 'प्राणाय स्वाहा, वसिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थम डाल देता है। 'वाचे स्वाहा, प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'चक्षुषे स्वाहा, सम्मदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमं डाल देता है। 'श्रोत्राय स्वाहा, आयतनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थम डाल देता है। 'मनसे स्वाहा, प्रजात्यै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'रेतसे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थर्म डाल देता है ॥ २ ॥ 'अग्नये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमे डाल देता है। 'सोमाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें

हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'भुवः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'स्वः स्वाहा' इम मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमे डाल देता है। 'भूर्भुवः स्वः म्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमे टाल देता है। 'ब्रह्मणे स्वाहा' इम मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमे डाल देता है। 'क्षत्राय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूताय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भविष्यते स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'विश्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'सर्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'प्रजापतये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है ॥ ३ ॥ इसके पश्चात् उस मन्थको 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रद्वारा स्पर्श करता है। [मन्थद्रव्यका अधिष्ठातृदेव प्राण है, इसलिये प्राणसे एकरूप होनेके कारण वह सर्वात्मक है। 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—] तू [ प्राण- रूपसे सम्पूर्ण देहोंमें ] घूमनेवाला है, [ अग्निरूपसे सर्वत्र ] प्रज्वलित होनेवाला है, [ ब्रह्मरूपसे ] पूर्ण है, [ आकाश- रूपसे ] अत्यन्त स्तब्ध ( निष्कम्प ) है, [ सबसे अविरोधी होनेके कारण ] तू यह जगद्रूप एक सभाके समान है, तू ही [ यज्ञके आरम्भमे प्रस्तोताके द्वारा ] हिङ्कृत है, तथा [ उच्चै प्रस्तोताद्वारा यज्ञमे ] तू ही हिङ्क्रियमाण है, [ यज्ञारम्भमें उद्गाताद्वारा ] तू ही उच्च स्वरसे गाया जानेवाला उद्गीथ है और [ यज्ञके मध्यमें उसके द्वारा ] तू ही उद्गीयमान है। तू ही [ अध्वर्युद्वारा ] श्रावित और [ आग्नीध्रद्वारा ] प्रत्याश्रावित हे; आर्द्र (अर्थात् मेघ) में सम्यक् प्रकारसे दीप्त है, तू विभु (विविधरूप होनेवाला) है और प्रभु (समर्थ) है; तू [भोक्ता अग्निरूपसे] ज्योति है, [कारणरूपसे ] सबका प्रलयस्थान है तथा [ सबका सहार करनेवाला होनेसे ] सर्वगं है ॥ ४ ॥ फिर 'आम५सि आमन्धि' इत्यादि मन्त्रसे इसे ऊपर उठाता हे । [ इस मन्त्रका अर्थ—] 'आमंसि'—तू मब जानता है,

  • कुशोसे बुहारना । † गोबर और जलसे वेदीको लीपना । ‡ जहाँ-जहाँ 'स्वाहा' आये, वहाँ आहुति देनी चाहिये । उ० अ० ६४—

५०६ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ६ 'आर्माहि ते महि'—मैं तेरी महिमाको अच्छी तरह जानता उस इस मन्थका उद्दालक आरुणिने अपने शिष्य हूँ । वह प्राण राजा, ईशान ( ईश्वर ) और अधिपति है । वाजसनेय याज्ञवल्क्यको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई वह मुझे राजा, ईशान और अधिपति करे ॥ ५ ॥ इस मन्थको सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न इसके पश्चात् 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' इत्यादि मन्त्रसे इस हो जायँगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका मन्थको भक्षण करता है । [ 'तत्सवितुः' इत्यादि मन्त्रका वाजसनेय याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य मधुक पैङ्ग्यको उपदेश अर्थ—] 'तत्सवितुर्वरेण्यम्'—सूर्यके उस वरेण्य-श्रेष्ठ पदका करके कहा था, यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें मैं ध्यान करता हूँ । 'वाता मधु ऋतायते'—पवन मधुर, शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस मन्द गतिसे बह रहा है। 'सिन्धवः मधु क्षरन्ति'—नदियों इस मन्थका मधुक पैङ्ग्यने अपने शिष्य चूल भागवित्ति को मधु-रसका स्राव कर रही हैं। 'नः ओषधीः माध्वीः सन्तु'— उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा हमारे लिये ओषधियाँ मधुर हों । 'भूः स्वाहा' [ यहाँतक- तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पत्ते निकल आवेंगे।' के मन्त्रसे मन्थका पहला ग्रास भक्षण करे । ] 'देवस्य भर्गः धीमहि'—हम सवितादेवके तेजका ध्यान करते हैं। 'नक्तमुत उस इस मन्थका चूल भागवित्तिने अपने शिष्य जानकि उषसः मधु'—रात और दिन सुखकर हों। 'पार्थिव रजः आयस्थूणको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे मधुमत्'—पृथिवीके धूलिकण उद्वेग न करनेवाले हों । 'द्यौः ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पिता नः मधु अस्तु'—पिता द्युलोक हमारे लिये सुखकर हो । पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका जानकि आयस्थूणने 'भुवः स्वाहा' [ यहाँतकके मन्त्रसे दूसरा ग्रास भक्षण अपने शिष्य सत्यकाम जाबालको उपदेश करके कहा था, 'यदि करे ] । 'धियः नः प्रचोदयात्'—जो सवितादेव कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो हमारी बुद्धियोंको प्रेरित करता है। 'नः वनस्पतिः मधुमान्'— जायँगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका सत्यकाम हमारे लिये वनस्पति ( सोम ) मधुर रसमय हो । 'सूर्यः जाबालने अपने शिष्योंको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई मधुमान् अस्तु'—सूर्य हमारे लिये मधुमान् हो । 'गावः नः इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी माध्वीः भवन्तु'—किरणें अथवा दिशाएँ हमारे लिये सुखकर और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका, जो पुत्र या हों । 'स्वः स्वाहा' [ यहाँतकके मन्त्रसे तृतीय ग्रास शिष्य न हो, उसे उपदेश न करे ॥ ७-१२ ॥ भक्षण करे ] । इसके पश्चात् सम्पूर्ण सावित्री ( गायत्रीमन्त्र ), यह मन्थकर्म चतुरौदुम्बर ( चार औदुम्बरकाष्ठके बने 'मधु वाता ऋतायते' इत्यादि समस्त मधुमती ऋचा और पदार्थोंवाला ) है । इसमे औदुम्बरकाष्ठ ( गूलरकी लकड़ी ) 'अहमेवेद सर्वं भूयासम्' (यह सब मैं ही हो जाऊँ) 'भूर्भुवः का स्रुव, औदुम्बरकाष्ठका चमस, औदुम्बरकाष्ठका इध्म और स्वाहा'—इस प्रकार कहकर अन्तमें समस्त मन्थको भक्षण- औदुम्बरकाष्ठकी दो उपमन्थनी होती हैं। इसमें व्रीहि ( धान ), कर, दोनों हाथ धो, अग्निके पश्चिम भागमे पूर्वकी ओर सिर यव (जौ ), तिल, माष (उड़द ), अणु (सावाँ ), प्रियङ्गु करके बैठता है। प्रातःकालमें 'दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं ..... ( काँगनी ), गोधूम (गेहूँ ), मसूर, खल्व (वाल ) और भूयासम्' इस मन्त्रद्वारा आदित्यका उपस्थान ( नमस्कार ) खलकुल (कुलथी)—ये दस ग्रामीण अन्न उपयुक्त होते करता है । फिर जिस मार्गसे गया होता है, उसीसे लौटकर हैं। उन्हें पीसकर दही, मधु और घृतमे मिलाकर घृतसे हवन अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ आगे कहे जानेवाले ] वंशको करता है ॥ १३ ॥ जपता है ॥ ६ ॥ चतुर्थ सन्तानोत्पत्ति-विज्ञान ( इच्छानुसार सद्गुणयुक्त सन्तान उत्पन्न करने, सर्वथा चराचर समस्त भूतोंका रस-सार अथवा आधार पृथिवी है, न उत्पन्न करने तथा संयमयुक्त जीवन-निर्माण करनेकी युक्ति पृथिवीका रस जल है, जलका रस—उसपर निर्भर करनेवाली बतलानेके लिये इस ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है, मन्थाख्य ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस—सार पुष्प है, पुष्पका रस कर्मकर्ता प्राणदर्शी पुरुषका ही इसमें अधिकार है।) फल है, फलका रस—आधार पुरुष है, पुरुषका रस—सार १. दिशाओंका एक पुण्डरीक ( अर्थात् अखण्ड श्रेष्ठ ) है, मैं मनुष्योंमें एक पुण्डरीक होऊँ ।

४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०७ शुक्र है। प्रसिद्ध प्रजापतिने विचार किया कि इस शुक्रकी मन्त्रोपासक अपनी पत्नीको कामनापरायण करना चाहे तो उस उपयुक्त प्रतिष्ठाके लिये कोई आधार चाहिये, इसलिये उसने समय वह 'अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे । स स्त्रीकी सृष्टि की और उसके अधोभाग-सेवनका विधान किया। त्वमङ्गकषायोसि दिग्धविद्धमिव मादयेमाममूं मयि ।' मन्त्र- ( यहाँ यदि यह कहा जाय कि इस पाशविक क्रियामें तो प्राणि- का जप करे । मात्रकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, इसके लिये विधान क्यों किया यदि किसी कारणवश गर्भनिरोधकी आवश्यकता हो तो गया, तो इसका उत्तर यह है कि यह विधान इसीलिये बनाया उस समय 'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे' मन्त्रका जाप करे । गया कि जिसमें पुरुषोंकी स्वेच्छाचारिताका निरोध हो और ऐसा करनेपर पत्नी गर्भवती नहीं होगी *। और यदि यह इच्छा इस विज्ञानसे परिचित पुरुषोंके द्वारा केवल श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्तिके हो कि पत्नी गर्भधारण करे तो उस समय 'इन्द्रियेण ते रेतसा लिये ही इसका सेवन किया जाय।) इसके लिये प्रजापतिने रेत आदधामि' इस मन्त्रका पाठ करे; इससे वह निश्चय ही प्रजनननेन्द्रियको उत्पन्न किया । अतएव इस विषयसे घृणा नहीं गर्भवती हो जायगी । करनी चाहिये। अरुणके पुत्र विद्वान् उद्दालक और नाक- यदि कभी अपनी भार्याके साथ किसी जारका सम्बन्ध हो मौद्गल्य तथा कुमारहारीत ऋषिने भी कहा है कि बहुत-से ऐसे जाय और उसे दण्ड देना हो तो पहले कच्ची मिट्टीके बरतनमें अग्नि मरणधर्मा, नामके ब्राह्मण हैं जो निरिन्द्रिय, सुकृतहीन, मैथुन- स्थापन करके समस्त कर्मोंको विपरीत रीतिसे करे और कुछ सरके विज्ञानसे अपरिचित होकर भी मैथुन-कर्ममें आसक्त होते हैं, तिनकोंके अग्रभागको घीमें भिगोकर विपरीत क्रमसे ही उनका उनकी परलोकमें दुर्गति होती है। (इससे अशास्त्रीय तथा होम करे। आहुतिके पहले 'मम समिद्धेऽहौषी. प्राणापानौ त अंधाध मैथुन-कर्मका पापहेतुत्व सूचित किया गया है।) आददेऽसौ' आदि मन्त्रोंका पाठ करके अन्तमें प्रत्येक बार इस प्रकार मन्थ-कर्म करके ब्रह्मचर्यधारणपूर्वक पुरुषको 'असौ' बोलकर उसका नाम ले। इस प्रकार करनेसे वह पुण्य- पत्नीके ऋतुकालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। यदि इस बीचमें से स्खलित होकर मृत्युको प्राप्त हो जाता है। स्वप्नदोषादिके द्वारा शुक्र क्षरण हो जाय तो उसकी पुनः प्राप्ति ऋतुमती पत्नीका त्रिरात्र ब्रह्म (तीन रात्रियोंका पृथक् तथा वृद्धिके लिये 'यन्मेऽद्य रेत पृथिवीमस्कान्त्सीद्यदोषधी- निवासादि) समाप्त होनेपर स्नान करनेके बाद उसे धान रप्यसरद्यदपः, इदमह तद्रेत आददे ।' तथा 'पुनर्मा- कूटना आदि गृहस्थीका काम करना चाहिये। तीन दिनोंतक मैत्विन्द्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः । पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं उसे अलग रहना चाहिये, किसीका स्पर्श नहीं करना चाहिये। कल्पन्ताम् ।' इन मन्त्रोंका पाठ करे। (इससे स्वप्नदोषादि जो पुरुष चाहता हो कि मेरा पुत्र गौरवर्ण हो, एक वेदका व्याधियोंका नाश होता है।) अध्ययन करनेवाला हो और पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे, यदि कदाचित् जलमें अपनी छाया दीख जाय तो 'मयि उसको दूध-चावलकी खीर बनाकर उसमें घी मिलाकर पत्नी- तेज इन्द्रियं यशो द्रविणम् सुकृतम् ।' (मुझे तेज, इन्द्रिय- सहित खाना चाहिये । जो कपिलवर्ण, दो वेदोंका अध्ययन शक्ति, यश, धन और पुण्यकी प्राप्ति हो) इस मन्त्रको पढे। ऋतु- करनेवाला और पूर्णायु पुत्र चाहता हो, उसको दहींमें चावल कालकी तीन रात बीतनेपर जब पत्नी स्नान करके शुद्ध हो जाय, पकाकर पत्नीसहित खाना चाहिये। जो श्यामवर्ण, रक्तनेत्र, तब 'स्त्रियोंमें मेरी यह पत्नी लक्ष्मीके समान है, इसलिये निर्मल वस्त्र वेदत्रयीका अध्ययन करनेवाले, पूर्णायु पुत्रकी इच्छा करता हो, पहने हुए है' यह विचारकर उस यशस्विनी पत्नीके समीप जाकर उसे जलमें चावल (भात) पकाकर घी मिलाकर पत्नीसहित 'हम दोनों सन्तानोत्पादनके लिये क्रिया करेंगे' कहकर आमन्त्रण खाना चाहिये। जो चाहता हो कि मेरे पूर्ण आयुवाली करे । लज्जा अथवा हठवश स्त्री यदि मिथुन-धर्मके लिये विदुषी कन्या हो, उसे तिल-चावलकी खिचड़ी बनाकर पत्नी- अस्वीकार करे तो उसे आभरणादिद्वारा तथा अभिशापादि- सहित खाना चाहिये। और जो चाहता हो कि मेरा पुत्र द्वारा प्रेरित करे। पुरुषके 'इन्द्रियेण ते यशसा यश आददे' इस मन्त्रयुक्त अभिशापसे स्त्री अयशस्विनी—वन्ध्या हो जाती है। * आजकल गर्भनिरोधके लिये कैसी-कैसी तामसी क्रियाएं की परन्तु यदि स्त्री अपने स्वामीकी अभिलाषा पूर्ण करती है तो स्वामीके जाती हैं, पर ये होती हैं प्राय असमयकी वृद्धिके लिये । और यह 'इन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामि' इस मन्त्रपाठपूर्वक वैदिक प्रक्रिया भी अपनी धर्मपत्नीको कभी गर्भधारण न कराना हो उपगत होनेसे पत्नी निश्चय ही यशस्विनी—पुत्रवती होती है।, तो उनके लिये । सयमी पुरुष ही ऐसा कर सकते थे ।

५०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६

५०८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ६ प्रसिद्ध पण्डित, वेदवादियोंकी सभामें जानेवाला, सुन्दर वाणी — अनुसार घीका संस्कार ( शोधन ) करके और चरुपाक बना- बोलनेवाला, सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करनेवाला और पूर्ण कर 'अग्नये स्वाहा', 'अनुमतये स्वाहा' एव 'देवाय सवित्रे आयुष्मान् हो, वह उड़द-चावलकी खिचड़ी पकाकर उसमें सत्यप्रसवाय स्वाहा' इन मन्त्रोंसे अग्निमें आहुतियाँ देनी 'उक्षन्'* अथवा 'ऋषभ'† नामक बल-वीर्यवर्द्धक ओषधि चाहिये । होम समाप्त करके चरुमें बचा हुआ भोजन करके मिलाकर घृतसहित पति-पत्नी दोनों भोजन करें । शेष पत्नीको भोजन कराना चाहिये । फिर हाथ धोकर जलका गर्भाधान करनेवालेको प्रातःकाल ही स्थालीपाकविधिके कलश भरके 'उत्तिष्ठातोविश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सह' मन्त्रके द्वारा पत्नीका तीन बार अभ्युक्षण (अभिषेचन)

  • 'उक्षन्' शब्दके कोषमें दो प्रकारके अर्थ मिलते हैं। कलकत्ते- करना चाहिये । से प्रकाशित 'वाचस्पत्य' नामक बृहत् संस्कृताभिधानमें उसे अष्ट- वर्गान्तर्गत 'ऋषभ' नामक ओषधिका पर्याय माना गया है— तदनन्तर पति अपनी कामनाके अनुसार पत्नीको भोजन 'ऋषभौषधौ च' । प्रसिद्ध अग्रेज विद्वान् सर मोनियर विलियम्सने कराके शयनके समय बुलाकर कहे कि "देखो, मैं अम ( प्राण ) अपने. बृहत् संस्कृत-अंग्रेजी कोषमें इसे 'सोम' नामक पौधेका हूँ और तुम प्राणरूप मेरे अधीन वाक् हो । मैं साम हूँ और पर्याय माना है । तुम सामका आधाररूप ऋक् हो, मैं आकाश हूँ और तुम पृथिवी † 'ऋषभ' नामक ओषधिका आयुर्वेदके अत्यन्त प्राचीन एव हो। अतएव आओ, तुम-हम दोनों मिलें, जिससे हमें पुत्र- प्रामाणिक ग्रन्थ 'सुश्रुत-संहिता' के 'सूत्रस्थान' नामक प्रथम खण्डके सन्तान और तदनुगत धनकी प्राप्ति हो । इसके पश्चात् 'द्यावा ३८ वें अध्यायमें (जो द्रव्यसङ्ग्रहणीयाध्याय भी कहलाता है) सैंतीस पृथिवी' इत्यादि मन्त्रसे सम्बोधन करके 'विष्णुर्योनि' इत्यादि द्रव्यगणोंके अन्तर्गत उल्लेख हुआ है। 'भावप्रकाश' नामक प्रसिद्ध मन्त्रके अनुसार प्रार्थना करे "भगवान् विष्णु तुम्हारी जनने- संग्रह-ग्रन्थमें उसका वर्णन इस रूपमें आया है— न्द्रियको पुत्रोत्पादनमें समर्थ करें, त्वष्टा सूर्य रूपोंको दर्शन- जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ । योग्य करें, विराट् पुरुष प्रजापति रेतस्सेचन करायें, सूत्रात्मा रसोतकन्दवत्कन्दौ नि सारौ सूक्ष्मपत्रकौ ॥ विधाता तुममे अभिन्नभावसे स्थित होकर गर्भ धारण करें। ऋषभो वृषभद्भवः । सिनीवाली नामकी अत्यन्त सुन्दर देवता तुममें अमेदरूपसे ॥ एवं पृथुष्टुका नामकी महान् स्तुतिशाली देवता भी तुममें हैं। ऋषभो वृषभो वीरो विषाणी शृङ्ग इत्यादि । मैं उनसे प्रार्थना करता हूँ कि 'हे सिनीवालि ! हे पृथुष्टुके ! तुम जीवकऋषभकौ वल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ । इस गर्भको धारण करो।' दोनों अश्विनीकुमार अथवा चन्द्र- मधुरौ पित्तदाहघ्नौ काशवातक्षयावहौ ॥ सूर्य तुम्हारे साथ रहकर इस गर्भको धारण करें।" 'जीवक और ऋषभक (ऋषभ) नामकी ओषधियाँ हिमालय- "दोनों अश्विनीकुमार हिरण्मय दो अरणियोंके द्वारा मन्थन के शिखरपर उत्पन्न होती हैं। उनकी जड़ लहसुनके सदृश होती करते हैं। मैं दसवें मासमें प्रसव होनेके लिये गर्भाधान करता है। दोनोंमें ही गूदरा नहीं होता, केवल त्वचा होती है, दोनोंमें हूँ । पृथ्वी जैसे अग्निगर्भा है, आकाश जैसे सूर्यके द्वारा गर्भ- छोटी-छोटी पत्तियाँ होती हैं। इनमेंसे ऋषभ बैलके सींगकी आकृति- वती है, दिशाएँ जैसे वायुके द्वारा गर्भवती हैं, मैं तुमको उसी का होता है। इसके दूसरे नाम हैं—वृषभ, वीर, विषाणी, शृङ्ग प्रकार गर्भ अर्पण करके गर्भवती करता हूँ।" यों कहकर आदि । जीवक और ऋषभ दोनों ही बलकारक, शीतवीर्य, गर्भाधान करे। वीर्य और कफ बढ़ानेवाले, मधुर, पित्त और दाहका शमन करने- तदनन्तर सुखपूर्वक प्रसव हो जाय, इसके लिये 'यथावायुः' वाले तथा खाँसी, वायु एव यक्ष्माको दूर करनेवाले हैं। इत्यादि मन्त्रके द्वारा आसन्नप्रसवा पत्नीका अभिषेचन करे और ऋषभकी प्रसिद्ध अष्टवर्ग नामक ओषधियोंमें गणना है। कहे—'जैसे वायु पुष्करिणीको सब ओरसे हिला देता है, वैसे भावप्रकाशकार लिखते हैं— ही तुम्हारा गर्भ भी अपने स्थानसे खिसककर जेरके साथ जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके । बाहर निकल आये। तुम्हारे तेजस्वी गर्भका मार्ग रुका हुआ अष्टवर्गोऽप्यभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ॥ है और चारों ओर जेरसे घिरा है। गर्भके साथ उस जेरको

ब्राह्मण ५ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५०९

ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०९ भी निकाल बाहर करें; और गर्भ निकलनेके समय जो मास- पेशी बाहर निकला करती है, वह भी निकल जाय।' पश्चात् पुत्रका जन्म हो जानेपर अभिख्यापन करके पुत्र- को गोदमें ले और आज्यस्थालीमें दही मिला हुआ घृत रख- कर उसे थोड़ा-थोड़ा लेकर यह कहता हुआ बार-बार अग्निमें होम करे कि 'इस अपने घरमें मैं पुत्ररूपसे बढ़कर सहस्रों मनुष्यों- का पालन करूँ, मेरे इस पुत्रके वंशमें सन्तान लक्ष्मी तथा पशु-सम्पत्ति लगातार बनी रहे; मुझमें (पितामे) जो प्राण (इन्द्रियाँ) हैं, वे सभी मन-ही मन मैं तुम्हे (पुत्रको) दे रहा हूँ; मेरे इस कर्ममें कोई न्यूनाधिकता हो गयी हो तो विद्वान् एवं वाञ्छापूरक अग्नि उसे पूर्ण कर दें।' तदनन्तर पिता बालकके दाहिने कानमें अपना मुख लगाकर 'वाक्, वाक्, वाक्' इस प्रकार तीन बार जप करे । तदनन्तर दधि, मधु और घृत मिलाकर पास ही रक्खे हुए सोनेके पात्रके द्वारा क्रमशः— 'भूस्ते दधामि', 'भुवस्ते दधामि', 'स्वस्ते दधामि', 'भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि' —यों कहकर चार बार उसे चटाये । फिर पिता उस पुत्रका 'वेदोऽसि' बोलकर 'नामकरण' करे—'वेद' यह नाम रक्खे । उसका यह नाम अत्यन्त गोपनीय होता है । इसे सर्व- साधारणमें प्रकट नहीं करना चाहिये । इसके बाद गोदमें स्थित उस शिशुको माताकी गोदमें रखकर तथा स्तन देकर इस मन्त्रका पाठ करे— 'यस्ते स्तन शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः । येन विश्वा पुष्यसि वीर्याणि सरस्वति तमिह धातवेकः।' अर्थात् 'हे सरस्वति ! तुम्हारा जो स्तन दूधका अक्षय भंडार तथा पोषणका आधार है, जो रत्नोंकी खान है तथा सम्पूर्ण धन-राशिका ज्ञाता एव उदार दानी है, और जिसके द्वारा तुम समस्त वरणीय पदार्थोंका पोषण करती हो, तुम इस सत्पुत्रके जीवन धारणार्थ उस स्तनको मेरी भार्यामें प्रविष्ट करा दो।' तदनन्तर बालककी माताको इस प्रकार अभिमन्त्रित करे— उसे सम्बोधन करके कहे, 'तुम ही स्तुतिके योग्य मैत्रा- वरुणी (अरुन्धती) हो, हे वीरे ! तुमने वीर पुत्रको जन्म देकर हमे वीरवान्—वीर पुत्रका पिता बनाया है, अतः तुम वीर- वती होओ। इसे लोग कहें—तू सचमुच अपने पितासे भी आगे बढ़ गया, तू निस्सन्देह अपने पितामहसे भी श्रेष्ठ निकला।' इस प्रकारके विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मणके जो पुत्र होता है, वह श्री, यश और ब्रह्मतेजके द्वारा सर्वोच्च स्थितिको प्राप्त कर लेता है ॥ १-२८॥ पञ्चम ब्राह्मण समस्त प्रवचनकी परम्पराका वर्णन अब वंश (परम्परा) का वर्णन किया जाता है—पौतिमापी- पुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, कात्यायनीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, गौतमी- पुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे, भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरी- पुत्रने औपस्वस्तीपुत्रसे, औपस्वस्तीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने कात्यायनीपुत्रसे, कात्यायनीपुत्रने कौशिकीपुत्रसे, कौशिकीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे और वैयाघ्रपदीपुत्रसे, वैयाघ्रपदी- पुत्रने काण्वीपुत्रसे तथा कापीपुत्रसे, कापीपुत्रने आत्रेयीपुत्रसे, आत्रेयीपुत्रने गौतमीपुत्रसे, गौतमीपुत्रने भारद्वाजीपुत्रसे, भारद्वाजीपुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने वात्सीपुत्रसे, वात्सी- पुत्रने पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे, वार्कारुणी- पुत्रने वार्कारुणीपुत्रसे, वार्कारुणीपुत्रने आर्त्तभागीपुत्रसे, आर्त्तभागीपुत्रने शौङ्गीपुत्रसे, शौङ्गीपुत्रने साङ्कतीपुत्रसे, साङ्कती- पुत्रने आलम्बायनीपुत्रसे, आलम्बायनीपुत्रने आलम्बीपुत्रसे, आलम्बीपुत्रने जायन्तीपुत्रसे, जायन्तीपुत्रने माण्डूकायनीपुत्रसे, माण्डूकायनीपुत्रने माण्डूकीपुत्रसे, माण्डूकीपुत्रने शाण्डिलीपुत्रसे, शाण्डिलीपुत्रने राथीतरीपुत्रसे, राथीतरीपुत्रने भालुकीपुत्रसे, भालुकीपुत्रने दो कौञ्चिकीपुत्रोंसे, दोनों कौञ्चिकीपुत्रोंने वैदभृती- पुत्रसे, वैदभृतीपुत्रने काशकेयीपुत्रसे, काशकेयीपुत्रने प्राचीन- योगीपुत्रसे, प्राचीनयोगीपुत्रने साञ्जीवीपुत्रसे, साञ्जीवीपुत्रने आसुरिवासी प्राश्नीपुत्रसे, प्राश्नीपुत्रने आसुरायणसे, आसुरायण- ने आसुरिसे, आसुरिने याज्ञवल्क्यसे, याज्ञवल्क्यने उद्दालक- से, उद्दालकने अरुणसे, अरुणने उपवेशिसे, उपवेशिने कुश्रिसे, कुश्रिने वाजश्रवससे, वाजश्रवाने जिह्वावान् बाध्योगसे, जिह्वावान् बाध्योगने असित वार्षगणसे, असित वार्षगणने हरित कश्यपसे, हरित कश्यपने शिल्प कश्यपसे, शिल्प कश्यपने कश्यप

५१० * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ६ नैध्रुविसे, कश्यप नैध्रुविने वाक्से, वाक्ने आम्भिणीसे, आम्भिणी- ने वामकक्षायणसे, वामकक्षायणने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने ने आदित्यसे, आदित्यसे प्राप्त हुई ये शुक्लयजुः श्रुतियाँ वाजसनेय वात्स्यसे, वात्स्यने कुश्रिसे, कुश्रिने यज्ञवचा राजस्तम्बायनसे, याज्ञवल्क्यद्वारा प्रसिद्ध की गयीं । साञ्जीवी पुत्रपर्यन्त यह यज्ञवचा राजस्तम्बायनने तुर कावषेयसे, तुर कावषेयने प्रजापति- एक ही वंश है । साञ्जीवीपुत्रने माण्डूकायनिसे, माण्डूकायनि- से और प्रजापतिने ब्रह्मसे । ब्रह्म स्वयम्भू है, स्वयम्भू ब्रह्मको ने माण्डव्यसे, माण्डव्यने कौत्ससे, कौत्सने माहित्थिस, माहित्थि- नमस्कार है ॥ १-४ ॥ ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥ ॥ शुक्लयजुर्वेदीय बृहदारण्यकोपनिषद् समाप्त ॥ ॥ ॐ तत्सत् ॥ शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ ईशावास्योपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है ।